शारदीय नवरात्रि का पावन त्योहार चल रहा है। पूरा देश नौ दिनों तक आदि शक्ति मां दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों की उपासना में लीन है। पंडालों में मंत्रोच्चार गूंज रहे हैं, कन्या पूजन की तैयारियां हो रही हैं और समाज में नारी को ‘शक्ति’ का प्रतीक मानकर उसके सम्मान के दावे किए जा रहे हैं।

लेकिन इसी आस्था और उत्सव के माहौल के समानांतर, देश की राजधानी दिल्ली की सड़कों से आई कुछ तस्वीरें हमारे अंतरात्मा को झकझोर देती हैं। अक्टूबर 2026 के इसी नवरात्रि के सप्ताह में, दिल्ली के आर.के. आश्रम और मध्य दिल्ली के इलाकों में विरोध प्रदर्शनों के दौरान पुलिस और महिला प्रदर्शनकारियों के बीच हिंसक झड़पें देखने को मिलीं। कई छात्र संगठनों (जैसे SFI) और नागरिक समाज की महिलाओं को पुलिस द्वारा घसीटे जाने, लाठीचार्ज का शिकार होने और प्रिवेंटिव डिटेंशन (निवारक हिरासत) में लिए जाने के मामले सामने आए। इस विरोधाभास ने समाज के सामने एक कड़वा सवाल खड़ा कर दिया है। एक तरफ जहां हम देवी रूप में नारी की पूजा करते हैं, वहीं दूसरी तरफ हक की आवाज उठाने पर उन पर लाठियां बरसती हैं आखिर हमारे समाज का असली और सच्चा चेहरा कौन सा है? अक्टूबर 2026 के दूसरे सप्ताह में दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) के इस्तीफे और मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन (SIR) के विरोध में विपक्षी गठबंधन और छात्र संगठनों द्वारा बड़े पैमाने पर ‘फ्लैश प्रोटेस्ट’ और मार्च आयोजित किए गए थे। 10 और 11 अक्टूबर 2026 को (जब देश में नवरात्रि के शुरुआती दिन मनाए जा रहे थे), दिल्ली पुलिस ने निषेधाज्ञा (धारा 163 BNSS) का हवाला देते हुए प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए बल प्रयोग किया। इस दौरान कई महिला प्रदर्शनकारियों और छात्राओं को सड़कों पर घसीटा गया और हिरासत में लिया गया। स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया (SFI) और नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं ने आरोप लगाया कि हिरासत में लेने के दौरान पुरुष पुलिसकर्मियों द्वारा महिला कार्यकर्ताओं के साथ बर्बरता की गई और पुलिस वैन के भीतर बुनियादी सुरक्षा मानकों (जैसे महिला पुलिसकर्मियों की पर्याप्त मौजूदगी) की अनदेखी की गई। नेटवर्क ऑफ विमेन इन मीडिया, इंडिया (NWMI) ने इस मामले में सीधे सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि विरोध प्रदर्शन को कवर कर रही महिला पत्रकारों को वैध प्रेस कार्ड दिखाने के बावजूद न केवल काम करने से रोका गया, बल्कि उनके साथ मारपीट और मनमानी हिरासत की कार्रवाई भी की गई। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस से जवाब भी तलब किया है। इस विरोधाभास को समझने के लिए दोनों पक्षों के तर्कों को देखना आवश्यक है. दिल्ली पुलिस का तर्क है कि कानून और व्यवस्था बनाए रखना और अति-संवेदनशील लुटियंस जोन की सुरक्षा सुनिश्चित करना उनकी प्राथमिकता है। पुलिस सूत्रों के अनुसार, कई प्रदर्शनों में प्रदर्शनकारियों ने बैरिकेड्स तोड़े और कानून अपने हाथ में लिया, जिसके कारण ‘हल्का बल प्रयोग’ (Mild Force) करना अपरिहार्य हो गया। पुलिस का यह भी दावा है कि कुछ झड़पों में प्रदर्शनकारियों की ओर से महिला पुलिस अधिकारियों पर भी हमले किए गए। आंदोलनकारियों का कहना है कि शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन करना उनका संवैधानिक अधिकार है। उनका सवाल है कि क्या कानून-व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर महिलाओं की गरिमा को ठेस पहुंचाना और उन पर लाठियां चलाना सही ठहराया जा सकता है? खासकर उस समय जब पूरा देश नारी शक्ति के उत्सव में डूबा हो।

यह विडंबना पहली बार नहीं देखी गई है। भारतीय समाज की यह सबसे बड़ी कड़वी सच्चाई है कि हम अपनी सांस्कृतिक विरासत में नारी को सर्वोच्च स्थान देते हैं। हमारे शास्त्रों में लिखा है— “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः” (जहाँ नारियों की पूजा होती है, वहाँ देवता निवास करते हैं)। लेकिन व्यावहारिक धरातल पर, जब वही महिलाएं अपने अधिकारों, शिक्षा, रोजगार या किसी राजनीतिक/सामाजिक मुद्दे पर सड़कों पर उतरती हैं, तो यह व्यवस्था उनके प्रति अत्यंत कठोर हो जाती है।
| सामाजिक पहलू | सांस्कृतिक रूप (नैरेटिव) | वास्तविक धरातल (तथ्य) |
|---|---|---|
| नारी का स्थान | मां दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती के रूप में पूजनीय. | न्याय और हक की मांग करने पर पुलिसिया लाठियों का सामना. |
| सुरक्षा के दावे | ‘मातृशक्ति’ के संरक्षण और सम्मान के बड़े-बड़े वादे. | हिरासत के दौरान महिला पुलिसकर्मियों की अनुपस्थिति के आरोप. |
| अभिव्यक्ति की आज़ादी | लोकतंत्र में सभी को अपनी बात रखने का समान अधिकार. | कानून-व्यवस्था और धारा 163 (BNSS) के तहत आवाज़ों का दमन |

इस प्रश्न का उत्तर ढूंढना कठिन है क्योंकि समाज इन दोनों चेहरों को एक साथ जीता है। एक तरफ वह संवेदनशील चेहरा है जो कन्याओं के पैर धोकर आशीर्वाद लेता है, और दूसरी तरफ वह निष्ठुर चेहरा है जो व्यवस्था के पहियों के नीचे महिलाओं के मान-मर्दन पर मौन रह जाता है। जब तक हम अपनी आस्था को अपने व्यवहार में नहीं बदलेंगे, तब तक नवरात्रि जैसे पवित्र पर्व केवल औपचारिक बनकर रह जाएंगे। समाज का ‘सच्चा चेहरा’ तब तक सुंदर नहीं हो सकता, जब तक कि हम सड़कों पर उतरने वाली हर उस महिला को भी वही गरिमा और सम्मान न दें, जिसकी हकदार वह एक नागरिक और एक इंसान के रूप में है। कानून का पालन कराना पुलिस की जिम्मेदारी हो सकती है, लेकिन इसके तरीकों में संवेदनशीलता और महिलाओं के प्रति सम्मान का होना अनिवार्य है।



