दीपावली, दीपों का पर्व, संस्कृति की जीवंत परंपरा

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़,हरदा,मध्य प्रदेश

भारत भूमि को यदि उत्सवों और पर्वों का देश कहा जाए, तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। यहाँ वर्ष के बारह महीनों में अनगिनत उत्सव मनाए जाते हैं, किंतु कार्तिक मास की अमावस्या को मनाया जाने वाला दीपावली (दिवाली) का पर्व केवल एक त्यौहार मात्र नहीं है, बल्कि यह भारतीय जनजीवन की संस्कृति, परंपरा, लोक-आस्था और राष्ट्र की सामूहिक चेतना का सबसे चमकीला हस्ताक्षर है। आज की भागदौड़ भरी आधुनिक ज़िंदगी में जब मनुष्य अपनी जड़ों से दूर होता जा रहा है, तब दीपावली जैसी प्राचीन परंपराएँ हमें हमारी मूल संस्कृति से जोड़कर मानवीय संवेदनाओं को जीवंत रखती हैं। “तमसो मा ज्योतिर्गमय”—अर्थात् ‘हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो’ यह भारतीय मनीषियों का सनातन उद्घोष है। दीपावली इसी उद्घोष का जीवंत और व्यावहारिक रूप है। जब इस पावन संध्या पर घर-घर में दीप प्रज्वलित किए जाते हैं, तो वे केवल मिट्टी के दीये नहीं होते, बल्कि वे मनुष्य के भीतर छिपे अज्ञान, द्वेष, लोभ और अहंकार के अंधकार को मिटाकर ज्ञान, प्रेम और पवित्रता के प्रकाश को फ़ैलाने का प्रतीक बनते हैं।


भारतीय संस्कृति में अग्नि और प्रकाश को पवित्रता, चेतना और ऊर्जा का सर्वोच्च स्त्रोत माना गया है। दीप प्रज्वलन की यह परंपरा हमें यह संदेश देती है कि चाहे रात कितनी भी गहरी और लंबी क्यों न हो, एक छोटा सा दीपक भी बड़े से बड़े अंधकार को चुनौती देने का सामर्थ्य रखता है। यह केवल एक बाहरी रोशनी नहीं, बल्कि अंतःकरण के प्रबोधन का उत्सव है। पत्र-पत्रिकाओं और ऐतिहासिक ग्रंथों में दीपावली के अनेक पौराणिक और सांस्कृतिक संदर्भ मिलते हैं, जो इसकी व्यापकता को दर्शाते हैं। भारत के लोक-मानस में यह पर्व मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के चौदह वर्ष के वनवास के पश्चात लंका पर विजय प्राप्त कर अयोध्या लौटने की ख़ुशी में मनाया जाता है। अयोध्या वासियों ने अपने प्रिय राजा के स्वागत में घी के दीये जलाए थे, जो आज भी हर घर में हर्षोल्लास के रूप में जीवित है। इस पावन रात्रि को धन, वैभव और ऐश्वर्य की देवी महालक्ष्मी और विघ्नहर्ता भगवान गणेश का पूजन किया जाता है। यह लोक-आस्था इस बात का प्रतीक है कि भौतिक समृद्धि के साथ-साथ बुद्धि, विवेक और सदाचरण का होना भी अनिवार्य है।


देश के दक्षिणी अंचल में इसे नरकासुर वध के रूप में और जैन परंपरा में भगवान महावीर के निर्वाण दिवस के रूप में भी स्मरण किया जाता है। यह विविधता ही भारतीय समाज की सबसे बड़ी ताक़त है, जो विभिन्न आख्यानों को समेटे हुए संपूर्ण राष्ट्र को एक सांस्कृतिक धागे में पिरो देती है। पत्र-पत्रिकाओं के पन्नों पर जब हम दीपावली के सामाजिक स्वरूप का विश्लेषण करते हैं, तो पाते हैं कि यह भारतीय समाज की सामूहिक उपासना का पर्व है। इस दिन की तैयारियाँ हफ्तों पहले शुरू हो जाती हैं,घरों की साफ-सफाई, रंगाई-पुताई और सजावट। यह इस बात का प्रतीक है कि हम अपने बाहरी परिवेश के साथ-साथ अपने मन और अंतःकरण को भी स्वच्छ और पवित्र बनाएं। इस दिन अमीर-ग़रीब, ऊँच-नीच के सभी भेद स्वतः मिट जाते हैं। हर घर, चाहे वह माटी की झोपड़ी हो या भव्य अटारी, दीयों की रोशनी से जगमगा उठता है। एक-दूसरे के घर जाकर मिठाइयाँ बाँटना, गले मिलना और खुशियाँ साझा करना हमारे समाज के आपसी प्रेम, सौहार्द और सहकारिता को सुदृढ़ करता है। यह पर्व अकेले उत्सव मनाने का नहीं, बल्कि पूरे समुदाय को साथ लेकर चलने का चिर-परिचित माध्यम है। यह पर्व हमें यह आत्ममंथन करने का अवसर देता है कि हम केवल भौतिक चकाचौंध में न उलझकर अपनी सांस्कृतिक धरोहर के मूल भाव को समझें। दीपावली का एक-एक दीपक यह संदेश देता है कि प्रेम, भाईचारा और प्रकाश का यह उत्सव केवल एक रात का नहीं, बल्कि हमारे संपूर्ण जीवन का मार्गदर्शक बनना चाहिए। आज के आधुनिक और यंत्रवत युग में, जहाँ मनुष्य भौतिकता की दौड़ में अकेला पड़ता जा रहा है, दीपावली जैसी परंपराएँ हमें हमारी जड़ों से जोड़ने का काम करती हैं। आइए, इस दीपावली हम सब मिलकर केवल अपने घरों को ही नहीं, बल्कि समाज के हर उस कोने को आत्मीयता के प्रकाश से आलोकित करें, जहाँ निराशा का अंधकार है।

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