GenZ , सरकार , जंतरमंतर आन्दोलन, प्रधानमंत्री , दिमागी नक्सल, आज भारत की राजनीति में सबसे ज्यादा उच्चारित किया जाने वाला शब्द , व्यबहार है । क्या यह भारत के राजनीति का डर भी है । भारत का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि सरकार और प्रधानमंत्री इस ऊर्जावान, तकनीक-प्रेमी और बेबाक जेन-जी पीढ़ी के साथ कैसा व्यवहार करते हैं। युवाओं की जायज मांगों और असहमति को ‘दिमागी नक्सलवाद’ का नाम देकर खारिज करने के बजाय, यदि सरकार जंतर-मंतर जैसी सड़कों से उठने वाली आवाजों को ध्यान से सुनेगी और संवाद स्थापित करेगी, तभी देश सही मायने में मजबूत होगा।

भारत के समकालीन राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य में एक नया और अभूतपूर्व बदलाव देखने को मिल रहा है। इस बदलाव के केंद्र में है. ‘जेन-जी’ (Gen-Z), आज यह पीढ़ी केवल सोशल मीडिया रील्स या इंटरनेट मीम्स तक सीमित नहीं है, बल्कि देश की सरकार, प्रधानमंत्री की नीतियों और जंतर-मंतर जैसे ऐतिहासिक स्थलों पर होने वाले आंदोलनों में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा रही है। इसके साथ ही, वैचारिक ध्रुवीकरण के इस दौर में ‘दिमागी नक्सल’ (अर्बन नक्सल) जैसा शब्द भी इस विमर्श का एक अहम हिस्सा बन चुका है। इन सभी बिंदुओं के अंतर्संबंधों को समझना आज के भारत की राजनीति और भविष्य की दिशा को समझने के लिए अनिवार्य है।

जेन-जी भारत की वह पहली पीढ़ी है जो पूरी तरह से डिजिटल युग में पैदा और बड़ी हुई है। इस पीढ़ी के पास सूचनाओं का अंबार है और वे किसी भी बात को बिना तथ्यों के स्वीकार नहीं करते। पारंपरिक राजनीतिक विचारधाराओं (दक्षिणपंथ या वामपंथ) के प्रति इनका दृष्टिकोण अंधभक्तों जैसा नहीं है। यह पीढ़ी किसी दल विशेष से बंधने के बजाय मुद्दों पर ध्यान देती है। रोजगार, जलवायु परिवर्तन, मानसिक स्वास्थ्य, लैंगिक समानता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता इनके मुख्य सरोकार हैं। जेन-जी अपनी आवाज उठाने के लिए केवल सड़कों पर नहीं उतरती, बल्कि एक्स (ट्विटर), इंस्टाग्राम और यूट्यूब को अपना हथियार बनाती है।
एक छोटा सा हैशटैग देखते ही देखते देश का सबसे बड़ा डिजिटल आंदोलन बन जाता है। वर्तमान केंद्र सरकार ने पिछले एक दशक में डिजिटल इंडिया, स्टार्ट-अप इंडिया और नई शिक्षा नीति (NEP) जैसी योजनाओं के माध्यम से जेन-जी को आकर्षित करने का पूरा प्रयास किया है। सरकार का मानना है कि युवाओं को आत्मनिर्भर और तकनीकी रूप से सक्षम बनाकर ही देश को ‘विकसित भारत’ बनाया जा सकता है. दिल्ली का जंतर-मंतर दशकों से भारत में विरोध प्रदर्शनों का प्रतीक रहा है। लेकिन हाल के वर्षों में यहाँ होने वाले आंदोलनों का चरित्र बदला है, जिसमें जेन-जी की भागीदारी अभूतपूर्व रही है। चाहे वह किसानों का आंदोलन हो, पहलवानों का न्याय के लिए प्रदर्शन हो, या फिर अग्निपथ योजना और पेपर लीक के खिलाफ छात्रों का गुस्सा—जंतर-मंतर इन सब का गवाह बना है।
जेन-जी जब जंतर-मंतर पर आती है, तो वह अपने साथ केवल तख्तियां नहीं लाती, बल्कि लैपटॉप, स्मार्टफोन और लाइव स्ट्रीमिंग गियर भी लाती है। वे मुख्यधारा के मीडिया (Mainstream Media) पर निर्भर रहने के बजाय अपनी कहानी खुद दुनिया को दिखाते हैं। इन युवाओं की विशेषता यह है कि वे स्थापित राजनीतिक दलों के नेताओं को अपने मंचों पर आसानी से जगह नहीं देते। वे अपने आंदोलन को राजनीतिक रूप से ‘न्यूट्रल’ रखना चाहते हैं ताकि उनके वास्तविक मुद्दे न भटकें। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का युवाओं के साथ एक अनोखा और सीधा जुड़ाव रहा है। ‘परीक्षा पे चर्चा’ जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से वे सीधे स्कूल और कॉलेज के छात्रों से संवाद करते हैं। प्रधानमंत्री ने हमेशा युवाओं को देश का ‘गेम चेंजर’ बताया है। प्रधानमंत्री और उनकी टीम जेन-जी की भाषा और उनके प्लेटफॉर्म्स को बखूबी समझते हैं। वे रील्स, पॉडकास्टर्स के साथ इंटरव्यू और डिजिटल क्रिएटर्स अवार्ड्स के जरिए युवाओं के बीच अपनी पहुंच बनाए रखते हैं।
एक तरफ युवा प्रधानमंत्री के करिश्मे और देश को आगे ले जाने के उनके विजन की सराहना करते हैं, तो दूसरी तरफ जब नीतियां उनकी उम्मीदों पर खरी नहीं उतरतीं, तो यही युवा प्रधानमंत्री से सीधे जवाबदेही की मांग भी करते हैं। लोकतंत्र में प्रधानमंत्री से सीधे सवाल पूछने की यह प्रवृत्ति जेन-जी में सबसे अधिक देखी जा रही है। हाल के वर्षों में राजनीतिक विमर्श में ‘दिमागी नक्सल’ या ‘अर्बन नक्सल’ शब्द का प्रयोग तेजी से बढ़ा है। यह शब्द मूल रूप से उन बुद्धिजीवियों, शिक्षाविदों, कार्यकर्ताओं और विचारकों के लिए इस्तेमाल किया जाता है, जो कथित तौर पर शहरों, विश्वविद्यालयों और सोशल मीडिया पर बैठकर देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था और सरकार के खिलाफ एक नकारात्मक नैरेटिव या वैचारिक युद्ध चलाते हैं।विश्वविद्यालयों और इंटरनेट के माध्यम से जेन-जी इस वैचारिक जंग के सीधे प्रभाव में है। जब भी कोई युवा सरकार की किसी नीति का तीखा विरोध करता है या जंतर-मंतर पर जाकर बैठता है, तो सत्ता पक्ष या समर्थकों द्वारा अक्सर उन्हें ‘दिमागी नक्सल’ या ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ कहकर संबोधित कर दिया जाता है। यह विषय बेहद संवेदनशील है। सरकार का तर्क है कि बंदूकों से लड़ने वाले नक्सलियों से ज्यादा खतरनाक वे लोग हैं जो युवाओं के दिमाग में देश की संस्थाओं के प्रति नफरत का बीज बो रहे हैं। दूसरी ओर, आलोचकों और कई युवाओं का मानना है कि ‘दिमागी नक्सल’ का ठप्पा केवल सरकार विरोधी आवाजों, तार्किक सवालों और शांतिपूर्ण प्रदर्शनों को दबाने का एक राजनीतिक हथियार बन चुका है। जब हम जेन-जी, सरकार, जंतर-मंतर, प्रधानमंत्री और दिमागी नक्सल के इस पूरे ताने-बाने को एक साथ देखते हैं, तो भारतीय लोकतंत्र की एक बेहद जीवंत और जटिल तस्वीर उभरती है।
एक तरफ प्रधानमंत्री के नेतृत्व में सरकार देश को आर्थिक महाशक्ति बनाने की दिशा में अग्रसर है और युवाओं को तकनीक और नवाचार से जोड़ रही है। दूसरी तरफ, जागरूक जेन-जी केवल आर्थिक प्रगति से संतुष्ट नहीं है; उसे सामाजिक न्याय, पारदर्शिता और बोलने की आजादी भी चाहिए। जब सरकार इन मोर्चों पर विफल दिखती है, तो जंतर-मंतर जैसे आंदोलनों का जन्म होता है। इस पूरे घटनाक्रम में ‘दिमागी नक्सल’ का नैरेटिव एक विभाजक रेखा का काम करता है। यह युवाओं को दो गुटों में बांट देता है—एक वे जो राष्ट्रवाद के नाम पर सरकार के हर फैसले के साथ खड़े हैं, और दूसरे वे जो देशहित में ही सरकार से सवाल पूछना अपना कर्तव्य समझते हैं। जेन-जी की सबसे बड़ी चुनौती खुद को इस वैचारिक ध्रुवीकरण से बचाकर केवल राष्ट्र के वास्तविक विकास और बुनियादी मुद्दों पर ध्यान केंद्रित रखने की है। भारत का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि सरकार और प्रधानमंत्री इस ऊर्जावान, तकनीक-प्रेमी और बेबाक जेन-जी पीढ़ी के साथ कैसा व्यवहार करते हैं। युवाओं की जायज मांगों और असहमति को ‘दिमागी नक्सलवाद’ का नाम देकर खारिज करने के बजाय, यदि सरकार जंतर-मंतर जैसी सड़कों से उठने वाली आवाजों को ध्यान से सुनेगी और संवाद स्थापित करेगी, तभी देश सही मायने में मजबूत होगा। जेन-जी भारत की समस्या नहीं, बल्कि भारत की सबसे बड़ी ताकत है; जरूरत बस उनके जोश और चेतना को सही दिशा देने की है।




