संविधान की गरिमा का अवसान और रसूखदारों का संरक्षण: अंकिता भंडारी केस का ‘वीआईपी’ एंगल और भारतीय लोकतंत्र का क्रूर यथार्थ

“बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” का राष्ट्रीय नारा आज के भारत के प्रशासनिक और राजनीतिक धरातल पर कितना खोखला हो चुका है, इसका सबसे भयावह सुबूत उत्तराखंड की 19 वर्षीय बेटी अंकिता भंडारी का मामला है।

ऋषिकेश के एक रिजॉर्ट में रिसेप्शनिस्ट के तौर पर काम करने वाली अंकिता को सिर्फ इसलिए मौत के घाट उतार दिया गया क्योंकि उसने एक तथाकथित ‘वीआईपी’ मेहमान को “अतिरिक्त सेवाएं” (अनैतिक देह व्यापार) देने से इनकार कर दिया था। रिजॉर्ट के मुख्य संचालक और उसके सहयोगियों को भले ही अदालत से उम्रकैद की सजा मिल चुकी हो, लेकिन इस पूरे मामले की सबसे तीखी आलोचना इस बात को लेकर होनी चाहिए कि उस मुख्य ‘वीआईपी’ की पहचान को दबाने के लिए समूचे तंत्र ने कितनी तत्परता दिखाई। हाल ही में, इस मामले में संदेहास्पद कड़ियों से जुड़े एक वरिष्ठ नेता को सिक्किम के राज्यपाल जैसे सर्वोच्च संवैधानिक पद पर नियुक्त किया गया है। इस राजनीतिक कदम ने पूरे देश की अंतरात्मा को झकझोर कर रख दिया है। यह घटना सिर्फ एक राजनीतिक नियुक्ति का मामला नहीं है, बल्कि यह उस ‘पावर स्ट्रक्चर’ का क्रूर यथार्थ है जहाँ रसूखदारों को संरक्षण देने के लिए देश के पवित्र संवैधानिक पदों का इस्तेमाल एक कवच (Shield) के रूप में किया जा रहा है।

न्याय की गुहार पर लाठियां और संवैधानिक पदों का दुरुपयोग

आधुनिक भारत के लोकतांत्रिक पतन का इससे बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है कि एक तरफ जहाँ संगीन आरोपों के घेरे में आए व्यक्ति को राजभवन की सुख-सुविधाएं और ‘गवर्नर’ का वीआईपी तमगा सौंप दिया जाता है, वहीं दूसरी तरफ अपनी मृत बेटी के लिए न्याय मांग रहे बेबस माता-पिता को देश की राजधानी दिल्ली में सड़कों पर घसीटा जाता है।

इंडिया गेट से राजघाट तक दमन: अंकिता भंडारी के माता-पिता जब इस विवादित नियुक्ति के विरोध में और सीबीआई जांच पूरी होने तक इस पर रोक लगाने की मांग को लेकर इंडिया गेट और राजघाट पर शांतिपूर्ण धरने पर बैठे, तो आधी रात को दिल्ली पुलिस ने उन्हें जबरन हिरासत में ले लिया। न्याय की गुहार लगा रही एक मां का पुलिसिया कार्रवाई के बीच बेहोश हो जाना इस देश की संवेदनशीलता की मौत का प्रतीक है।

सुरक्षा कवच बनी कुर्सी: भारतीय संविधान के तहत राज्यपाल के पद पर बैठे व्यक्ति को कई तरह की कानूनी छूट और विशेषाधिकार (Immunity) प्राप्त होते हैं। आलोचकों और प्रदर्शनकारियों का यह सीधा आरोप है कि जब केंद्रीय जांच एजेंसी (सीबीआई) इस मामले के वीआईपी एंगल की जांच कर रही है, तब ऐसे समय में यह नियुक्ति जानबूझकर इसलिए की गई ताकि उस व्यक्ति को जांच और पूछताछ के दायरे से पूरी तरह सुरक्षित किया जा सके।

सिस्टम की क्रूरता: सबूतों को मिटाने की राजनीतिक जल्दबाजी

अंकिता भंडारी हत्याकांड की शुरुआत से ही राज्य प्रशासन और रसूखदारों का रवैया बेहद संदेहास्पद रहा है।

बुलडोजर संस्कृति का वीभत्स रूप: जब अंकिता का शव भी बरामद नहीं हुआ था, तब एक स्थानीय विधायक के आदेश पर रातों-रात उस रिजॉर्ट के महत्वपूर्ण कमरों पर बुलडोजर चला दिया गया। कानून व्यवस्था के नाम पर सबूतों को नष्ट करने की यह जल्दबाजी साफ़ दर्शाती है कि सिस्टम के भीतर बैठे लोग किसी बहुत बड़े नाम को बचाने के लिए छटपटा रहे थे।

दोगला मापदंड: आज का भारत अपराधियों के प्रति ‘जीरो टॉलरेंस’ का दावा करता है, लेकिन जब बात सत्ता के गलियारों से जुड़े लोगों या उनके करीबियों की आती है, तो पूरी व्यवस्था आरोपियों के चरित्र हनन (Character Assassination) और पीड़ितों को प्रताड़ित करने में लग जाती है। कठुआ, हाथरस, उन्नाव से लेकर अंकिता भंडारी तक—हर बार एक ही पैटर्न देखने को मिलता है जहाँ सत्ताधारी दल के रसूखदारों को बचाने के लिए सरकारी तंत्र पूरी ताकत झोंक देता है।

मीडिया की चुप्पी और बिकाऊ तंत्र का तमाशा

इस पूरे घटनाक्रम में मुख्यधारा के मीडिया (Mainstream Media) की भूमिका सबसे ज्यादा शर्मनाक रही है। मीडिया मार्ट इंडिया जैसे कुछ गिने-चुने स्वतंत्र मंचों को छोड़कर, टीवी चैनलों के बड़े-बड़े स्टूडियो इस गंभीर मुद्दे पर पूरी तरह मौन साधे हुए हैं।

मुद्दों का भटकाव: जो मीडिया छोटी-छोटी बातों पर दिन-रात बहस आयोजित करता है, वह देश की एक बेटी के हत्यारों और संदेहास्पद ‘वीआईपी’ को राज्यपाल बनाए जाने पर पूरी तरह मूक-बधिर बन चुका है। खबरों को दबाने और जनता का ध्यान भटकाने की यह कला दर्शाती है कि आज लोकतंत्र का चौथा स्तंभ भी पूरी तरह सत्ता का पिछलग्गू बन चुका है।

जनता की लाचारी: जब देश की सर्वोच्च जांच एजेंसियां, पुलिस प्रशासन और मीडिया मिलकर किसी रसूखदार के पक्ष में खड़े हो जाएं, तो आम नागरिक के पास हाथ में सिर्फ लाचारी और आंसू ही बचते हैं। वोटर केवल चुनाव के वक्त इस्तेमाल होने वाली मशीन बनकर रह गया है, जिसकी बेटियों की सुरक्षा से ज्यादा जरूरी नेताओं की कुर्सियों को बचाना हो गया है।

अंतरात्मा की आवाज बुलंद करने का समय

अंकिता भंडारी का मामला सिर्फ उत्तराखंड की एक बेटी की त्रासदी नहीं है, बल्कि यह इस देश के हर उस माता-पिता के भरोसे की हत्या है जो अपनी बेटियों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए घर से बाहर भेजते हैं। यदि सत्ता के रसूख के दम पर अपराधियों और संदेहास्पद लोगों को राजभवनों में बिठाया जाता रहेगा, तो न्यायपालिका और संविधान पर से आम आदमी का विश्वास पूरी तरह उठ जाएगा। यह समय केवल मूकदर्शक बने रहने का नहीं है, बल्कि तीखी आलोचना और सामूहिक प्रतिरोध का है। जब तक समाज का हर तबका इन अमानवीय और अनैतिक राजनीतिक संरक्षणों के खिलाफ खुलकर आवाज बुलंद नहीं करेगा, तब तक देश की कोई भी बेटी सुरक्षित नहीं हो सकती। अंकिता भंडारी के माता-पिता की यह लड़ाई आज पूरे भारत की न्यायप्रिय जनता की लड़ाई बन चुकी है, और इस न्याय की लौ को बुझने देना लोकतंत्र की सामूहिक आत्महत्या के समान होगा।

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