हवाओं में घुली हल्की सी ठंड की रवानी है, समझ लो आ गई चुपचाप शरद सुहानी है। सुबह जब आंगन में ओस के मोती चमके, बदन में इक अजीब सी ठंडी सिहरन महके। रज़ाई और शॉल की ज़रूरत याद आने लगी, सुहानी धूप की आग़ोश में सबके समाने लगी । बदलने लगीं धीरे-धीरे हमारी चाल-ढाल सारी, सजी बदन पर लिबासों की रंगीन फुलवारी। लहसुन, अदरक मसालों की सौंधी ख़ुशबू, बढ़ाती है हवाओं में शरद नया सा एक जादू। पहनकर शॉल कंधों पर जो छत पर टहलते हैं, तो सारे ख़्वाब मौसम के इशारों पर मचलते हैं। न नीला आसमान सा कोई दूजा मंज़र होता है, सर्दियों का हर पल बड़ा ही दिलकश होता है। तबीअत झूम उठती है, बदन कांपता है ठंड से, यही एहसास जुड़ जाता है सीधा रूह के बंद से।