गांधी जयंती, ‘शांतिदूत’ का चश्मा और अशांत भारत का हाई-वोल्टेज ड्रामा

“दे दी हमें आजादी बिना खड्ग बिना ढाल, साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल…”

हर साल 2 अक्टूबर को जब सुबह-सुबह लाउडस्पीकर पर यह भजन बजता है, तो दिल में एक अजीब सा सूकून उतर आता है। लेकिन तभी अचानक खिड़की से बाहर झांकिए—कहीं लाठियां चटक रही हैं, कहीं सोशल मीडिया पर ‘ट्रेंडिंग नफरत’ का बाज़ार गर्म है, और कहीं कोई टीवी एंकर चिल्ला-चिल्लाकर देश के नागरिकों से उनकी देशभक्ति का सर्टिफिकेट मांग रहा है। बापू का वह गोल चश्मा, जो कभी दूरदर्शिता का प्रतीक था, आज स्वच्छ भारत अभियान के पोस्टरों पर कचरे के डिब्बे की तलाश करता नजर आता है। भारत ने चांद के दक्षिणी ध्रुव पर तिरंगा फहरा दिया है, दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की कतार में खड़ा है, लेकिन वैचारिक मोर्चे पर हमारा देश इतना अशांत और सवाल करता भारत बन चुका है कि खुद गांधीजी भी स्वर्ग से अपनी लाठी ढूंढ रहे होंगे। आखिर इस ‘अशांति’ और तीखे सवालों की नौबत क्यों आई? आइए, गांधी जयंती के पावन अवसर पर कुछ कड़वे साक्ष्यों और तीखे कटाक्ष के साथ इसका पोस्टमार्टम करते हैं।

हम हर मंच से दुनिया को बुद्ध और गांधी का संदेश देते हैं। लेकिन जैसे ही इंस्टीट्यूट फॉर इकोनॉमिक्स एंड पीस (IEP) अपनी ग्लोबल पीस इंडेक्स (वैश्विक शांति सूचकांक) 2026 की रिपोर्ट जारी करता है, हमारी शांति की कलई खुल जाती है। इस सूचकांक में भारत दुनिया के 160 से अधिक देशों में 115वें के आसपास रेंग रहा है.

पैमाना (Indicator)हकीकत का आईनाव्यंग्यात्मक स्थिति
सामाजिक सुरक्षा और सुरक्षासड़कों पर गुस्सा (Road Rage) और सांप्रदायिक तनाव बढ़ा है।गांधी का ‘अहिंसा’ का सिद्धांत अब सिर्फ निबंध प्रतियोगिताओं में फर्स्ट प्राइज जीतने के काम आता है।
आंतरिक संघर्ष (Internal Conflicts)मणिपुर से लेकर विभिन्न राज्यों में धधकते आंतरिक असंतोष।हम यूक्रेन-रूस युद्ध रुकवाने का दावा करते हैं, पर अपने ही घर की आग बुझाने में पसीने छूट जाते हैं।

यह विरोधाभास किसी कॉमेडी शो से कम नहीं है। हम हर 2 अक्टूबर को राजघाट पर फूल चढ़ाकर ‘अहिंसा परमो धर्मः’ का जाप करते हैं, और 3 अक्टूबर को व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी पर किसी समुदाय विशेष के खिलाफ ‘डिजिटल हिंसा’ भड़काने में व्यस्त हो जाते हैं। गांधी जी ने ‘स्वावलंबन’ और ‘चरखे’ के जरिए आत्मनिर्भरता का पाठ पढ़ाया था। आज का युवा आत्मनिर्भर तो होना चाहता है, लेकिन उसके हाथ में चरखे की जगह सरकारी परीक्षाओं के लीक हुए पेपर और कैंसिलेशन नोटिस थमा दिए जाते हैं। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (CMIE) और हालिया रोजगार आंकड़ों के अनुसार, भारत में युवा बेरोजगारी दर 15-20% के खतरनाक स्तर पर मंडरा रही है। पढ़े-लिखे डिग्रीधारी युवा चपरासी और सफाईकर्मी के पदों के लिए कतारों में खड़े हैं। जब देश का युवा सवाल करता है कि “साहब, वैकेंसी कब आएगी?” तो व्यवस्था उसे ‘रील’ बनाने और 5G डेटा के नशे में झूमने की सलाह देती है। गांधी जयंती पर जब नेता मंच से भाषण देते हैं कि “युवा देश का भविष्य हैं,” तो बैकग्राउंड में लाठीचार्ज से घायल युवाओं की चीखें इस खोखले दावों पर सबसे बड़ा कटाक्ष करती हैं। यह अशांति सीमाओं पर नहीं, देश के भविष्य के दिलों में है।

गांधी जी का सबसे बड़ा हथियार था—सत्य। आज के डिजिटल भारत में ‘सत्य’ की परिभाषा बदल चुकी है। आज सत्य वह नहीं है जो तथ्यों पर आधारित हो, बल्कि सत्य वह है जिसे आईटी सेल (IT Cell) द्वारा हजार बार फॉरवर्ड करके सच मान लिया जाए। आरजीआई (RGI) और हेट स्पीच ट्रैकर के विश्लेषण बताते हैं कि पिछले कुछ वर्षों में सोशल मीडिया और चुनावी रैलियों में घृणास्पद भाषणों (Hate Speech) में 200% से अधिक की वृद्धि हुई है। गांधी जी के हत्यारे को ‘देशभक्त’ साबित करने की होड़ मची है। यह आज के भारत का सबसे डरावना सवाल है: हम गांधी के नाम पर विदेशी मेहमानों को साबरमती आश्रम ले जाते हैं, उनसे चरखा कतवाते हैं, लेकिन घरेलू राजनीति में गांधी के विचारों की हर दिन सरेआम लिंचिंग करते हैं। जब संसद से लेकर सड़कों तक नफरत की भाषा को ‘राष्ट्रवाद’ का नया नाम दे दिया जाए, तो समझ जाना चाहिए कि हमारा नैतिक कंपास पूरी तरह टूट चुका है। एक दौर था जब सत्ता की खामोशी पर सवाल उठते थे। आज का दौर वह है जहां शोर इतना ज्यादा है कि आम आदमी की बुनियादी चीख भी सुनाई नहीं देती। हर समस्या का समाधान ‘इवेंट मैनेजमेंट’ में ढूंढ लिया गया है। किसानों ने एमएसपी (MSP) मांगा? चलो, गांधी जयंती पर उन्हें कृषि सुधार के नाम पर भाषण पिला देते हैं। महिलाओं ने सुरक्षा मांगी? चलो, बापू के नाम पर एक नया वेबिनार आयोजित कर देते हैं। हमारा समाज उस मरीज़ की तरह हो गया है जिसे अंदरूनी ब्लीडिंग हो रही है, लेकिन डॉक्टर ऊपर से फेयरनेस क्रीम लगाकर कह रहा है— “वाह! चेहरा चमक रहा है।”

गांधी जयंती पर अशांत और सवाल करते भारत की नौबत इसलिए आई क्योंकि हमने गांधी को केवल करेंसी नोटों पर छापने और सरकारी दफ्तरों की दीवारों पर लटकाने की चीज बना दिया। हमने उनके विचारों की आत्मा को मारकर उसकी भव्य ममी (Mummy) बना दी है। भारत का अशांत होना इस बात का सबूत है कि देश की जनता अब झूठे दिलासों के ‘सत्य के प्रयोगों’ से थक चुकी है। सवाल पूछना लोकतंत्र की धड़कन है, और जब तक यह धड़कन चल रही है, तब तक उम्मीद जिंदा है। अगली बार जब आप बापू के तीन बंदरों को देखें, तो याद रखिएगा: आज के भारत में चौथा बंदर भी आ चुका है, जो कह रहा है— “अन्याय के खिलाफ सवाल उठाओ, वरना इतिहास तुम्हें कभी माफ नहीं करेगा।”

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