“रिश्ते खून से ही नहीं बनते, कुछ रिश्ते जीवन की रिक्तता को अपने स्नेह से भर देते हैं। यही दिवाली की सबसे खूबसूरत रोशनी है।”

यह विचार सुनने में जितना दिव्य और मनभावन लगता है, आज के भारत के क्रूर सामाजिक यथार्थ के धरातल पर यह उतना ही खोखला और बेमानी प्रतीत होता है। हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं जहाँ दिवाली की चमक तो साल-दर-साल बढ़ रही है, लेकिन मानवीय संवेदनाओं और आपसी रिश्तों का दीया लगातार बुझता जा रहा है। आज का भारत एक ऐसी आत्ममुग्ध और उपभोक्तावादी संस्कृति की चपेट में है, जहाँ “दीपक की तरह किसी के जीवन में भरोसे की लौ बनना” तो दूर, लोग एक-दूसरे की उम्मीदों को बुझाने में भी संकोच नहीं करते। आज की दिवाली का फलसफा स्नेह और भरोसे से नहीं, बल्कि कॉरपोरेट विज्ञापनों और सोशल मीडिया की वर्चुअल दुनिया से तय होता है। “दिवाली की असली खुशी तब मिलती है, जब आपके आसपास कुछ ऐसे लोग हों, जिनकी मौजूदगी आपको अपनेपन का एहसास कराती हो।” लेकिन हकीकत यह है कि आज हमारे पास लोग नहीं, केवल ‘फॉलोअर्स’ और ‘कांटेक्ट लिस्ट’ हैं। आज के भारत का मध्यवर्ग त्योहारों के दिन भी अपने कमरों में बंद होकर स्मार्टफोन की स्क्रीन पर ‘हैप्पी दिवाली’ के रेडीमेड मैसेज फॉरवर्ड करने में व्यस्त है। जो त्योहार कभी पड़ोसियों के घर जाकर गले मिलने, हाथ से बनाई गुझिया बांटने और एक-दूसरे के सुख-दुख साझा करने का माध्यम था, वह अब केवल इंस्टाग्राम रील्स और फेसबुक स्टेटस के ‘लाइक्स’ बटोरने का जरिया बन चुका है। त्योहार अब दिलों को जोड़ने का नहीं, बल्कि अपनी हैसियत की नुमाइश करने का मंच बन गए हैं। महंगे उपहारों का आदान-प्रदान इस उम्मीद में किया जाता है कि सामने वाले से उससे भी बड़ा रिटर्न मिले। इस व्यावसायिकता के बीच वह निश्छल स्नेह कहीं खो गया है जो किसी के जीवन की रिक्तता को भरता था।

“किसी को हौसला देना और किसी को यह महसूस कराना कि वह अकेला नहीं है, यही तो त्योहार की सबसे बड़ी सार्थकता है।” लेकिन आज के भारतीय समाज की तीखी आलोचना इस बात पर होनी चाहिए कि हम मानसिक स्वास्थ्य और अकेलेपन के एक भयानक संकट से गुजर रहे हैं। भारत के महानगरों—दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु—की ऊंची-ऊंची सोसायटियों में दिवाली पर लाखों रुपये की रोशनी जगमगाती है, लेकिन उन्हीं इमारतों के किसी फ्लैट में कोई बुजुर्ग या अकेला नौजवान अवसाद में डूबा रहता है। आज हमें अपने बगल के फ्लैट में रहने वाले व्यक्ति का नाम तक नहीं पता। यदि कोई अकेला है, तो समाज उसे सहारा देने के बजाय उसकी निजता (privacy) के नाम पर दूरी बना लेता है। आज के बदलते भारत का एक कड़वा उदाहरण ओल्ड एज होम्स (वृद्धाश्रमों) की बढ़ती संख्या है। बच्चे विदेशों या बड़े शहरों में दीपोत्सव मना रहे हैं और जिन माता-पिता ने उनके जीवन में भरोसे की लौ जलाई थी, वे त्योहार के दिन सूने आंगन में अपनों की राह देख रहे होते हैं। यह आधुनिक भारत के विकास का वह काला चेहरा है जिसे हम चमकीली लाइटों के पीछे छिपाने की कोशिश करते हैं।

त्योहारों की सार्थकता इस बात में थी कि वे मनुष्य को अधिक मानवीय, संवेदनशील और करुणामय बनाएं। लेकिन आज जब देश में जाति, धर्म और वैचारिक मतभेदों के नाम पर समाज को लगातार बांटा जा रहा है, तब यह त्योहार केवल एक औपचारिकता बनकर रह गया है। सोशल मीडिया पर एक-दूसरे को नीचा दिखाने वाली ट्रोल सेनाएं दिवाली के दिन भी नफरत फैलाने से बाज नहीं आतीं। जब समाज के भीतर एक-दूसरे के प्रति इतनी कड़वाहट भरी हो, तो दीपों की रोशनी अंतरात्मा के अंधकार को कैसे मिटा सकती है? बाजार में मिट्टी के दीये बेचने वाले गरीब कामगारों से ₹2 के लिए बहस करने वाला अमीर वर्ग जब मॉल में जाकर हजारों के पटाखे खरीदता है, तब त्योहार की पूरी सार्थकता शर्मसार हो जाती है। हम किसी के जीवन में हौसला क्या खाक बनेंगे, जब हम अपने से कमजोर को सम्मान तक नहीं दे पाते।

“शुभ दीपावली” का वास्तविक अर्थ तब तक चरितार्थ नहीं हो सकता, जब तक हम अपनी भौतिकवादी मानसिकता को छोड़कर वास्तविक इंसानी रिश्तों की कद्र करना नहीं सीखते। बाहरी तौर पर भारत भले ही आधुनिक और डिजिटल हो रहा हो, लेकिन भावनात्मक रूप से हम एक दरिद्र समाज बनते जा रहे हैं। यदि हमें दिवाली को केवल एक कैलेंडर की तारीख बनने से बचाना है, तो हमें विज्ञापनों के चंगुल से बाहर निकलना होगा। किसी उदास चेहरे पर सच्ची मुस्कान लाना, किसी असहाय के लिए भरोसे की दीवार बनना और बिना किसी स्वार्थ के किसी अजनबी को भी अपनेपन का अहसास कराना ही इस त्योहार की असली रोशनी है। जब तक हम ऐसा नहीं करते, तब तक ये दीप सिर्फ तेल और बाती का खेल रहेंगे, इनमें संस्कृति और मानवता की जीवंत परंपरा की लौ कभी नहीं जल पाएगी।