साहब जाते-जाते सबको नंगा करके जाएंगे: भारतीय लोकतंत्र के पतनोन्मुख स्तंभ और बिकाऊ तंत्र का क्रूर यथार्थ

आज का भारत एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है जहाँ मूल्य, सिद्धांत और संवैधानिक मर्यादाएँ इतिहास की किताबों का हिस्सा बनती जा रही हैं। समाज का प्रबुद्ध वर्ग स्तब्ध है, और आम नागरिक असहाय होकर इस तमाशे को देख रहा है।

चारों तरफ से एक ही आवाज गूँज रही है—“अभी बहुत कुछ देखना बाकी है।” देश की लोकतांत्रिक संस्थाएँ जिस तरह एक-एक करके भरभराकर गिर रही हैं, उसने यह साफ कर दिया है कि सत्ता का शीर्ष पुरुष यानी ‘साहब’ इस देश की लोकतांत्रिक साख को पूरी तरह मटियामेट करने पर आमादा हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि वे जाते-जाते व्यवस्था के हर उस चेहरे से नकाब उतार देना चाहते हैं जो खुद को निष्पक्ष या पावन कहता था। ‘साहब’ का यह दौर इतिहास में इस बात के लिए याद रखा जाएगा कि उन्होंने जाते-जाते हर उस संस्था को नंगा कर दिया, जो कभी इस देश की रीढ़ हुआ करती थीं।

मीडिया का पतन: गोदी मीडिया से आगे, अब ‘चरण-वंदना’ का काल

जब हम आज के भारत के पतन की बात करते हैं, तो मीडिया का कुछ कहना ही नहीं है। लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहलाने वाला मीडिया आज पूरी तरह एक ‘प्रोपगैंडा मशीन’ बन चुका है। न्यूज़ चैनलों के स्टूडियो आज बहस के केंद्र नहीं, बल्कि नफरत की फैक्ट्रियां और सत्ता की आरती उतारने वाले मंच बन गए हैं।

प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में ऐतिहासिक गिरावट: अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की प्रेस स्वतंत्रता रैंकिंग का लगातार गिरना इस बात का सुबूत है कि पत्रकारिता अब दम तोड़ चुकी है।

मुद्दों से ध्यान भटकाना: आज जब देश में बेरोजगारी चरम पर है, महंगाई से आम आदमी की कमर टूट रही है, और आर्थिक असमानता की खाई गहरी होती जा रही है, तब मुख्यधारा के चैनल साम्प्रदायिक विमर्श, सीमा पार की झूठी कहानियों या विपक्ष को कोसने में व्यस्त हैं।

सवालों का अकाल: पहले पत्रकार सत्ता से सवाल पूछते थे, आज के ‘एंकर’ विपक्ष से सवाल पूछते हैं कि वे सरकार को काम क्यों नहीं करने दे रहे। मीडिया ने अपनी साख की ऐसी नुमाइश की है कि अब जनता ने इन पर हंसना और थूकना शुरू कर दिया है। ‘साहब’ ने मीडिया को डराकर, खरीदकर या लालच देकर इस कदर बेनकाब कर दिया है कि अब इनके पास छुपाने को कोई शर्म भी बाकी नहीं बची।

बात अब सुप्रीम कोर्ट तक: अंतिम उम्मीद का धुंधलाता अक्स

जब कार्यपालिका अंधी हो जाए और विधायिका पंगु, तब देश अपनी अंतिम उम्मीद के रूप में न्यायपालिका की तरफ देखता है। लेकिन आज बात अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुँच गई है। जिस सर्वोच्च न्यायालय को संविधान का रक्षक माना गया था, उसकी चौखट से भी अब आम इंसान को निराशा हाथ लग रही है।

चुनिंदा मामलों में तत्परता: आज का सुप्रीम कोर्ट सत्ता के करीबियों या बड़े उद्योगपतियों के मामलों पर रातों-रात सुनवाई करने के लिए तैयार हो जाता है, लेकिन सालों से जेलों में बंद सामाजिक कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और बिना मुकदमे के सड़ रहे नागरिकों की जमानत याचिकाओं पर तारीख-पर-तारीख मिलती है।

संवेदनशील मुद्दों पर चुप्पी या टालमटोल: चुनावी बॉन्ड (Electoral Bonds) जैसे संवेदनशील मामलों पर सालों बाद फैसला आना, या नागरिक अधिकारों के हनन पर केवल ‘चिंता’ व्यक्त करके छोड़ देना यह दर्शाता है कि न्याय की सर्वोच्च पीठ भी कहीं न कहीं सत्ता के दबाव या प्रभाव से अछूती नहीं है।

पोस्ट-रिटायरमेंट पोस्टिंग्स (Post-Retirement Benefits): जब देश के मुख्य न्यायाधीश या अन्य जज रिटायर होने के तुरंत बाद राज्यसभा की सीट या किसी बड़े सरकारी आयोग के अध्यक्ष का पद संभालते हैं, तो न्यायपालिका की निष्पक्षता तार-तार हो जाती है। ‘साहब’ ने जजों को उनके फैसलों के बदले पुरस्कार देने की जो नई परिपाटी शुरू की है, उसने सुप्रीम कोर्ट के पवित्र गलियारों को भी नंगा करके रख दिया है।

‘साहब’ का क्रूर खेल: जाते-जाते सब बेनकाब

इस पूरे परिदृश्य के सूत्रधार वही ‘साहब’ हैं, जिन्होंने देश को एक खोखले राष्ट्रवाद के नशे में झोंक दिया है। उनका यह अघोषित नियम बन चुका है कि जो उनके सामने घुटने नहीं टेकेगा, उसे केंद्रीय एजेंसियों (ED, CBI, Income Tax) के जरिए तबाह कर दिया जाएगा।

विपक्ष और दलबदल की राजनीति: भ्रष्टाचार के खिलाफ बड़ी-बड़ी बातें करने वाले ‘साहब’ की वाशिंग मशीन का कमाल पूरा देश देख रहा है। विपक्षी नेता जिन पर करोड़ों के घोटाले के आरोप खुद ‘साहब’ लगाते हैं, जैसे ही उनकी पार्टी में शामिल होते हैं, उनके सारे पाप धुल जाते हैं और वे उपमुख्यमंत्री या मंत्री बना दिए जाते हैं। इस नग्न खेल ने राजनीति के नैतिक पतन को पूरी तरह उजागर कर दिया है।

संस्थाओं का दुरूपयोग: चुनाव आयोग से लेकर कैग (CAG) तक, हर स्वतंत्र एजेंसी आज सरकार के एक विभाग की तरह काम कर रही है। निष्पक्ष चुनाव कराना अब एक सपना सा लगने लगा है।

अभी बहुत कुछ देखना बाकी है

यह दौर भारतीय इतिहास का सबसे अंधकारमय अध्याय है, जहाँ तानाशाही को ‘मास्टरस्ट्रोक’ और चाटुकारिता को ‘देशभक्ति’ का नाम दे दिया गया है। लेकिन ‘साहब’ का यह अहंकार ही उनकी सबसे बड़ी कमजोरी है। वे व्यवस्था के जिन चेहरों को डराकर या खरीदकर नंगा कर रहे हैं, दरअसल वे अनजाने में इस देश की जनता की आँखें खोल रहे हैं। जनता अब समझ रही है कि जो गोदी मीडिया दिन-रात चिल्लाता है, जो एजेंसियां विपक्ष पर टूटती हैं, और जो कोर्ट कभी-कभी मूकदर्शक बन जाता है—उन सबकी डोर एक ही हाथ में है। इस अभूतपूर्व पतन को देखकर यह कहना गलत नहीं होगा कि तमाशा अभी खत्म नहीं हुआ है, अभी बहुत कुछ देखना बाकी है। लेकिन जब इतिहास लिखा जाएगा, तब ‘साहब’ की इस नीति की तीखी भर्त्सना होगी कि उन्होंने अपनी सत्ता को अमर बनाए रखने के लिए देश के लोकतंत्र के हर पावन मंदिर को बीच बाजार में निर्वस्त्र कर दिया।

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