सुशासन का खोखला ढोल और आधुनिक बिहार का प्रशासनिक अंधकार: जहाँ अधिकारी भी हाथ में कटोरा लेने को मजबूर हैं

जब कोई राज्य अपने विकास और सुशासन के बड़े-बड़े दावे करता है, लेकिन उसके धरातल की हकीकत यह हो कि एक ज़िम्मेदार प्रशासनिक अधिकारी को अपने बुनियादी हक के लिए दफ्तर के बाहर कटोरा लेकर बैठना पड़े, तो समझ जाना चाहिए कि पूरी व्यवस्था वेंटिलेटर पर है।

बिहार के बक्सर में एक महिला ग्रामीण विकास पदाधिकारी (RDO) द्वारा 8 महीने से वेतन न मिलने के कारण दफ्तर के बाहर जमीन पर कटोरा लेकर बैठना आज के प्रशासनिक और राजनीतिक पतन का सबसे क्रूर और जीवंत उदाहरण है। यह घटना सिर्फ एक अधिकारी की बेबसी नहीं है, बल्कि यह उस समूचे तंत्र पर एक तीखा तमाचा है जो खुद को ‘सुशासन’ का पर्याय बताता है।

प्रशासनिक पंगुता और आर्थिक दिवालियापन का यथार्थ

आज के भारत में और विशेष रूप से बिहार में एक अजीब सा विरोधाभास देखने को मिल रहा है। एक तरफ भव्य रैलियां, करोड़ों के चुनावी वादे और बड़ी-बड़ी योजनाओं के होर्डिंग्स टंगे हैं, तो दूसरी तरफ उन योजनाओं को जमीन पर लागू करने वाले अधिकारियों और कर्मचारियों को महीनों तक वेतन के लाले पड़े हैं।

कागजी विकास बनाम जमीनी भुखमरी: एक प्रशासनिक अधिकारी का काम ग्रामीणों के विकास की रूपरेखा तैयार करना और सरकारी योजनाओं का लाभ जनता तक पहुंचाना होता है। लेकिन जब वही अधिकारी खुद अपनी बुनियादी जरूरतों, राशन और परिवार के भरण-पोषण के लिए तरसने लगे, तो वह व्यवस्था जनता का क्या उद्धार करेगी? ८ महीने तक किसी को वेतन न देना केवल एक प्रशासनिक विफलता नहीं है, बल्कि यह मानवाधिकारों का खुला उल्लंघन है।

अधिकारियों की लाचारी: इस घटना ने बिहार के समूचे प्रशासनिक ढांचे को बेनकाब कर दिया है। जब एक राजपत्रित अधिकारी (Gazetted Officer) को न्याय पाने के लिए इस तरह का भीख मांगने का प्रतीकात्मक विरोध प्रदर्शन करना पड़ रहा है, तो सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि संविदा कर्मियों, संविदा शिक्षकों और निचले स्तर के कर्मचारियों की स्थिति कितनी बदतर होगी।

नीतियों का अंतर्विरोध: शराबबंदी और राजस्व का ‘सत्यानाश’

बिहार की इस बदहाल आर्थिक स्थिति के पीछे उन अव्यावहारिक और जिद्दी नीतियों का बहुत बड़ा हाथ है, जिन्हें बिना किसी ठोस वित्तीय नियोजन के लागू कर दिया गया।

राजस्व को तगड़ा झटका: बिहार में पूर्ण शराबबंदी लागू करने के बाद से राज्य को मिलने वाले आबकारी राजस्व (Excise Revenue) का पूरी तरह से नुकसान हुआ। आलोचकों और अर्थशास्त्रियों का मानना है कि इस नीति ने राज्य के खजाने को भारी नुकसान पहुंचाया, जिसके कारण आज स्थिति यह है कि विकास कार्यों और वेतन के भुगतान के लिए पैसे कम पड़ रहे हैं।

अवैध सिंडिकेट का उदय: विडंबना यह है कि सरकारी राजस्व तो समाप्त हो गया, लेकिन जमीन पर शराब की अवैध तस्करी और सिंडिकेट का राज कायम हो गया। जनता का पैसा सरकारी खजाने में जाने के बजाय माफियाओं की जेबों में जा रहा है, और सरकार के पास अपने अधिकारियों को देने के लिए पैसे नहीं हैं। राजनेताओं के खोखले बयानों और इन अव्यावहारिक नीतियों ने मिलकर बिहार के वित्तीय ढांचे का पूरी तरह से ‘सत्यानाश’ कर दिया है।

वोटर की उदासीनता और ‘कटोरा संस्कृति’

इस समूचे संकट के लिए सिर्फ राजनेता या नीतियां ही दोषी नहीं हैं, बल्कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भाग लेने वाली जनता का एक हिस्सा भी उतना ही जिम्मेदार है।

जातिवाद और अंधभक्ति का परिणाम: आज के भारत में मतदाता अक्सर बुनियादी मुद्दों जैसे—रोजगार, स्वास्थ्य, शिक्षा और सुचारू प्रशासन को भूलकर जाति, धर्म और लोक-लुभावन नारों के आधार पर वोट देता है। जब चुनाव के वक्त जनता काम का हिसाब मांगने के बजाय केवल खोखले वादों और जातिगत समीकरणों के आधार पर ‘भर-भर कर’ वोट देती है, तो अंत में व्यवस्था की लाचारी आम नागरिक और कर्मचारी के हाथ में एक ‘कटोरा’ ही थमाती है।

जवाबदेही का अभाव: राजनेताओं को पता चल चुका है कि वे काम करें या न करें, वेतन दें या न दें, चुनाव आते-आते वे जनता को किसी अन्य भावनात्मक मुद्दे में उलझाकर दोबारा सत्ता हासिल कर लेंगे। यही कारण है कि आज व्यवस्था जनता और अपने कर्मचारियों के प्रति पूरी तरह से उदासीन और बेपरवाह हो चुकी है।

जागने का वक्त

बक्सर की यह घटना आधुनिक भारतीय लोकतंत्र और प्रशासनिक व्यवस्था के गाल पर एक करारा तमाचा है। यह इस बात का चेतावनी भरा संकेत है कि यदि संस्थाओं और नीतियों को व्यक्तिगत हठ और राजनीतिक लाभ के आधार पर चलाया जाएगा, तो पूरा तंत्र इसी तरह खोखला हो जाएगा। एक महिला अधिकारी का दफ्तर के बाहर कटोरा लेकर बैठना यह साबित करता है कि अब पानी सिर से ऊपर जा चुका है। यदि हम अब भी चुप रहे और केवल सोशल मीडिया पर इस तमाशे को देखते रहे, तो वह दिन दूर नहीं जब यह कटोरा केवल एक अधिकारी के हाथ में नहीं, बल्कि पूरे राज्य की अर्थव्यवस्था के हाथ में दिखाई देगा। यह समय तीखी आलोचना का भी है और आत्ममंथन का भी, ताकि लोकतंत्र के इस पावन मंदिर को पूरी तरह ध्वस्त होने से बचाया जा सके।

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