जंतर-मंतर का धरना स्थल के रूप में ‘रिटायर’ होना भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास का एक बड़ा मोड़ है।

देश की राजधानी का वह प्रसिद्ध कोना, जो पिछले 33 वर्षों से अनगिनत जन-आंदोलनों, विरोध प्रदर्शनों, भूख हड़तालों और आम जनता की चीख-पुकार का गवाह रहा है, अब हमेशा के लिए खामोश होने जा रहा है। 12 अक्टूबर 2026 को केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस ने एक ऐतिहासिक व दूरगामी फैसला लेते हुए जंतर-मंतर को आधिकारिक धरना स्थल की सूची से हटा (De-notify) दिया है। केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा गठित एक उच्चस्तरीय समिति की सिफारिशों के आधार पर सरकार ने यह कदम उठाया है। अब दिल्ली में किसी भी प्रकार के विरोध-प्रदर्शन या धरने के लिए तीन नए मैदानों को अधिसूचित किया गया है सेंट्रल दिल्ली का रामलीला मैदान, नॉर्थ दिल्ली का बुराड़ी मैदान और ईस्ट दिल्ली का सीबीडी (CBD) ग्राउंड। सरकार के इस फैसले ने देश के राजनीतिक और सामाजिक हलकों में एक नई और तीखी बहस को जन्म दे दिया है। एक तरफ जहां इसे सुरक्षा और प्रशासनिक व्यवस्था के लिए जरूरी बताया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ विपक्ष और नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं द्वारा इसे जनता की आवाज दबाने और लोकतंत्र को हाशिए पर धकेलने का प्रयास करार दिया जा रहा है। सरकार के इस कदम के पीछे सबसे बड़ा कारण जंतर-मंतर की भौगोलिक स्थिति और उसकी अति-संवेदनशील वीवीआईपी (VVIP) क्षेत्र से निकटता को माना जा रहा है। जंतर-मंतर देश के संसद भवन, केंद्रीय सचिवालय और विभिन्न मंत्रालयों से महज 1.5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। हाल के महीनों में, विशेष रूप से कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) और मुख्य विपक्षी दलों द्वारा मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और चुनावी पुनरीक्षण (SIR) के मुद्दों को लेकर किए गए उग्र प्रदर्शनों के कारण इस पूरे इलाके की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर खतरा मंडराने लगा था। इन प्रदर्शनों के दौरान सुरक्षा बलों की भारी तैनाती, करीब 45 मेट्रो स्टेशनों के गेट बंद होने और इलाके में इंटरनेट बंद किए जाने के कारण दिल्ली की आम जनता को भारी प्रशासनिक और यातायात संबंधी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा था। गृह मंत्रालय की समिति का तर्क है कि लुटियंस दिल्ली जैसे उच्च सुरक्षा वाले प्रशासनिक क्षेत्र में लगातार होने वाले धरनों से न केवल सुरक्षा जोखिम बढ़ता है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक आवाजाही और स्थानीय व्यापार को भी प्रभावित करता है। इसलिए, प्रदर्शनों को संसद के आसपास के केंद्रीय प्रशासनिक क्षेत्र से दूर खुले मैदानों में स्थानांतरित करना समय की मांग बन चुका था।

जंतर-मंतर का ऐतिहासिक सफर: 1993 से 2026 तक
दिल्ली में विरोध प्रदर्शनों के पते बदलने का यह कोई पहला मामला नहीं है। 1988 में प्रसिद्ध किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में लाखों किसानों ने दिल्ली के ‘बोट क्लब’ (इंडिया गेट के पास) को घेर लिया था। उस ऐतिहासिक आंदोलन के बाद, सरकार ने सुरक्षा कारणों से 1993 में बोट क्लब पर प्रदर्शनों को पूरी तरह प्रतिबंधित कर जंतर-मंतर रोड को नया धरना स्थल घोषित किया था। पिछले 33 वर्षों में जंतर-मंतर केवल एक सड़क का नाम नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र में प्रतिरोध की एक सशक्त पहचान बन गया। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, यहां हर साल हजारों छोटे-बड़े धरने आयोजित किए जाते थे। इस स्थान ने भारतीय राजनीति और समाज को बदलने वाले कई ऐतिहासिक आंदोलन देखे हैं।
- नर्मदा बचाओ आंदोलन (1990 का दशक): मेधा पाटकर और विस्थापितों की लंबी कानूनी व सामाजिक लड़ाई।
- अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन (2011): जिसने देश की सियासत को बदल कर रख दिया और लोकपाल कानून की नींव रखी।
- निर्भया आंदोलन (2012): महिला सुरक्षा और सख्त कानूनों के लिए पूरे देश के युवाओं का स्वतः स्फूर्त उबाल।
- वन रैंक-वन पेंशन आंदोलन (2015): पूर्व सैनिकों का अपनी मांगों के लिए लंबा संघर्ष।
- हालिया छात्र व युवा आंदोलन (2026): पेपर लीक मामले को लेकर हुए हालिया उग्र प्रदर्शन।
दिल्ली पुलिस द्वारा जारी नए आदेश के अनुसार, प्रदर्शनकारियों के लिए अब तीन विकल्प होंगे, जिनके लिए एक विस्तृत स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) जारी किया जाएगा: [1]
| प्रदर्शन स्थल | स्थान (Location) | जंतर-मंतर से दूरी | ऐतिहासिक महत्व / विशेषताएं |
|---|---|---|---|
| रामलीला मैदान | सेंट्रल दिल्ली | ~3 किलोमीटर | जयप्रकाश नारायण (1975) और अन्ना आंदोलन (2011) का ऐतिहासिक गवाह। यह नए स्थलों में संसद के सबसे नजदीक है। |
| बुराड़ी ग्राउंड | उत्तर-पश्चिमी दिल्ली | ~21 किलोमीटर | यह दिल्ली के बाहरी छोर पर स्थित एक विशाल मैदान है, जिसे 2020 के किसान आंदोलन के दौरान भी सरकार ने चिन्हित किया था। |
| सीबीडी (CBD) ग्राउंड | पूर्वी दिल्ली | ~13 किलोमीटर | कड़कड़डूमा कोर्ट के पास स्थित यह मैदान पूर्वी दिल्ली के प्रदर्शनकारियों के लिए एक नया केंद्र होगा। |

सरकार के इस फैसले पर विपक्षी दलों और नागरिक अधिकार संगठनों ने बेहद तीखी प्रतिक्रिया दी है। कांग्रेस नेता जयराम रमेश और सीजेपी (CJP) के संस्थापकों ने इसे एक ‘तानाशाहीपूर्ण और मनमाना’ फैसला बताया है।आंदोलनकारियों का मुख्य तर्क यह है कि किसी भी शांतिपूर्ण प्रदर्शन का मूल उद्देश्य सरकार, नीति-निर्माताओं और मीडिया का ध्यान अपनी मांगों की ओर आकर्षित करना होता है। जंतर-मंतर संसद और मंत्रालयों के करीब था, इसलिए वहां की गई कोई भी घोषणा सीधे सत्ता के गलियारों तक गूंजती थी। प्रदर्शनों को दिल्ली के बाहरी इलाकों जैसे बुराड़ी या सीबीडी ग्राउंड में भेजने का मतलब है कि जनता की आवाज को सत्ता के केंद्र से इतनी दूर कर देना कि सरकार तक उसकी गूंज ही न पहुंचे। प्रसिद्ध कानूनविदों का यह भी कहना है कि संविधान का अनुच्छेद 19(1)(b) देश के प्रत्येक नागरिक को बिना हथियारों के शांतिपूर्ण ढंग से एकत्र होने और विरोध दर्ज कराने का मौलिक अधिकार देता है। सरकार सुरक्षा के नाम पर उचित प्रतिबंध तो लगा सकती है, लेकिन नागरिकों को शहर के किसी दूरदराज कोने में ‘सीमित या नजरबंद’ करने जैसा माहौल नहीं बना सकती। इस मामले को लेकर पहले ही दिल्ली हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दायर की जा चुकी हैं, जिन पर कानूनी लड़ाई शुरू हो गई है। जंतर-मंतर का धरना स्थल के रूप में ‘रिटायर’ होना भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास का एक बड़ा मोड़ है। सुरक्षा और आम जनता की सहूलियत के नजरिए से सरकार का यह तर्क सही हो सकता है कि लुटियंस दिल्ली में रोज-रोज के ट्रैफिक जाम और प्रतिबंधों से मुक्ति मिलनी चाहिए। लेकिन दूसरी तरफ, यह भी सुनिश्चित करना अनिवार्य है कि नए घोषित स्थलों पर प्रदर्शनकारियों को अपनी बात रखने की पूरी आजादी और बुनियादी सुविधाएं मिलें। लोकतंत्र की खूबसूरती केवल आलीशान इमारतों में नहीं, बल्कि सड़क पर खड़े आखिरी व्यक्ति की आवाज को सुने जाने में है। देखना यह होगा कि न्यायपालिका इस संवेदनशील विषय पर क्या रुख अपनाती है और आने वाले समय में देश के भावी जन-आंदोलन रामलीला मैदान या बुराड़ी की धरती से सत्ता को कितना प्रभावित कर पाते हैं।



