एक जगह हो तो कहें सखि। दर्द इधर भी है तो दर्द उधर भी है। दर्द तो सही पर उलझन सारे देश को ग्रसित कर रखा है। कहीं श्रमिक शहर छोड़ रहे हैं तो कहीं अपने अधिकार के लिए रोड़ पर हंगामा कर रहे है पर साहब के नजर में सब चंगा सी। रोड़ का मजदूर पाकिस्तान कनेक्शन वाला तो शहर छोड़ने वाला अफवाह फैलाने वाला, सब भ्रम है ,है सब मायाजाल । इस बीच शासक भुंजा खा रहा है ….. जब सियासत ने गंठिया वात लगा दिया हो, सांसत में फंसी जान हो तो किस किस पोर का इलाज कराऐं।समझ से परे है …

कुछ एैसी ही मुश्किलों से गुजर रही हैं देश और बिहार की राजनीति। जिस आर्थिक सुधार का ताना बाना बीते दो दशक से देश और राज्य में बुना जा रहा है, उसके भविष्य को लेकर अब कई तरह के सवाल उठने लगे हैं। यह लगने लगा है कि यह ताना बाना जमीन से ऊपर बुना जा रहा था। जमीन पर रहने वाले नागरिकों की जगह हवा में उड़ते उपभोक्ताओं के लिए अर्थव्यवस्था का खांचा बनाया गया, इसलिए कई सवाल एक साथ उठ सकते हैं। मसलन, क्या इन बीस बरसों में कुर्सी की राजनीति भी जमीन से उठ कर हवा में गोते लगाने लगी है? क्या लोकतंत्र का राग अलापती चुनावी प्रक्रिया भी लोगों के वोट से ऊपर उठ गई है? क्या सरकार का टिकना या चलना, जनता की आकांक्षाओं पर निर्भर नहीं रहा? क्या सत्ता का मतलब चुने हुए नुमाइंदों से हट कर कुछ और हो गया? जाहिर है, ये सभी सवाल राजनीतिक हैं। तो क्या यह मान लिया जाए कि असल में इस दौर में राजनीतिक शून्यता गहराती चली गई और इस वक्त देश एक ऐसे मुहाने पर आ खड़ा हुआ है, जहां विकल्प का सवाल भी विकल्पहीन हो चला है? प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री चाहे जितने बेदाग़ हों, लेकिन क्या यह काफी है? क्या प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री को सिर्फ निजी ईमानदारी के दावे से आंका जाएगा? क्या प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री अपने मंत्रिमंडल के सदस्यों की जवाबदेही से बच सकते हैं? एक अहम सवाल यह भी है कि क्या दाग़दार लोग कभी बेदाग़ नीतियां बना सकते हैं? जाहिर है कि यहां सवाल सीधे सरकार का है, जिसे जनता ने चुना है, लेकिन यहीं से राजनीतिक शून्यता का वह सिलसिला शुरू होता है, जो बताता है कि जनता की चुनी गई सरकार, लगातार ख़ुद की सत्ता बनाए रखने के लिए, लोकतंत्र का अवमूल्यन करते जाने से बाज नहीं आती।
आज की राजनीति के चाल, चरित्र और चेहरे को ध्यान में रखकर कुछ कालखंड को याद करें तो वह बिहार की राजनीति का स्वर्णकाल प्रतीत होता है। बिहार को राजनीति का रिसर्च सेंटर कहा जाता है। 1952 तक बिहार देश का सबसे सुशासित राज्य था और इसी बिहार में, जो 270 ईसा पूर्व में मगध था, सम्राट अशोक ने प्रशासन प्रणाली एक ढाँचा विकसित किया था. आज भी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर यह बहस चल रही है कि क्या सम्राट अशोक ने ही आधुनिक खुली अर्थव्यवस्था की नींव रखी थी.लेकिन यह विडंबना है कि समकालीन राजनीति में उसी बिहार का उल्लेख सबसे अराजक राज्य के रुप में होता है. इसी बिहार ने आज़ादी के बाद का देश का अकेला जनआंदोलन खड़ा किया लेकिन यही बिहार ग़रीबी और कुपोषण से लेकर राजनीति के अपराधीकरण तक के लिए बदनाम भी सबसे अधिक हुआ.हाल के दिनों में आंकड़ो ने बिहार के बदलने के संकेत दिए हैं लेकिन ज़मीनी स्थिति कितनी बदली है यह अभी अस्पष्ट है. राजनीति क्या है इसे समझना इतना आसान भी नहीं है कहा जाता है कि केंद्र में सरकार बनाने का रास्ता यूपी और बिहार से गुजरता है, उसमें बिहार का राजनीतिक इतिहास काफी अनोखा एवं ऐतिहासिक रहा है ! यह भी माना जाता है कि दुनिया का पहला लोकतंत्र बिहार के वैशाली में जन्म लिया था और आजादी के समय बिहार भारत का एक कुशल राज्य माना जाता था ! आज की स्थिति आप जानते हैं !
बिहार के राजनीति में जाति धर्म, वर्चस्व एवं ब्रांड का अहम रोल रहा है ! ऐसा माना जाता है कि जब भी राजनीति में बड़े बदलाव की पटकथा लिखी गई, उसमे बिहार का बड़ा योगदान था। यह आज़ादी से पहले और आज़ादी के बाद भी समान रूप से चलता रहा। जेपी आंदोलन हो या आपातकाल बिहार की सहभागिता हमेशा देश के अन्य राज्यों के मुकाबले ज्यादा ही रही। बिहार की वर्तमान राजनीति में भी बड़े बदलाव के तो नही लेकिन उलटफेर के संकेत दिख रहे हैं। जातिवाद, भष्टाचार, हिंसा, और सांप्रदायिकता का बिहार की राजनीति के साथ चोली दामन का साथ है.यह बात सोलह आने सच है कि राजनीति का ज्ञान तो बिहारियों के दिमाग में कूट कूट कर भरी हुई है। मौसम चाहे चुनावी हो या कोई भी आप यहां के किसी भी पान की गुमटी वाले या फिर चाय की दुकान वाले से कभी भी बिहार की राजनीति पर खुलकर चर्चा कर सकते हैं। कहने का मतलब यह है कि पॉलिटिक्स के नॉलेज में हम बिहारी कभी भी खुद को किसी से कम नहीं आंकते। हमारे यहां घर से लेकर गली और इन गलियों से लेकर मुहल्ले के हर चौक चौराहे पर आए दिन आपको कुछ लोग राज्य या देश की सियासत पर कुछ कहते सुनते जरुर नजर आ जाएंगे। दिलचस्प यह भी है कि राजनीति जैसे विषय पर हमारे यहां बच्चे, बूढ़े और जवान सभी के पास कहने के लिेए या फिर अपनी राय व्यक्त करने के लिेए कुछ ना कुछ ज्ञान जरूर होता है। बिहार की राजनीति पर कोई बात चले और लालू प्रसाद यादव का जिक्र ना हो ऐसा नामुमकिन है। यकीनन पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव आधुनिक बिहार में पिछड़ों के नायक के तौर पर जाने जाते हैं। बिहार में पिछड़े मुसलमानों की तादाद ज्यादा है और वह अपना अलग राजनीतिक महत्व रखते हैं। राज्य की सियासत में इनका महत्व काफी ज्यादा है। यकीनन राज्य की जाति आधारित राजनीति को विकास आधारित राजनीति में कुछ हद तक ले जाने का श्रेय अगर किसी को जायेगा तो वे हैं नीतीश कुमार। मौसमी नेता रामविलास पासवान.उपेंन्द्र कुशवाहा.पप्पु यादव.जीतन राम मांझी राजनीति के अपराधीकरण और जाति धर्म के पैदायिस ही तो हैं। आपको ज्यादा इधर उधर न भटकाते हुए मुद्दे की बात करते हैं। आज की तिथि में सबसे बड़ा मुद्दा गठबंधन की स्थिरता है।

गठबंधन सिर्फ इसलिए क्योंकि पक्ष और विपक्ष दोनो ही गठबंधन के भरोसे हैं। एक तरफ जहां विपक्ष में कांग्रेस राजद जैसे दल अन्य सहयोगियों के साथ सरकार की मुश्किलें बढ़ाने को बेताब हैं वहीं दूसरी तरफ नीतीश बिना किसी रिस्क के यह पहले ही तय कर लेना चाहते हैं कि बीजेपी, जदयू, रालोसपा,लोजपा के इस गठबंधन में उनकी सहभागिता क्या होगी? सीट बंटवारे का पैमाना और संख्या क्या होगा? नीतीश राजनीति के मंझे खिलाड़ी हैं। वह बिहार में एक बड़ा चेहरा हैं इसमे कहीं कोई संदेह नही लेकिन जिस मोदी लहर में नीतीश का दल महज दो सीटों पर अटक गया था वो क्या 2019 में नीतीश उसके खेवनहार बनेंगे? क्या बीजेपी उन्हें उनके मनमुताबिक सीटें देगी? अगर देगी तो यह तय है कि बाकी लोजपा और रालोसपा जैसे दलों पर इसका असर पड़ेगा और गठबंधन को ऐसे में नुकसान उठाना पड़ सकता है। खैर 2019 से पहले सीटों की इस खींचतान में कौन 19 और कौन 20 साबित होगा यह तो वक़्त बताएगा लेकिन इतना तय है कि राजनीति में हमेशा संभावनाओं का द्वार खुला माना जाता है। ऐसे में भले ही बीजेपी की पास बिहार की राजनीति में कोई विकल्प न हो लेकिन जदयू के लिए विकल्पों के दरवाजा खुला है। नीतीश बीजेपी में आने से पहले एक सर्वमान्य नेता रह चुके हैं। वह वापस उस राजनीति में जा सकते हैं, और चले भी गए तो किसी को भी कोई शंका, संदेह या आश्चर्य नही होना चाहिए।इसके अलावा नीतीश की राजनीति को जितना अब तक समझा जा सका है वह तोल मोल में माहिर रहे हैं। चाहे बात 2014 चुनाव से पहले पीएम उम्मीदवार के रूप में नरेंद्र मोदी के नाम पर बीजेपी से नाता तोड़ने की बात हो या 2015 चुनाव से पहले लालू को नीतीश के चेहरे के नाम पर मजबूर कर देने की, जदयू और नीतीश इस राजनीतिक शतरंज़ के बादशाह रहे हैं। मोदी की अपनी अलग यूएसपी है और उनके चेहरे के दम पर बीजेपी आज 20 से ज्यादा राज्यों में सत्ता में है। ऐसे में देखना होगा कि बिहार की राजनीति किस करवट बदलती है और कौन इसका बाजीगर बनता है। अन्य उत्तर भारतीय राज्यों की तरह ही बिहार भी लंबे समय तक कांग्रेस के प्रभाव में रहा है. चार छोटे ग़ैर कांग्रेस सरकारों के कार्यकाल को छोड़ दें तो 1946 से वर्ष 1990 तक राज्य में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ही सत्तारुढ़ रही. बिहार को राजनीतिक रुप से काफ़ी जागरुक माना जाता है लेकिन यह राजनीतिक रुप से सबसे अस्थिर राज्यों में से भी रहा है.

शायद यही वजह है कि वर्ष 1961 में श्रीकृष्ण सिन्हा के मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद 1990 तक क़रीब तीस सालों में 23 बार मुख्यमंत्री बदले और पाँच बार राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाना पड़ा.संगठन के स्तर पर कांग्रेस पार्टी राज्य स्तर पर कमज़ोर होती रही और केंद्रीय नेतृत्व हावी होता चला गया. लेकिन साफ़ दिखता है कि बिहार की राजनीतिक लगाम उसके हाथों से भी फिसलती रही. जिन तीस सालों में 23 मुख्यमंत्री बदले उनमें से 17 कांग्रेस के थे.जेपी के आंदोलन ने बिहार में एक नए नेतृत्व को जन्म दिया. लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार उसी की उपज थे.ये नई पीढ़ी राममनोहर लोहिया और जेपी के प्रभाव में जाति तोड़ो आंदोलन की हामी थी.अस्सी के दशक के अंत आते आते उनकी विचारधारा बदलने लगी थी.वर्ष 1989 में जब केंद्र में वीपी सिंह के प्रधानमंत्रित्व काल में जनता दल सरकार ने मंडल आयोग की रिपोर्ट को लागू किया तो बिहार के नेता लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार और रामविलास पासवान उसके सबसे बड़े समर्थकों में से थे.इसके बाद बिहार में लालू प्रसाद यादव का उदय हुआ. लालू राबड़ी के तीन कार्यकालों के बाद बिहार में एक परिवर्तन आया और राष्ट्रीय जनता दल को हार का सामना करना पड़ा. नीतीश की सरकार बनी उन्होंने बिहार को राजनीति के अपराधीकरण से मुक्ति दिलाने और विकास के रास्ते पर चलाने का वादा किया। ऐसा माना जाता है कि नीतीश ने राजनीति में बड़े बदलाव की और खुद को सुशासन बाबू के तौर पर स्थापित भी किया। एक समय ऐसा भी आया जब ’संघ मुक्त भारत’ बनाने और ’मिट्टी में मिल जाने मगर भाजपा के साथ हाथ नहीं मिलाने’ की बातें करते रहे नीतीश कुमार ने अपने महागठबंधन सरकार के बड़े पार्टनर लालू प्रसाद यादव और उनके राजनीतिक कुनबे के ’भ्रष्टाचार’ से ’आजिज’ आकर अपना त्यागपत्र सौंपा तो लोगों को लगा कि राजनीति में भ्रष्टाचार के विरुद्ध नीतीश कुमार ने बड़ा साहसिक क़दम उठाया है. कुछ ही घंटों में नीतीश कुमार को न सिर्फ एनडीए का समर्थन मिला बल्कि उनके सरकार में शामिल होने की घोषणा हुई, इससे नीतीश के ’साहसिक क़दम’ की हवा निकल गई.हालांकि इसके साथ ही विपक्षी एकता और सांप्रदायिक ताक़तों के साथ संघर्ष की अपनी प्रतिबद्धता के इजहार, कांग्रेस के नेताओं से मुलाकात और उप राष्ट्रपति के चुनाव में विपक्ष के उम्मीदवार के समर्थन की बात कर विपक्ष को भी झांसे में रखे हुए थे.इस सबके बावजूद नीतीश कुमार की राजनीति में मूल्य, नैतिकता और ईमानदारी के तत्व देखनेवाले राजनीतिक प्रेक्षकों का मानना है कि अगर वह अपने त्यागपत्र के साथ ही विधानसभा भंग करवाकर नए चुनाव कराने की सिफ़ारिश करते तो कुछ और बात होती.मगर ऐसा उनकी पहले से ही तैयार पटकथा में लिखा ही नहीं था और उन्होंने भ्रष्टाचार के विरुद्ध अपनी प्रतिबद्धता के नाम पर उनसे हाथ मिला लिया जिन्हें वह मनुवादी, सांप्रदायिक, फ़ासिस्ट करार देते हुए ’संघ मुक्त भारत’ की बातें करते थे.बिहारियों पर कटाक्ष के ख़लिाफ़ अभियान के तहत हज़ारों डीएनए सैम्पल भिजवाने वालों और उनकी खिल्ली उड़ाने वालों का डीएनए मैच कर गया.डा. राममनोहर लोहिया के नाम पर राजनीति करनेवाले तमाम कथित समाजवादियों की यह आदत रही है कि अपनी सुविधा के हिसाब से कभी गैर कांग्रेसवाद और भ्रष्टाचार के विरोध के नाम पर जनसंघ और भाजपा के साथ हो लेते हैं.और जब किसी वजह से असुविधा महसूस हुई तो सांप्रदायिकता और मनुवाद के विरोध के नाम पर कांग्रेस के साथ हाथ मिला लेने में भी उन्हें कोई संकोच नहीं हुआ.आपको याद ही होगा लोकसभा का चुनाव बुरी तरह से हारने के तुरंत बाद ही नीतिश को एहसास हुआ कि भाजपा और आरएसएस की चुनौतियों का जवाब वह अकेले नहीं दे सकते. और बिना समय गंवाए वह लालू प्रसाद के पास पहुंच गए जिनके साथ उनका दो दशकों से छत्तीस का आंकड़ा था.लालू प्रसाद उस समय भी चारा घोटाले में सज़ायाफ्ता थे और आज भी हैं लेकिन तब शायद सांप्रदायिकता के जवाब में भ्रष्टाचार और परिवारवाद गौण हो गया.उन्होंने लालू प्रसाद को समझाया (लालू प्रसाद के शब्दों में कहें तो गिड़गिड़ाया) कि दोनों के एकजुट हुए बगैर बीजेपी को बिहार में शिकस्त नहीं दी जा सकती.बाद में अपनी चुनौती को और मज़बूत बनाने की गरज से कांग्रेस को भी साथ लेकर महागठबंधन तैयार कर लिया गया.इसका नतीजा यह हुआ कि बिहार के दलितों, महादलितों, पिछड़ी, अति पिछड़ी जातियों और अल्पसंख्यकों ने एकजुट होकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह के नेतृत्व में देश भर में चल रहे बीजेपी के विजय रथ को रोक दिया.
तीन चौथाई बहुमत के साथ नीतीश कुमार के नेतृत्व में महागठबंधन की सरकार बन गई बावजूद इसके कि ज़्यादा (80) विधायक राजद के जीत कर आए थे और जदयू के केवल 70 विधायक ही जीत सके थे.कांग्रेस के खाते में 27 विधायक आए थे. सरकार के गठन में भी नीतीश कुमार ने बड़ी चालाकी से मुख्यमंत्री पद के साथ ही विधानसभाध्यक्ष का पद भी अपने पास रख लिया ताकि गाढ़े समय में काम आ सके आए भी।. इस बीच और ख़ास तौर पर उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव के बाद से ही नीतीश कुमार को यह लगने लगा कि 2019 में भी नरेंद्र मोदी को शिकस्त दे पाना मुश्किल है.साथ ही उन्हें समझ में आया कि 2019 में उन्हें विपक्ष के तथाकथित महागठबंधन की धुरी और चेहरा बनाने की बात जितनी भी की जा रही हो, बिहार में महज दर्जन भर सांसद जिता पाने की अपनी राजनीतिक ताक़त के मद्देनज़र देश के शीर्ष नेतृत्व को पाने की उनकी महत्वाकांक्षा पूरी होनी मुश्किल है.कांग्रेस का नेतृत्व उन्हें मोदी के विकल्प के रूप में पेश करने को भी तैयार नहीं था. ऐसे में सुशील मोदी और अरुण जेटली के ज़रिए भाजपा आलाकमान तक भी अपने राजनीतिक तार जोड़े हुए थे.नीतीश कुमार का अपने राजनीतिक भविष्य के बारे में चाहे जो भी आकलन रहा हो, नरेंद्र मोदी उन्हें अपने लिए भविष्य की चुनौती ही मानते थे. इसलिए उन्होंने अतीत की सारी कड़वाहटों को भुलाकर नीतीश कुमार को अपनी शरण में लेने के लिए हामी भर दी.हालांकि नरेंद्र मोदी की राजनीतिक कार्यशैली को जानने और समझानेवाले लोग जानते हैं कि उन्हें कभी आंख दिखानेवाले उनके राजनीतिक विरोधियों को वह आसानी से माफ़ नहीं कर पाते. और अब तो कभी उन्हें आंख ही नहीं दिखाने बल्कि अपमानित करनेवाले नीतीश कुमार उनके शरणागत भी हैं. अभी बिहार की राजनीति के दो सबसे बड़े परिवारों में इन दिनों घमासान छिड़ा है। नंबर एक परिवार लालू प्रसाद का और नंबर दो रामविलास पासवान का है। लालू और पासवान दोनों ने परिवार के सभी सदस्यों को राजनीति में स्थापित करने और सबको कुछ न कुछ देने का कम प्रयास नहीं किया इसके बावजूद परिवार का झगड़ा थम नहीं रहा है। लालू प्रसाद के दोनों बेटों तेज प्रताप यादव और तेजस्वी के बीच सब कुछ ठीक नहीं है। बताया जा रहा है कि लालू के परिवार में मीसा भारती, तेज प्रताप यादव और तेजस्वी यादव के तीन सत्ता केंद्र बन गए हैं। तीनों भाई बहनों के नवरत्न हैं, जो सबको एक दूसरे से बड़ा बता रहे हैं। मीसा के पति शैलेश और तेज प्रताप की पत्नी ऐश्वर्या राय की भी राजनीतिक महत्वाकांक्षा है। सो, अगले चुनाव में इनके लिए भी सीटें देखी जा रही हैं। पासवान परिवार में भी कम घमासान नहीं है। पासवान ने वैसे तो अपने भाई पशुपति पारस को बिहार सरकार में मंत्री और रामचंद्र पासवान को सांसद बना दिया है पर पार्टी की कमान पूरी तरह से बेटे चिराग पासवान को दे दी है। इससे अंदरखाने नाराजगी है। इस बीच पासवान की पहली पत्नी की बेटी आशा पासवान ने मोर्चा खोल दिया। दामाद अनिल साधु भी ताल ठोंक रहे हैं। दोनों ने राजद से टिकट मांगा है और पासवान परिवार के सदस्यों के खिलाफ लड़ना का ऐलान किया है। बिहार में ऐश्वर्या राय ने 2019 में एक निकटवर्ती राजनीतिक शुरूआत की अटकलों को उत्पन्न कर दिया है, पूर्व राज्य मंत्री तेज प्रताप यादव की पत्नी और राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के मुखिया लालू प्रसाद यादव की बहू हैं, हालांकि, अगले साल के लोकसभा चुनावों में ऐश्वर्या के उतरने को लेकर अभी तक कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है।इनको 2020 में बिहार के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में चित्रित किया जा रहा है।ऐश्वर्या राजद के वरिष्ठ नेता चंद्रिका राय की बेटी हैं जो परसा निर्वाचन क्षेत्र से छह बार विधायक रह चुके हैं। उनके दादा दरोगा प्रसाद राय कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता थे जिन्होंने 1990 में 11 महीनों के लिए बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में अपनी सेवा प्रदान की थी।.अब सत्ता भ्रष्टाचार को भी पनाह देती है और ईमानदार को तमगे से नवाजती भी है। रईसों की सुविधा के लिए नीतियां बनाती है तो ग़रीब को भी सियासी सुविधा में तोलती है। यह नौकरशाह को सरकार से जुड़ने का न्योता देकर उसको अपनी सत्ता बनाने का मौका भी देती है और अपनी स्वायत्तता बरकरार रखने वाले नौकरशाह को सत्ता की हनक दिखाती भी है।
यह एक ओर जनता को वोट की ताकत समझती है, और दूसरी ओर, कॉरपोरेट को ताकतवर बना कर ख़ुद उसके सामने नतमस्तक भी हो जाती है, यानी सत्ता लोकतंत्र का ऐसा ताना बाना बुन रही है, जिसमें हर कोई अपने अपने घेरे में किसी हद तक सत्ता बनने की पहल को ही लोकतंत्र मान ले।विकल्प का सवाल यहीं से शुरू होता है। विपक्ष की राजनीतिक दिशा विकल्प का ताना बाना बुनती है, क्या रामविलास, क्या उपेन्द्र, क्या मांझी, क्या पप्पु सबके सब एक ही नाव पे सबार दिखाई पर रहे हैं लेकिन यहीं से एक दूसरा सवाल भी खड़ा होता है कि सत्ता के रुझान अगर जनता को नज़रअंदाज कर रहे हैं, तो क्या विपक्ष की राजनीति जन सरोकारों को देख कर अपना रास्ता बना रही है? अगर विपक्ष की राजनीति के सरोकार जमीन से जुड़े हैं, तो फिर सरकार कैसे जमीन से ऊपर हवा में गोते लगा कर अपनी सत्ता बरकरार रख सकती है? जाहिर है, यहां सरकार को ही नहीं, विपक्ष को भी परखने की जरूरत है और विपक्ष का जो हाल है, वह केंद्र से लेकर राज्यों तक में इस अहसास को जगाता है कि सत्ता बरकरार होने या रखने का मतलब राजनीतिक शून्यता से लबरेज़ होना है।लालू प्रसाद यादव एवं रामविलास पासवान के बेटे राजनीति में स्थापित हो चुके हैं ! आजादी के पहले चार दशक तक सत्ता कांग्रेस के पास रहा उसके बाद क्षेत्रीय पार्टियों के हाथ में रहा है और आने वाले समय में क्या सत्ता भारतीय जनता पार्टी के पास रहेगा ? क्या बिहार की राजनीति भविष्य में जाति धर्म को छोड़कर विकास की ओर बढ़ेगा यह तो आने वाले समय ही बताएगा ! राजनीतिक शून्यता का यह खेल संयोग से हर प्रांत में उभरता है और सत्ता अपने लोकतंत्र का जाप करती जाती है। मसलन, नरेंद्र मोदी को राजनीतिक टक्कर देते नीतीश कुमार का लोकतंत्र बिहार से आगे जाता नहीं और बिहार में लोकतंत्र का मतलब नीतीश की सत्ता पर अंगुली न उठा पाने की शून्यता है। अब तो कानून व्यवस्था को भी छोड़ नहीं सकते , तो बिहार के हालात में कोई परिवर्तन आया हुआ दिखता नहीं है, लेकिन हालात की तफसील में जाने का मतलब है, नीतीश के कार्यकाल की खामियों से ध्यान हटा कर लालू यादव राबड़ी देवी के कार्यकाल की कटु स्मृतियों को ताजा करना, जो कोई बिहारी चाहेगा नहीं और राजनीतिक तौर पर विपक्ष की यही शून्यता नीतीश को टिकाए रखेगी और मनमाफिक तानाशाह बनने से रोकेगी भी नहीं,