नई दिल्ली के प्रतिष्ठित भारत मंडपम में 18वें ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन का सफल समापन हुआ। भारत की अध्यक्षता में आयोजित इस दो दिवसीय ऐतिहासिक सम्मेलन में दुनिया के 11 शक्तिशाली देशों के राष्ट्राध्यक्षों ने वैश्विक राजनीति और अर्थशास्त्र की नई दिशा तय की।

रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया संकट और अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में बढ़ते व्यापारिक शुल्कों (टैरिफ) के साये में हुए इस सम्मेलन पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी हुई थीं। मेजबान देश के तौर पर भारत के लिए यह आयोजन कूटनीतिक और रणनीतिक परीक्षा की तरह था। नई दिल्ली घोषणापत्र (New Delhi Declaration) पर आम सहमति बनाने से लेकर चीन और रूस के साथ संतुलन साधने तक, भारत की झोली में कई बड़ी उपलब्धियां आईं, तो कुछ मोर्चों पर चुनौतियां और चिंताएं भी जस की तस बनी रहीं। ऐतिहासिक ब्रिक्स आयोजन से भारत ने आख़िर क्या पाया और क्या खोया।

कूटनीतिक महाविजय: नई दिल्ली घोषणापत्र पर आम सहमति
सम्मेलन की सबसे बड़ी उपलब्धि ‘नई दिल्ली घोषणापत्र’ का सर्वसम्मति से पारित होना रहा। सम्मेलन शुरू होने से पहले विदेश मंत्रियों की बैठकों में ईरान और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के बीच गंभीर वैचारिक मतभेदों के चलते साझा बयान जारी नहीं हो सका था। ऐसे में प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने बेहतरीन कूटनीति का परिचय देते हुए पश्चिम एशिया और वैश्विक मुद्दों पर इन दोनों धुर-विरोधी देशों को एक मंच पर लाकर ऐतिहासिक सहमति बनाई।
चीन के साथ बर्फ पिघली (Diplomatic Thaw)
गल्वान घाटी विवाद के बाद लंबे समय से ठंडे बस्ते में पड़े भारत-चीन संबंधों में नई दिल्ली शिखर सम्मेलन के दौरान एक बड़ा मोड़ देखा गया। प्रधानमंत्री मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच हुई घंटे भर लंबी द्विपक्षीय बैठक ने दोनों देशों के बीच सीमा विवाद और व्यापारिक असंतुलन को सुलझाने के लिए एक नया रणनीतिक फ्रेमवर्क तैयार किया है, जिसे वैश्विक कूटनीति में एक बड़ी सफ़लता माना जा रहा है।
‘ग्लोबल साउथ’ के निर्विवाद नेता के रूप में उदय
भारत ने इस मंच का उपयोग विशुद्ध रूप से विकासशील और अविकसित देशों (Global South) की आवाज़ बुलंद करने के लिए किया। भारत ने ब्रिक्स (BRICS) को “बिल्डिंग रेजिलिएंस, इनोवेशन, कोऑपरेशन एंड सस्टेनेबिलिटी” के रूप में नया दार्शनिक रूप देकर यह साफ़ कर दिया कि भारत इसे किसी ‘पश्चिम-विरोधी’ गुट के तौर पर नहीं, बल्कि एक समावेशी विकासात्मक मंच के रूप में देखता है। भारत के डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (UPI, आधार) को वैश्विक मान्यता दिलाने की दिशा में भी यह एक बड़ा कदम साबित हुआ।
आतंकवाद पर सख्त रुख और अमेरिकी शुल्कों का विरोध
घोषणापत्र में सीमा पार आतंकवाद की कड़े शब्दों में निंदा की गई। साथ ही, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा लगाए जा रहे एकतरफा व्यापारिक टैरिफ और प्रतिबंधों के खिलाफ ब्रिक्स देशों ने एक सुर में आवाज़ उठाई, जिससे वैश्विक व्यापार में भारत के हितों को सुरक्षा मिली है।
226 अरब डॉलर का भारी-भरकम व्यापार घाटा (Trade Deficit)
ब्रिक्स मंच के आर्थिक एकीकरण के फायदों के बीच भारत के लिए सबसे बड़ी आर्थिक चिंता व्यापार असंतुलन की है। थिंक टैंक ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, ब्रिक्स देशों के साथ भारत का व्यापार घाटा पिछले पांच वर्षों में तीन गुना बढ़कर 226.1 अरब डॉलर तक पहुंच गया है। भारत इस मंच से अपनी वस्तुओं के लिए बाज़ार तक आसान पहुंच (Market Access) सुनिश्चित कराने की मांग कर रहा था, जिसमें कोई ठोस और तुरंत राहत मिलती नहीं दिखी।
ब्रिक्स के ‘चीन-केंद्रित’ होने का बढ़ता खतरा
भले ही भारत ने कूटनीतिक संतुलन बनाने की कोशिश की, लेकिन ब्रिक्स के हालिया विस्तार (अब 11 पूर्ण सदस्य) के बाद चीन का इस ब्लॉक पर दबदबा बढ़ता दिख रहा है。 शी जिनपिंग ने अफ्रीकी देशों के लिए ज़ीरो-टैरिफ नीति की घोषणा कर इस मंच पर अपनी आर्थिक चौधराहट को और मजबूत कर लिया। भारत के लिए यह चुनौती हमेशा बनी रहेगी कि वह ब्रिक्स को पूरी तरह बीजिंग के प्रभाव में जाने से कैसे रोके।
रूस-यूक्रेन मुद्दे पर चुप्पी और ‘डी-डॉलरलाइजेशन’ का दबाव
घोषणापत्र में रूस-यूक्रेन युद्ध का कोई जिक्र न होना भारत की ‘तटस्थता की मजबूरी’ को दर्शाता है, जिसे पश्चिमी देश (विशेषकर अमेरिका और यूरोपीय संघ) भारत की कूटनीतिक कमजोरी के रूप में देख सकते हैं। इसके अलावा, चीन और रूस द्वारा स्थानीय मुद्राओं में व्यापार (De-dollarization) को बढ़ावा देने के लिए बनाए जा रहे दबाव के बीच भारत को अपने सबसे बड़े रणनीतिक साझेदार अमेरिका के साथ संतुलन बिठाने में काफी मशक्कत करनी पड़ रही है।
कुल मिलाकर देखा जाए तो इस शिखर सम्मेलन से भारत की ‘लॉस’ (हानि) की तुलना में ‘गेन्स’ (लाभ) का पलड़ा काफी भारी रहा है। आर्थिक मोर्चे पर भले ही भारत को व्यापार घाटे जैसी चुनौतियों से निपटना बाकी है, लेकिन वैश्विक भू-राजनीति (Geopolitics) के मंच पर भारत ने यह साबित कर दिया है कि वह अमेरिका के नेतृत्व वाले पश्चिमी देशों और चीन-रूस के नेतृत्व वाले गुटों के बीच एक बेहद जरूरी और मजबूत सेतु (Bridge) का काम कर सकता है। प्रधान मंत्री मोदी के शब्दों में कहें तो ब्रिक्स अब विचारों से आगे बढ़कर “ठोस परिणामों का एक पारिस्थितिकी तंत्र” बन चुका है, और नई दिल्ली की धरती से इसकी दिशा तय कर भारत ने विश्व पटल पर अपनी नेतृत्व क्षमता का लोहा मनवाया है।




