क्या सरकार वही कानून लाई थी जो रोड पर दिख रही है : देश और देश की राजनीति

कोई कह रहा है , तुम महिला विरोधी हो तो कोई कह रहा है की तुम महिलाओं का सहायक नहीं कुर्सी का पुजारी हो । तुम – तुम , हम – हम के बीच सच गायब है और मानवता अंतिम साँस लेती दिख रही है । क्या हम ऐसे ही थे या ऐसे हो गए है

हमारा देश, जहां जाति, धर्म, खान पान, वेशभूषा और भाषाओं तथा बोलियों की अनूठी विविधता कदम कदम पर नजर आती है, हमारे देश को बहुरंगी बनाने में यहां कि भाषा और संस्कृति का बड़ा योगदान रहा है। लेकिन अफसोस कि राजनीति ने अपने स्वार्थ के लिए इन पर कुटिल चालों के बांध बनाने शुरु कर दिए और अब इसके डूब क्षेत्र में आकर हमारी विशिष्ट पहचान के गुम होने का खतरा बढ़ गया है। भाषा और संस्कृति की राजनीति से क्षणिक लाभ तो हासिल किया जा सकता है। लेकिन इससे भाषा और संस्कृति का दीर्घकालिक नुकसान ही होगा। तो राजनीति में बुरा आदमी अगर है तो जीवन के सभी क्षेत्रों में बुरा आदमी सफल होने लगेगा और अच्छा आदमी हारने लगेगा। अच्छे लोगों के हाथों में राजनीति आ जाए तो अभूतपूर्व परिवर्तन हो सकते हैं। अभी ’राजनीति’ व्यक्तियों का निहित स्वार्थ बन गई है, तब राजनीति समाज का स्वार्थ बन सकती है।

आज हमारे देश में भला होना असफलता की पक्की ’गारंटी’ है। और जब भला होना असफलता बन जाए, और बुरा होना सफलता की सीढ़ियाँ बनने लगे, तो जिंदगी सब तरफ विकृत और कुरूप हो जाए, तो आश्चर्य क्या है! राजनीति जितनी स्वस्थ हो, जीवन के सारे पहलू उतने ही स्वस्थ हो सकते हैं। क्योंकि राजनीति के पास सबसे बड़ी ताकत है। ताकत अशुभ हो जाए तो फिर कमजोरों को अशुभ होने से नहीं रोका जा सकता है। अगर खोटा सिक्का बाजार में आए तो अच्छा सिक्का एकदम बाजार से नदारद हो जाता है। खोटा सिक्का चलने की कोशिश करता है, अच्छे सिक्कों को हटा देता है। बुरे आदमी जब ताकत में हो जाते हैं, तो अच्छे आदमी को जगह जगह से हटा देते हैं। एक खयाल जकड़ लिया है कि दल के बिना राजनीति हो नहीं सकती। दल अगर होगा तो अच्छा आदमी कभी प्रवेश नहीं कर सकता। दल प्रवेश करेगा, आदमी का सवाल नहीं है। यह सारी दुनिया की तकलीफ है, भारत की नहीं है। क्या हर्ज है, अगर पूरा मुल्क अच्छे आदमियों को चुने? उनके अपने विचार होंगे, अपनी धारणाएँ होंगी। हम ’पार्टी बेसिस’ पर उन्हें नहीं चुनते। उनके अच्छे होने की वजह से चुनते हैं। वे पचास आदमी इकट्ठे होकर दिल्ली में निर्णय करेंगे, वे पचास आदमी अपने बीच से चुनेंगे, वे ही निर्णय करेंगे। लेकिन पूरा मुल्क अच्छे आदमी की चिंता करके चुनेगा। दस अच्छे सोशलिस्ट चुने जाएँगे, दस अच्छे कांग्रेसी चुन जाएँगे। वे ऊपर जाकर निर्णय करेंगे। हमारे चुनाव का आधार पार्टी नहीं होगी, आदमी होगा। ऊपर पार्टियाँ होंगी, वह अपना निर्णय करेंगी, अपना प्रधानमंत्री बनाएँगी।

वह दूसरी बात है। मुल्क अच्छे आदमी की दृष्टि से चुनाव करेगा तो बड़ा परिवर्तन हो जाएगा, बड़ी क्रांति हो जाएगी। अच्छे आदमियों की बड़ी जमात वहाँ इकट्ठी हो। तो मैं नहीं मानता हूँ, कि कोई पार्टी की सरकार होनी भी जरूरी है। अगर अच्छे लोगों की जमात हो तो अच्छे लोगों की सरकार हो सकती है। वह मिली जुली हो सकती है। और मिली जुली सरकार अच्छे आदमियों की हो सकती है। बुरे आदमियों की तो मिली जुली सरकार नहीं हो सकती, असंभव है। मेरा मानना यह है कि पार्टियों के दल पर देश को चुनाव करना नहीं चाहिए। देश का आम जन तो व्यक्ति की फिक्र करे, कि कैसा व्यक्तित्व, उसको चुने। ऊपर पार्टियाँ हो सकती हैं, वे मिल जुलकर ही काम कर सकती हैं, इकट्ठे भी काम कर सकती हैं। और भारत जैसे देश में मिल जुलकर ही काम हो तो अच्छा है। मेरी दृष्टि यह है कि पार्टी के ढंग से आपने चुनाव किया, तो अच्छे आदमी की खोज बहुत मुश्किल है। अच्छे आदमी की खोज पर चुनाव होने चाहिए, चाहे वह किसी पार्टी का हो।

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