ऊपर से नीचे तक पहुंचा भ्रष्टाचार, संपादक से संवाददाता तक लाचार , डॉ.उपेंद्र कश्यप

कॉकरोच जनता पार्टी का जंतर मंतर पर हुआ आंदोलन बड़ी लकीर खींच गया। 15 मई 2026 को न्यायालय ने युवाओं के संदर्भ में कॉकरोच शब्द का इस्तेमाल किया। 16 को कॉकरोच जनता पार्टी बन गई और मात्र 70 दिन में 25 जुलाई 2026 को भारत सरकार के शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा दे देना पड़ा। इस पूरे आंदोलन में एक बात जो स्पष्ट दिखी वह यह कि माइक पर लोगो देखकर आंदोलनकारी प्रतिक्रिया दे रहे थे और उनका व्यवहार तय हो रहा था। मुख्यधारा की मीडिया के लिए वहां जूते की माला और गालियां थी, तो इन्फ्लुएंसर्स और युट्यूबर्स के लिए फूलों का हार। इस आंदोलन में जो कुछ हुआ उसे लेकर नैतिकता आदर्शवाद के संदर्भ में कई सवाल खड़े किए जा सकते हैं, लेकिन एक बात जो पूरी तरह स्पष्ट थी वह थी मुख्य धारा की मीडिया खास कर चैनल वालों को लेकर आक्रोश। कई पत्रकार पीटे गए। कई महिला पत्रकारों की हूटिंग हुई। अपशब्द कहे गए। गलियां दी गयी। सवाल है कि यह स्थिति बनी क्यों? ऐसा नहीं है कि मीडिया दलाल की भूमिका में आज है।

दलाली हमेशा से होते रही है। आज जो बड़े-बड़े तथाकथित यूट्यूब वाले पत्रकार बन गए हैं, उनका भी एजेंडा है। मुख्य धारा के चैनलों से निकल गए या निकाल दिए गए और यूट्यूबर बन गए कई पत्रकारों ने दलाली करके ही यहां तक का मुकाम हासिल किया है। जिनकी आज आंदोलनकारी प्रशंसा कर रहे थे। अब यहां अगर देखे तो फर्क क्या है कि हमारा पत्रकार और तुम्हारा पत्रकार। दरअसल रवीश कुमार जैसे पत्रकारों और विपक्ष ने एक ऐसा माहौल निर्मित कर दिया है जिसमें हर थोड़ा भी प्रभावशाली व्यक्ति या संस्थान को अपने अनुकूल का पत्रकार चाहिए। अन्यथा गालियां दो। कई बार हमले भी। सच यही है कि पत्रकारिता किसी को पसंद नहीं है। पत्रकार किसी को नहीं सुहाता। सबको अपने-अपने अनुकूल का पत्रकार चाहिए। सत्ता ने हमेशा पत्रकारों को दबाकर रखने की कोशिश की है। मीडिया संस्थानों को हमेशा दबाया गया। लेकिन 2014 के बाद मुख्य धारा की मीडिया रेंगने लगी। इसमें कौन कितना ज्यादा रेंग सकता है इसकी होड़ आपस में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के बीच है। कुछ हद तक कुछ अखबार इससे बचे हैं। लेकिन उनकी विश्वसनीयता भी खत्म हो गई है। यहां इस आंदोलन के समय जो पत्रकारों के साथ हुआ उनका कोई दोष नहीं था। जिला मुख्यालय से लेकर दिल्ली तक में पत्रकार पीटे गए।
उन पर हमले हुए। सवाल खुद से पूछें कि क्या पत्रकार जिम्मेदार हैं। शायद नहीं। क्योंकि वह वही करते हैं जो ऊपर से निर्देश आता है। ऊपर वाला वही करवाता है जो उसको ऊपर वाले का निर्देश प्राप्त होता है। यह खड़ी सीढ़ी है। यानी यहां ऊपर से नीचे की तरफ गिरावट आई है। यह और बात है कि बदनाम पत्रकार हैं। सच यह है कि झोली हो या बोरी, या बड़ी-बड़ी अटैचियां लेते संपादक हैं। अखबार का मालिक बिकता है। पत्रकार नहीं बिकता। हां कुछ अपवाद हो सकते हैं। दूध का धुला कोई पत्रकार भी नहीं है। क्योंकि गिरावट हर क्षेत्र में आई है। दरअसल हुआ यह है कि मीडिया घरानों ने सरकारों से समझौता कर लिया। आर्थिक युग में उन्हें दौलत चाहिए और दौलत के लिए बिकना पड़ता है। मीडिया सिर्फ व्यवसाय बनकर रह गया है। संपादक नाम की संस्था तो कब का चौपट हो चुकी थी। 2010 के दशक के बाद इसमें तेजी से गिरावट आई। संपादक पत्रकार की तरह ही एक इक्विपमेंट मात्र बन कर कर रहा है। उनकी लेखनी का कोई मतलब नहीं है। लिखना वही है जो छपेगा, जो दिखेगा। और छापने और दिखाने का अधिकार ना तो संपादक के पास है ना पत्रकार के पास है। मीडिया घरानों का जो विज्ञापन देखने वाला विभाग है, वह संपादकों पर हावी होता है। एक टाइपराइटर, पेज लगाने वाला, चिट्ठियां बटोरने वाला, रिसेप्शनिस्ट का पेमेंट एक पत्रकार से अधिक होता है। (कम से कम प्रखण्ड, अनुमण्डल, जिला, कमिश्नरी के स्तर पर) जबकि दोनों साथ काम करते हैं।
पत्रकार अगर किसी संकट में घिर जाए, किसी कानूनी पचड़े में फंस जाए, कोई नेता अधिकारी उसे धमकी दे तो, सबसे पहले अगर कोई भगाता है तो वह संस्थान, जिसके लिए वह दिन रात खतरा मोल लेकर काम कर रहा होता है। एक पत्रकार का मोबाइल डीएम के गार्ड ने छीन लिया और उसे पत्रकार से संबद्ध अखबार में एक लाइन की खबर नहीं छपी। हालांकि दूसरे अखबार ने छापा। एक पत्रकार मर भी जाए तो संस्थान यह लिखने मानने के लिए भी तैयार नहीं कि वह उसका पत्रकार है। कोई लाइफ इंश्योरेंस नहीं। कोई सुरक्षा नहीं। कोई बॉडीगार्ड नहीं। पत्रकारों को इतना कमजोर बना दिया गया है कि सच तो छोड़िए तथ्य तक खुलकर नहीं लिखकर बता सकते हैं। विपक्ष कहता है गोदी मीडिया। मीडिया में गिरावट अब ज्यादा दिख रही है, क्योंकि सोशल मीडिया का वर्चस्व और दायरा बढ़ता जा रहा है। अन्यथा याद करिए। सांसद खरीद फरोख्त के मामले को लेकर देश के तथाकथित बड़े पत्रकार के पास सब प्रमाण सहित रिपोर्ट उनके रिपोर्टर ने भेजा था, और उन्होंने इसे इसलिए नहीं प्रसारित किया कि सत्ता से समझौता हो गया। बाद में उस पत्रकार ने पद्म पुरस्कार प्राप्त कर लिए, वह भी तुरंत। मनमोहन सिंह की सरकार बच गई। अगर वह रिपोर्ट जारी हो जाती तो मनमोहन की सरकार कब का चली जाती। तो आज का विपक्ष जो गोदी मीडिया चिल्लाता है उसने भी सत्ता में रहते हुए पत्रकारों को कम नहीं खरीदा है। हां यह और बात है कि अब पत्रकारिता का जो काम है एक जगह की बात को 100 -200, हजारों, लाखों लोगों व जगह पर पहुंचाना। वह मीडिया घराना की बपौती नहीं रह गई है। क्योंकि सोशल मीडिया का प्रभाव अब लगातार बढ़ता जा रहा है। और यह सीजीपी के आंदोलन में स्पष्ट दिखा। अगर इस आंदोलन से मीडिया के लिए कुछ सीख है तो वह यह है कि वह अपना कवरेज का तरीका सुधारे। सकारात्मकता के नाम पर दलाली और चमचई छोड़े। सत्ता और विपक्ष दोनों की कलई पत्रकार खोलें। सत्ता की गलतियों पर भी बचाव की मुद्रा में जब एंकर और एंकरनिया दिखेंगे तो संस्थान के पत्रकार पीटे जाएंगे। प्रदेशों की राजधानी और देश की राजधानी में घटित घटना का प्रिंट मीडिया जिस तरह से कवरेज करता है उसमें साफ-साफ भेदभाव की बू आती है।
और हां अंत में एक बात और..
जाति से मुक्त नहीं है पत्रकारिता। पत्रकारिता में जातिवाद गहरी पैठ बना चुकी है। और जाति वर्ग देखकर न्यूज़ कवरेज की प्रवृत्ति काफी सघन हुई है। अगर यह दरकेगा नहीं तो फिर जो जंतर मंतर पर पत्रकारों के साथ हुआ, जो देश भर में हुआ उसका दायरा बढ़ता चला जाएगा। इसलिए इस कॉकरोच आंदोलन ने साफ-साफ संदेश दे दिया है- मीडिया घरानों सुधरो, अन्यथा तुम्हारे पत्रकार फील्ड में जाने लायक नहीं रहेंगे। अब होना यह चाहिए कि प्राइम टाइम में एक घण्टे का शो प्रतिदिन “जनता के मुद्दे” पर चर्चा करे। उसमें किसी दल के भों-भों करने वाले नेता को नहीं, सिर्फ विषय विशेषज्ञों को और उनके साथ दो-तीन विभिन्न विश्वविद्यालयों में अध्ययनरत स्टूडेंट को शामिल करें, जो अनिवार्य तौर पर किसी भी राजनीतिक दल से जुड़े न हों। अन्यथा- आने वाले दिनों में दुर्दशा और बढ़ती जाएगी। दूसरी बात- गोदी मीडिया का राग अलापने वालों के लिए कि वे भी निष्पक्ष नहीं हैं। उनको भी अपने अनुकूल मीडिया पसंद है। ऐसे में आप कितनी बेहतरी की उम्मीद कर सकते हैं भला।

