“देश रहेगा तो जाति रहेगी” – अस्मिता के गौरव और सामाजिक समरसता का नया मंत्र


आज के आधुनिक और तेजी से बदलते भारत में एक नया विमर्श आकार ले रहा है, जो हमारी रूढ़िवादी सोच को चुनौती देने के साथ-साथ एक नए राष्ट्रवाद की नींव रख रहा है।

यह विमर्श है “अपनी जाति पर गर्व करो और औरों की भी इज्जत करो, क्योंकि देश रहेगा तो जाति रहेगी।” यह कोई साधारण नारा नहीं है, बल्कि यह एक ऐसा गहरा विचार है जो विविधता से भरे हमारे देश को एकजुट रखने और हर नागरिक के आत्मसम्मान को सुरक्षित करने की वकालत करता है। इतिहास गवाह है कि भारत हमेशा से विभिन्न संस्कृतियों, परंपराओं और जातियों का संगम रहा है। यहाँ जाति केवल एक सामाजिक ढांचा नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही सांस्कृतिक धरोहर, पारंपरिक हुनर और जीवनशैली का हिस्सा रही है। अपनी जड़ों से जुड़ना और अपनी विरासत पर गर्व करना किसी भी मनुष्य के लिए स्वाभाविक है। लेकिन चुनौती तब खड़ी होती है जब यह ‘गौरव’ किसी दूसरी जाति के प्रति ‘नफरत’ या ‘नीचा दिखाने की भावना’ में बदल जाता है। इस लेख के माध्यम से हम समझने का प्रयास करेंगे कि कैसे अपनी पहचान को बनाए रखते हुए दूसरों का सम्मान करना और राष्ट्र प्रथम की भावना को सर्वोपरि रखना आज के समय की सबसे बड़ी जरूरत है।

हर समाज में व्यक्ति को अपनी पहचान अपने परिवार, परिवेश और पुरखों के संघर्षों से मिलती है। यदि कोई व्यक्ति अपनी जाति के पूर्वजों के अच्छे कार्यों, उनकी कला, उनके त्याग और उनकी संस्कृति पर गर्व करता है, तो इसमें कोई बुराई नहीं है। यह गौरव सकारात्मक है, क्योंकि यह इंसान को अपनी जड़ों से जोड़े रखता है। परंतु, समस्या तब उत्पन्न होती है जब इस गौरव की आड़ में अहंकार का जन्म होता है। जब कोई व्यक्ति अपनी जाति को ‘सर्वश्रेष्ठ’ और दूसरों को ‘अछूत’ या ‘कमतर’ समझने लगता है, तो वह सामाजिक ताने-बाने को नुकसान पहुँचाता है। सच्चा गौरव वह नहीं है जो दूसरों का अपमान करना सिखाए, बल्कि सच्चा गौरव वह है जो हमें अपनी संस्कृति के श्रेष्ठ मूल्यों को अपनाकर समाज के कल्याण में योगदान देने के लिए प्रेरित करे। संविधान के समानता के अधिकार (Right to Equality) के तहत देश का हर नागरिक कानूनन और सामाजिक रूप से बराबर है। किसी भी लोकतांत्रिक देश की मजबूती इस बात पर निर्भर करती है कि उसके नागरिक एक-दूसरे के प्रति कितना सम्मान भाव रखते हैं।

“औरों की भी इज्जत करो” का सीधा सा अर्थ है कि जिस प्रकार आपके लिए आपकी पहचान और आपका आत्मसम्मान अमूल्य है, ठीक उसी प्रकार समाज के हर दूसरे वर्ग का सम्मान भी उतना ही महत्वपूर्ण है। जब तक समाज में हर जाति, वर्ग और समुदाय को बराबरी का आदर नहीं मिलेगा, तब तक एक समरस समाज की कल्पना अधूरी है। नफरत और भेदभाव की दीवारें किसी भी देश को भीतर से खोखला कर देती हैं। अतः आपसी सम्मान ही वह गोंद है जो हमारे बहुरंगी समाज को आपस में जोड़कर रखता है। इस पूरे विमर्श का सबसे महत्वपूर्ण और आंखें खोलने वाला पहलू है—”देश रहेगा तो जाति रहेगी।” इतिहास इस बात का साक्षी है कि जब-जब भारत आंतरिक मतभेदों और जातिगत संघर्षों में उलझा, तब-तब विदेशी ताकतों ने हमारी इस कमजोरी का फायदा उठाया और हमें गुलाम बनाया। यदि आज हम एक स्वतंत्र और संप्रभु राष्ट्र के रूप में खड़े हैं, तो हमारी जातिगत अस्मिता सुरक्षित है। सोचिए, यदि देश ही सुरक्षित नहीं रहेगा, यदि देश की अखंडता और एकता ही खतरे में पड़ जाएगी, तो किसी भी जाति का कोई वजूद नहीं बचेगा। देश की सीमाएं, देश का संविधान और देश की अर्थव्यवस्था ही वह सुरक्षा कवच हैं जिसके दायरे में रहकर हम अपनी पहचान पर गर्व कर पाते हैं।

विद्वानों और विचारकों का मानना है कि राष्ट्र किसी भी नागरिक की प्राथमिक पहचान होनी चाहिए। यदि हम जातियों के नाम पर आपस में लड़ते रहे, तो हम देश की प्रगति के पहिए को रोक देंगे। आज वैश्विक पटल पर भारत एक महाशक्ति बनने की राह पर अग्रसर है। इस यात्रा में रोड़ा बनने के बजाय, हमें अपनी ऊर्जा को देश के विकास में लगाना होगा। आज के दौर में जातिवाद का एक नया चेहरा सोशल मीडिया पर देखने को मिलता है। अक्सर युवाओं को जातिगत रील्स, मीम्स और भड़काऊ पोस्ट के जरिए गुमराह किया जाता है, जिससे समाज में ध्रुवीकरण बढ़ता है। वहीं दूसरी ओर, कुछ राजनीतिक तत्व भी अपने निजी फायदों के लिए ‘वोट बैंक’ की खातिर जातियों के बीच दरार पैदा करने की कोशिश करते हैं। ऐसे समय में युवाओं को अधिक समझदारी दिखाने की जरूरत है। उन्हें यह समझना होगा कि डिजिटल दुनिया में फैलाई जा रही नफरत का असर सीधे तौर पर देश की शांति और प्रगति पर पड़ता है। हमें सोशल मीडिया का उपयोग नफरत फैलाने के लिए नहीं, बल्कि अपनी संस्कृति की अच्छी बातों को साझा करने और दूसरों की संस्कृतियों को जानने-समझने के लिए करना चाहिए।

“अपनी जाति पर गर्व करो और औरों की भी इज्जत करो” का यह संदेश वास्तव में राष्ट्र निर्माण का एक आधुनिक मार्गदर्शक सिद्धांत है। यह हमें सिखाता है कि हमें अपनी विविधता को बनाए रखना है, लेकिन अपनी एकता की कीमत पर नहीं। [4] आइए, आज हम सब मिलकर यह संकल्प लें कि हम अपनी पहचान का सम्मान करेंगे, परंतु किसी अन्य नागरिक का अनादर नहीं होने देंगे। जब हम सभी जातियां और समुदाय एक साथ मिलकर ‘राष्ट्र प्रथम’ (Nation First) की भावना से कार्य करेंगे, तभी हमारा भारत सशक्त, समृद्ध और अखंड बना रहेगा। क्योंकि अंततः, देश की मजबूती में ही हम सबकी मजबूती छिपी है।

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