सत्ता, ताकत क्या हमेशा रह पाई है किसी के पास? इंसानियत का विकल्प बचा रहे।

बचेगा लेखक, तभी तो छपेगा लेख। विकल्प हम तो दो हैं न, फिर मास्क एक क्यों? हम दो कब से हो गए तन्हाई? हम तो डे वन से एक हैं. मैं तब की नहीं, अब की बात कर रहा हूं. तब और अब की पहेली न बुझाओ तन्हाई. सच-सच बताओ तुम्हारे मन में कुछ और तो नहीं चल रहा न ? विकल्प ! पहले तू बता, तू सिनिकल तो नहीं है न ? मेरा मतलब है नॉर्मल बात को नॉर्मल ढंग से क्यों नहीं समझता? मैं डिस्टेंसिंग को लेकर बात कर रहा था.

ओह सॉरी ! मुझे लगा कि तुझे लगता बहुत है विकल्प. बार-बार, चों-चों, शू-शू से लेकर ऐंवे पचास बातें भी. अब बता हम दो हैं तो एक मास्क क्यों ? वो इसलिए कि एक के बचे रहने पर दोनों बचे रह जाएंगे न ! मतलब ये मास्क मेरे लिए है ? कहानियों के कैरेक्टर को कभी मास्क की जरूरत थोड़े ही होती है तन्हाई. वो तो हमेशा जिंदा रहते हैं.मरता तो लेखक है, वो जब तक जिंदा रहेगा, छपता रहेगा. तन्हाई तब तक उसके साथ रहेगी. जिस दिन मर गया, तन्हाई को किसी और का साथ मिल जाएगा. असुरक्षित व्यक्ति कभी सच्चा प्रेम नहीं कर सकता, जीवनसाथी तो कभी बन ही नहीं सकता. किसी का भरोसा मेरे लिए सबसे बेशकीमती चीज है. आप छोटी-छोटी बातों पर चिढ़ जाते हो. मामूली बात को भी दिल से लगा लेते हो. यूं ही मन उदास रहता है. बेचैनी होने लगती है. किसी की खुशी की खबर से आक्रामक हो जाने लगते हो. किसी भी चीज में मन नहीं लगता… ऐसी स्थिति में आप राजनैतिक बहस या दूसरे मीडिया प्लेटफॉर्म से थोड़ी दूरी बना लो. अब ये वो माध्यम रहा नहीं कि आप अपना दुःख-सुख साझा करोगे और लोग आपकी उस भावना को ठीक-ठीक समझ सकेंगे. पॉलिटकली करेक्ट होने का आग्रह इतना अधिक है कि आप एक मनुष्य होने के नाते अपनी कमजोरियों के साथ यहां टिके रह ही नहीं सकते। ऐसे में आपका एक ही सहारा है पत्र और पत्रिका। जीवन विमर्श से नहीं, जीने से चलता है. इस जीने में बहुत कुछ नजरअंदाज करना पड़ता है. हर बात पर गौर करने लगेंगे तो जीना बहुत मुश्किल होता जाएगा. मैंने टीवी मीडिया और मनोविज्ञान को लेकर काफी कुछ पढ़ा है, पढ़ता रहता हूं. मैं पूरी गंभीरता से कह रहा हूं- अवसाद, डिप्रेशन और बेचैनी के दौर में टीवी मीडिया आपको और परेशान कर सकता है. थोड़े वक्त के लिए अपनी उदासी साइड करके दूसरों के खुश होने की वजह से खुद भी खुश होकर देखिए न, आपको अच्छा लगेगा. ये मैं कोई हवा-हवाई, भारी-भरकम बात नहीं कर रहा, एकदम महसूस की जानेवाली बात कर रहा हूं. सच में, थिरेपी जैसा असर करता है. और वैसे भी रोज-रोज खुश होने के अपने बहाने तो होते नहीं तो दूसरों के बहाने ही तो काम आएंगे.. मेरा शुरू से एक ही फंडा रहा- अपने जीवन की छोटी-छोटी इच्छाएं, शौक और जरूरतें छोड़कर कभी घर नहीं लेंगे. इस देश के किसी भी कोने में एक घर हो, बहुत है. वो घर या तो माता-पिता का हो या ऐसे व्यक्ति का जो बुरे वक्त में हमारी सामान रखने की इजाजत दे दे.

हमारी इस सोच का फायदा ये हुआ कि हम बहुत समृद्ध दिखते हैं. खाने-पीने से लेकर पहनने और पढ़ने के स्तर पर भी. मन की किताबें खरीदते हैं, अच्छे कपड़े पहनते हैं और आपस में हजार-पांच सौ खर्च करने में हिचकते नहीं. मेरा एक तकिया-कलाम है- मैं दूं, आप दें, एक ही बात है. मेरी ये उदारता हर किसी के साथ है. हम किसी से मुफ्त की चीजें नहीं लेते. हम पर कोई किसी तरह का दबाव नहीं बना सकता. हम कभी भी किसी काम के लिए न कर सकते हैं. हम बहुत परवाह नहीं करते. पैसे दिखाकर हमें कोई लिखने-बोलने के लिए मजबूर नहीं कर सकता. मेरे साथ के लोग पैसे दांत से पकड़ते हैं. मिजाज से काईयां हो चले हैं. पैसे-संबंध-अवसर में संतुलन बनाकर चलते हैं. उनका अपना घर है. अपनी गाड़ी है. वो दुनिया की निगाह में सफल हैं. हमारा नुकसान ये है कि ऐसे दुनिया के लोगों के बीच हम मिसफिट हैं. सेल्फमेड बडे पत्रकार की आंखों में चुभते हैं और वो घोषित कर चुके हैं कि इनलोगों को नौकरी की जरूरत है ही नहीं. उपर से नीचे ब्रांड से लदा रहता है. वो हमसे ढाई गुना ज्यादा कमाकर भी फ्रस्टेटेड और अस्त-व्यस्त रहते हैं. हम बेचारे लोग नहीं है. बेचारा होने का अभिनय नहीं कर सकते. मैं पलटकर देखता हूं तो हमारा छोटा घर भी हमारे भीतर बडा घर ज्यादा है. हम ज्यादा व्यवस्थित हैं. इस शहर में भी हम परिवार जैसा जीवन जीते हैं. जीने के स्तर पर ज्यादा संतुष्ट. जमाने की नजर में मूर्ख होकर भी अपनी नजर में समझदार लगते हैं. मैं आत्म सफलता को अंतिम सत्य मान लिया है, मैंने अपनी आंखों के सामने अरबपतियों को भी हांफते देखा है. मैं तो कबसे थोड़ा अपमानित होने की, इग्नोर कर दिए जाने पर भी सहज बने रहने आदत डाल लिया है। इसीलिए तो मेरे हिस्से की दुनिया मेरे शर्त पर है और बहुत बड़ी भी जिसमें उदासी का नामो-निशान नहीं है। सफल होने के लिए अपमानित होने की आदत डालना बहुत जरूरी है। ये सिर्फ उमाशंकर सिंह की कहानी नहीं बल्कि मीडिया मार्ट इंडिया का मंत्र है। जी हां यही है आपका मीडिया मार्ट इंडिया का मंत्र ।

मीडिया मार्ट इंडिया, भारतीय अस्मिता की अकेली राष्ट्रीय वेबसाइट है , आपके सहयोग और समर्थन से हम सफर तय कर रहे है। मीडिया मार्ट इंडिया की हसरत न कभी लंबा जीने की रही, न वैभव का सम्राज्य खड़ा करने की। यही चाह रही कि जितनी जिन्दगी जी कर कूच करे इस दुनिया को, इस धरती को खूबसूरत होता देखता रहें। जब भी, जहां से भी इस उम्मीद से जुड़ी खबरें आतीं, मन को सुकून मिलता और हम आपके साथ बांटते रहे। मीडिया मार्ट इंडिया, ने सदा प्रयास किया कि आने वाली पीढ़ियां वाकई इंसानियत से भरी पूरी रहे। हमारा सदा कोशिस रहा है और रहेगा, एक ऐसा समाज बनाने का जहां या तो इंसानों के बीच कोई भेदभाव नहीं हो, और अगर विभिन्नता हो भी तो वह एक दूसरे के लिए नफरत का बायस नहीं बने, जो एक मीडिया हाउस का फर्ज भी होता है। आज जब कुछ मीडिया हाउस खुद की श्रेष्ठता के आगे हर किसी को बौना साबित करने की कोशिश में ही लगा रहता है। मेरी कमीज तेरी कमीज से ज्यादा सफेद बहुत सुना है। हम अच्छे, तुम बुरे का रोग भी देखते रहे हैं। इन सब में मीडिया मार्ट इंडिया नें यही पाया कि सब भूल भुलैया है। सच पूछिए तो सिवा बर्बादी के इन सबमें कुछ रखा नहीं है। हां, कुछ अर्सों के लिए इन सबसे कुछ लोगों का फायदा होता रहा है, लेकिन वह भी चिरस्थाई नहीं रहा। सत्ता, ताकत क्या हमेशा रह पाई है किसी के पास? पागलपन है यह सब। मुगलों ने सोचा होगा कि इतने सालों बाद उनका नामोनिशान न रहेगा? किसी को मालूम भी है कि अकबर, शाहजहां की असली संतानें कहां हैं, हैं भी कि नहीं? अंग्रेजों ने सोचा था कि सैकड़ों साल राज करने के बाद भी उन्हें बोरिया बिस्तर बांधना पड़ेगा? कोई धर्म, कोई जाति या कोई देश इस बात की गारंटी है कि उसमें कुछ बुरा नहीं होगा? सब के साथ अच्छा बुरा है। कोई किसी दौर में अच्छा तो किसी दौर में बुरा। और इसके लिए कारण एक ही, इंसानियत से विमुख होना। मनुष्य ने मनुष्यता छोड़ जहां चीजें हासिल करने की कोशिश की, उसका परिणाम नुकसानदेह ही होता आया है। इन दिनों भी कई लोगों और राजनेताओं में ये पागलपन देख रहा हूं। नफरत का जहर समाज में बढ़ते देख रहा हूं।

हर कोई अपने पक्ष में इतिहास के टुकड़े बटोर रहा है, भाषणवाजी और वीडियो क्लीपिंग के सहारे खुद को दूसरे के मुकाबले सही साबित करने की कोशिश में जुटा है। लेकिन इस प्रयास में इंसान के बीच दूरियां बढ़ा रहा है। मीडिया मार्ट इंडिया, का मानना है कि जो दिल में आता है, करो मगर इंसान को इंसान के खून का प्यासा मत बनाओ। इतना निष्ठुर समाज मत बनने दो कि किसी की निर्मम अहित कर भी जश्न मनाए इंसान। यह याद रखें कि इंसानियत का विकल्प कुछ नहीं है। कम से कम नफरत और हिंसा तो बिल्कुल नहीं। राजनीतिक पार्टियों का समर्थन विरोध करते इंसान से हैवान न बन जाएं लोग। बड़ा कष्ट होता है देखकर। दंगे को करीब से हमनें कवर किया है देखा है कि नफरत क्या चीज होती है और उससे उपजी हिंसा कहां ले जाती है इंसान को। प्रेम और भाईचारे की बात करें, न कर सकें तो न करें मगर नफरत की बात भी न करें। खास कर किसी पार्टी या नेता का समर्थन और विरोध करते वक्त ख्याल रखें कि कहीं जाने अनजाने आप नफरत तो नहीं फैला रहे हैं! कहीं समाज में हिंसा का मार्ग तो नहीं प्रशस्त कर रहे हैं! मीडिया मार्ट इंडिया, हमेशा की तरह आज फिर वही बात कहेगा, और जब तक है कहता रहेगा। इंसानियत से बढ़कर कुछ नहीं है। प्यार से अनमोल कोई चीज नहीं है। इस दुनिया में अच्छे लोग ही ज्यादा हैं। बुरे कम। बस देखने की नजर होनी चाहिए। एक नजरिया होना चाहिए, जहां इंसानियत को ऊपर रखकर चीजें देखी जाएं। हां, यह जरूर होता है कि बुराई कुछ देर के लिए अपना तांडव दिखा जाती है। अच्छाई को लील जाती है। लेकिन यकीन मानिए, फिर भी अच्छाई जिंदा रहती है। अच्छे लोग बने रहेंगे। दुनिया को अच्छा बनाने के लिए। मीडिया मार्ट इंडिया, जानता है कि अच्छी दुनिया और अच्छे लोगों में मत भिन्नता भी होगी, लेकिन नफरत नहीं होगा। हिंसा नहीं होगी। मारने काटने का ख्याल नहीं होगा। कानून पे भरोसा होगा कि गलत करने का दण्ड गलती करने वाले को मिलेगा। जहां सब अपनी अपनी जिम्मेदारियों के साथ न्याय करेंगे। मीडिया मार्ट इंडिया, पत्रकारों का समुह, नागरिक, इंसान होने के नाते यही जिम्मेदारी निभाना मुनासिब समझता है। मीडिया मार्ट इंडिया, जानता है कि गलत करने वालों का अंजाम अंततः बुरा ही होता है, चाहे वह बुरे से बचने का लाख जतन कर ले। बुराई से बचें, यही संदेश है हम सब के लिए। इंसानियत ही सबसे बड़ा धर्म है और ईश्वर, अल्लाह, गॉड सभी उनकी ही रक्षा करते हैं, जो इंसानियत की राह पर चलते हैं। हमारा राजनीति अगर इतनी संवेदनशील होती तो आज देश, समाज की तस्वीर कुछ और होती। आपके लिए भी संकेत, धैर्य रखें। आपका भी टाइम आएगा। या कहें अच्छा दिन आएगा। अपना टाइम आएगा-फिलहाल यह गुनगुना सकते हैं।

आपदा में ही अवसर मिलते हैं। नहीं यकीन, तो आजू बाजू देखिए। आपदा में ही अवसर ढूंढ रहे हैं लोग। इस कवर स्टोरी को मैं जितना कहानियों के करीब ले जाने की जद्दोजहद की है, उससे कहीं ज्यादा आपकी जिंदगी के करीब ला खड़ा करने की कोशिश. पहले से और बारीक, दिलकश और छू जानेवाला. नए अंदाज में पेश इस कवर स्टोरी से जब आप गुजरेंगे तो मेरी बात का यकींन ज्यादा हो सकेगा. मैं देख रहा हूं लोगों की शारीरिक बनावट और रंग-रूप पर भद्दे कमेंट करने की आदत अभी गयी नहीं है. अलग-अलग मुद्दों पर समझदारी के साथ बात करते हुए जब लोग ऐसा करते हैं तो देखकर रहा नहीं जाता. टोक देता हूं. बहुत सारे ऐसे शब्द हैं जो पेपर पर वैसे ही लिखे जाते हैं लेकिन उनका हम सामाजिक तौर पर इस्तेमाल करते हैं तो वो भेदभाव पैदा करता है. इससे लोगों को चोट पहुंचती है. ऐसे लोग जब पलटकर मुझसे पूछते हैं- मोटे को मोटा न कहें, जिसकी आंखें नहीं हैं, उसे अंधा न कहें तो क्या कहें ? ऐसे लोगों से मेरी बस इतनी अपील है कि तब आप वही कह लीजिए। मेरे लिए बस एक ही चीज मायने रखती है- हम पचास काम करते हुए अपनी इंसानियत बरकरार रख पा रहे हैं या नहीं? इसके बिना सब झाड़- फानूस है. इतने सालों में मैंने यही तो सीखा कि कोई हजारों ये घिरा हुआ, नाम और शोहरत हासिल कर चुका शख्स भी असल जिंदगी में घटिया हो सकता है. बहुत किताबें पढ़नेवाले और भारी-भरकम बातें करनेवाले सब बेहतर मनुष्य भी होते तो हमारा समाज ऐसा नहीं होता जैसा है और जिसमें हम जीते हुए मनुष्य होने के पायदान से नीचे उतरते चले जाते हैं. भागलपुर, बिहार के बड़बिल्ला गांव के बच्चों की तस्वीर देखी. वो बच्चे जो कभी स्कूल जाया करते थे जिससे कि उन्हें खाना मिल सके, पेट में अनाज जा सके. अब स्कूल बंद है तो खाना भी बंद. लिहाजा कचरा बीनकर बेचने या बाल मजदूरी का रास्ता पकड़ने के अलावा कोई दूसरा चारा नहीं है. सरकार ने बच्चों के लिए राशन का निर्धारण किया है. लेकिन कई अभिभावकों की शिकायत है कि मई के बाद से उनके बच्चों के लिए राशि नहीं आयी है. मिड डे मील को लेकर सालों से कुछ न कुछ गड़बड़ी की खबरें आतीं रहीं हैं, बावजूद इसके इन सबके बीच एक बड़ा सच ये भी रहा है कि इस देश के लाखों बच्चे इसलिए स्कूल जाते रहें क्योंकि वहां जाने से उन्हें दिन का खाना मिल जाता. फिलहाल कोरोना संक्रमण को ध्यान में रखते हुए देशभर के स्कूलों, शैक्षणिक संस्थानों को बंद कर दिया गया है.जो सुविधा सम्पन्न परिवार से आनेवाले बच्चे हैं, उनके लिए ऑनलाइन क्लास के बाद छुट्टी है. सामान्य दिनों के मुकाबले ज्यादा बेहतर ढंग से खा-पी रहे होंगे. अपने माता-पिता के साथ ज्यादा समय बिता रहे होंगे. माता-पिता तरह-तरह से उनका मन बहलाए रखने की कोशिश कर रहे होंगे. आखिर इस लॉकडाऊन में उनके मन की दुनिया भी तो छूटी है. लेकिन इस देश में ऐसे लाखों बच्चे हैं जिनके स्कूल बंद होने से दिन का खाना ही छूट गया है. उनके लिए स्कूल पढ़ने से कहीं ज्यादा भरपेट खाना मिलने का पता रहा है. उस पते पर फिलहाल ताला लगा है. आप महसूस कर रहे होंगे कि फील्ड में उतरकर लिखने और स्टूडियो में बैठकर पत्रकारिता के नाम पर गप्प करने, फर्जी उबाल पैदा करने में क्या फर्क है? जिन मानवीय संवेदना की बात कविता-कहानी में थोक के भाव की जाती है, उनके बीच एक पक्ष ये भी है कि मीडिया सही से आंकड़ें और तथ्य सामने लाए तो संवेदना स्वाभाविक ढंग से पैदा होगी, किसी भी स्तर पर नकली नहीं होना पड़ेगा. देखते-देखते हम जैसे लोग लेखक होते-होते अभागे हो गए हैं. किसी से बस हाल-चाल को लेकर बात करो, वो बात मीडिया, सिनेमा, संस्कृति, समाज या फिर किसी किताब तक बढ़ती चली जाती है और बात यहां पर आकर खत्म होती है-तो हजार शब्द में लिखकर भेज दीजिए न? है आपके पास पन्द्रह दिन. न भेजने पर बातचीत बंद. संबंध खराब कर लेते हैं और जहां-तहां शिकायत करने लगते हैं.बातचीत करने का पूरा उत्साह ही मर जाता है. पहले से और अधिक मन भारी हो जाता है. मुझे अब कम पढ़े-लिखे और गृहस्थ से बात करना ज्यादा अच्छा लगता है. वो अपनी बात करते हैं, मेरे बारे में बात करते हैं. बस बात करते हैं. बात के पीछे कोई मतलब या काम नहीं होता है. पढ़े-लिखे लोग छोटी-छोटी बातों को लेकर गिल्ट पैदा करने की कोशिश करते है. हम अभागे इसलिए है क्योंकि हम सामान्य मनुष्य की तरह ट्रीट नहीं किए जाते जिसका मन करता है कोई उससे बिना भारी-भरकम, नकली हुए रोजमर्रा की बातचीत करे और उसके बाद वो हल्का महसूस करे. बातचीत के बाद एक काम और बढ़ जाय, ऐसी बातचीत से घबराहट होती है. हमारी जिंदगी में भी हल्दी-नमक, झाडू, बर्तन..घुसा है. हर वक्त हम सेमिनार मोड में कैसे रह सकते हैं? जैसे और टीवी चैनल रहता है। मीडिया मार्ट इंडिया, की एक अलग पहचान है। हमारे पास एक समृघ्द पाठक है जिसे हम पर अगाध विश्वास है। हम हर समय अपने पाठक की चुनौतियों को स्वीकारा और सच्चाई की तराजू पर सदा खडे उतरे हैं और कोशिस होगा कि सदा खडे उतरें। हमारा मानना है कि हर चीज अच्छे के लिए ही होता है। कुछ पल के लिए दुख तो होता है, आप संकट में भी होते हैं मगर ऐसी स्थिति आपको नए सिरे से जीवन को शक्ल देने का अवसर प्रदान करती है। कोरोना महामारी ने किसी न किसी शक्ल में हममें से बहुत से लोगों के सामने ऐसी परिस्थितियां पैदा की हैं। उनका मुकाबला किया जाना चाहिए, उनसे नई राह ढूंढनी चाहिए। इस परिस्थिति से उपजे दौर में नई पहचान के साथ आगे बढ़ने की। भूल जाइए उन्हें, जिन्होंने आपको ठगा। आपका इस्तेमाल किया। आपके सहारे अपना भला किया और निहायत जरूरी वक्त में आपकी चिंता छोड़ दी। उनका साथ रखिए जो आपके लिए इस संकट में आपके खैरख्वाह साबित हुए। उम्मीद है जीवन की तस्वीर इससे जरूर बदलेगी। दुख का कारण बने लोगों को उनके किए की सजा भी जरूर दीजिए क्यूंकि अगर आप ऐसा नहीं करेंगे तो यह भी एक किस्म का अन्याय होगा। उनके हौसले को तोड़ना जरूरी है, उनका स्याह चेहरा सामने आना ही चाहिए। कुछ आवाजें ऐसी होती हैं जो एक सुकून का आभास कराती हैं, एक उम्मीद जगाती हैं। संकट के इस भयानक दौर में रोशनी के पीछे छिपे अंधकार को बेपर्दा करने की जरूरत है। अगर इस अंधकार पे पर्दा बना रहा तो आगे भी रोशनी की आड़ में आपको अंधेरे के गर्त में धकेलने का खेल चलता रहेगा। चूकिए मत, खोल डालिये गिरह ताकि उनका नकाब उतर सके। अभी गुरबत का दर्द। असहाय, अभावग्रस्त होने की पीड़ा। आप तो बस उस अदृश्य डर से ही अपनों को बचाने का खेल खेलते रहें, जो हकीकत में उस स्वरूप में कहीं था ही नहीं। कभी नहीं। दौर विकट है। आप ख्याल रखें, अपना और सबका। उनका भी जो आपके लिए अपनी जान को जोखिम में डालकर दिन रात आपकी सेवा में जुटे हैं। स्वास्थ्य व्यवस्था से जुड़े लोग, पुलिसकर्मी, समाजसेवी संस्थाओं के प्रतिनिधि-इनके लिए सम्मान का भाव रखिए। इन्हें आपकी चिंता है, ये आपके लिए अपना चैन-अपनी नींद को परे रखकर आपकी हिफाजत की कोशिश कर रहे हैं। कई जगहों से ऐसी खबरें आ रही हैं कि इन्हें ही कुछ लोगों के आक्रोश का शिकार बनना पड़ा। आक्रोश मत पालिए, उनका समर्थन कीजिए। आक्रोश की कोई वजह नहीं है। विकट स्थिति है। कुछ लोग अपने समय के चक्र में फंसे हुए हैं। ऐसे में उनका दर्द समझा जाना चाहिए, जिन्हें वाकई पैसों के अभाव से जूझना पड़ रहा है। ऐसे लोगों को मदद की दरकार है। कम से कम आप के जानने वालों में कोई ऐसी हालत में हो, तो उनकी मदद करने की जरूर सोचें। ऐसे संकट में इंसानियत का फर्ज निभाना चाहिए, अपनी झोली में इंसानियत भरने का प्रयास करना चाहिए। बिहारी खबर, बिहारी हेल्प लाईन के माध्यम से 31,453 से उपर प्रवासी बिहारीयों के चेहरे पर मुस्कान ला चुका है। आप भी जितनी हो सके उतनी मदद करें ही पर स्वस्थ और सावधान रह कर। इंसानियत इसी का नाम है और मानव जाति का यही गहना है, वरना जानवर और इंसान में क्या फर्क रहे। इस विकट स्थिति में भी जो इंसानियत न दिखा सके, थू है वैसे लोगों पर। जो लोगों की मुश्किलों और मुसीबतों से आंखें फेर कर अपनी सतरंगी दुनिया सजाए हों, उन्हें वायरस मानिए। विकट स्थिति है। लोग के दर्द को समझा जाना चाहिए, लोगों को मदद की दरकार है। कम से कम आप के जानने वालों में कोई ऐसी हालत में हो, तो उनकी मदद करने की जरूर सोचें। ऐसे संकट में इंसानियत का फर्ज निभाना चाहिए, अपनी झोली में इंसानियत भरने का प्रयास करना चाहिए। मदद तो जितनी हो सके, वह करें ही। कितनी काली रात है! चारों तरफ अंधेरा ही अंधेरा। दूर दूर तक कुछ नजर नहीं आता। हर शै गुम है इस अंधियारे में। पिछली रात भी काली ही थी, मगर इतनी सियाह न थी। रोज ब रोज यह और खौफनाक सी लगने लगी है। खामोश मगर खौफ से भरी। एक चेहरा हर रोज नमूदार होता दिखता था, आज कुछ और साफ हुआ है। इतनी कालिख लिपटी है, पर वह कुछ कुछ पहचाना जाने लगा है। अंधेरे में भी वही बस दिख रहा है, और कुछ नहीं। भ्रम होता है, क्या वाकई रात ही है? रात है तो उसका चेहरा क्यूं चमक रहा है? उसे तो अंधेरे में छिपा होना था! न न, शायद दिन की रोशनी है जिसमें वह चेहरा साफ साफ नजर आने लगा है। या फिर वह फिर से छल रहा है? दिन को रात में तब्दील करने का हुनर तो उसके पास है ही। दिन ही है, उसने रात का शामियाना पसार कर आंखों को दगा देना चाहा है। पर वह तो रात को दूर भगाने की बातें करता था! दिन का उजाला बिखेरना उसकी हसरतों में शुमार था। वह भला रात की आगोश में उतरने का ख्याल क्यों करेगा? वह तो रोशनी की लड़ियां लिए खड़ा हो जाता, दूर भगा देता अंधियारे को। हां…हां…उसने लड़ियां तो थाम रखी हैं मगर भरमाने के लिए। रोशनी वह अपने हिस्से रखेगा, अंधियारा तुम्हारे दामन में उड़ेल देगा। देखो, कितनी खामोश हैं रोशनियां। वह नहीं चाहतीं, उसका कहा मानना। वह अपना उजियारा नहीं छोड़ रही उसके लिए। अंधेरा कायम रखा है, पर सिर्फ उसके चेहरे के सिवा। वह चाहती है, तुम उसे पहचान लो। साफ साफ। लेकिन यह भ्रम न पालो कि दिन है। रात ही है अभी। इस रात की सुबह होगी, पर दिन ढलने के बाद। हर बात की खाल नहीं उतारनी चाहिए। विरोधियों को सबक। और भक्तगणों को सलाह, समर्थक बनो किसी का तो स्मार्ट भी बनो। बाकी मैं निष्पक्ष आदमी हूं। जब लगेगा तो खिंचाई भी करूंगा और जरूरत समझूंगा तो तारीफ भी।

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