डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह,सहज़,हरदा,मध्य प्रदेश,

बंद आंखों से कोई भी मंज़र हम देखा नहीं करते, तेरे फ़िराक़ में हम अब ख़ुद को तन्हा नहीं करते।
अजनबी बस्ती में कोई भी आशना नहीं मिलता, अपने साए से भी दोस्तों हम ग़िला नहीं करते।
महफ़िले अग़यार में कौन सुनेगा मेरे दिल की, झूठे वादों से तेरे दिल को बहलाया नहीं करते।
राहे इश्क में हर मोड़ पर जब मिला हो धोखा, उसी राह पर क़दम फ़िर से ले जाया नहीं करते।
एक उम्र गुज़ार दी हमने तेरी तलाश में मुश्ताक़, हक़ीक़त के संग्रेज़ों से अब टकराया नहीं करते।




