बड़बोले और जनाधारविहीन नेताओं के भरोसे कांग्रेस का चुनावी दांव कितना सफल ?

कांग्रेस का दलित प्रयोग: बिहार के बाद यूपी में भी बन चुका हार का समीकरण-रितेश सिन्हा (वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक)

उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव को देखते हुए सभी राजनीतिक दलों ने कमर कस ली है। चुनावी तैयारियां तेज हो चुकी हैं और हर दल अपने-अपने सामाजिक समीकरण साधने में जुटा है। कांग्रेस ने भी आनन-फानन में संगठनात्मक बदलाव के नाम पर उत्तर प्रदेश के प्रभारी को बदलते हुए राजेंद्र पाल गौतम को यह जिम्मेदारी सौंप दी। हालांकि प्रदेश अध्यक्ष अजय राय को हटाने के बजाय पार्टी ने केवल प्रभारी बदलकर संदेश देने की कोशिश की है। मुख्तार अंसारी और अतीक अहमद से जुड़े मुद्दों को लेकर प्रदेश के मुस्लिम समाज का एक बड़ा वर्ग भी प्रदेश अध्यक्ष अजय राय से खासा नाराज बताया जाता है। इसके बावजूद सीमित राजनीतिक प्रभाव के बावजूद वे अब तक अपने पद पर बने रहने में सफल रहे हैं।

राजेंद्र पाल गौतम के आने के साथ ही पूर्व प्रभारी अविनाश पांडे का कार्यकाल समाप्त हो गया। राजनीतिक रूप से सीमित जनाधार रखने वाले और दिल्ली नेतृत्व की पसंद माने जाने वाले अविनाश पांडे, मूल रूप से उत्तर प्रदेश के बलिया से आते हैं, लेकिन लंबे समय से महाराष्ट्र के नागपुर की राजनीति में सक्रिय रहे हैं। आलोचकों का आरोप है कि अपने निवास क्षेत्र से पार्षद तक न चुनवा पाने वाले पूर्व प्रभारी उत्तर प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों पर संगठन को मजबूत करने के बजाय अपनी कार्यशैली को लेकर अधिक चर्चित रहे। लगभग दो वर्षों तक उन्होंने अपने तरीके से संगठन चलाया, लेकिन कांग्रेस को कोई उल्लेखनीय राजनीतिक लाभ नहीं मिला। पिछले वर्ष कांग्रेस ने राजेंद्र पाल गौतम को दलित राजनीति को साधने के उद्देश्य से अनुसूचित जाति विभाग का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया था। अब उन्हें उत्तर प्रदेश जैसा सबसे बड़ा राजनीतिक राज्य सौंप दिया गया है। प्रभारी बनने के बाद वे पूरे उत्साह के साथ ‘जय भीम’ के नारों के बीच उत्तर प्रदेश कांग्रेस मुख्यालय पहुंचे। उल्लेखनीय है कि हिन्दू देवी-देवताओं पर की गई उनकी विवादित टिप्पणी के कारण आम आदमी पार्टी ने न केवल उन्हें दिल्ली सरकार में मंत्री पद से हटाया था, बल्कि बाद में उनसे राजनीतिक दूरी भी बना ली थी।

दिल्ली की राजनीति से उभरे राजेंद्र पाल गौतम वर्ष 2014 में आम आदमी पार्टी में शामिल हुए थे। वर्ष 2015 और 2020 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में वे विधायक चुने गए। यह आम आदमी पार्टी का स्वर्णिम दौर माना जाता है। हालांकि उनकी राजनीतिक पहचान दिल्ली तक ही सीमित रही है। ऐसे में उत्तर प्रदेश जैसे विशाल और जटिल राजनीतिक राज्य की जिम्मेदारी उन्हें सौंपे जाने पर कांग्रेस के भीतर भी कई तरह की चर्चाएं हैं।

उत्तर प्रदेश की राजनीति में अपनी पुरानी हैसियत खो चुकी कांग्रेस आज इकाई से दहाई तक पहुंचने के संघर्ष में लगी हुई है। ऐसे में बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती और आजाद समाज पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष चंद्रशेखर आजाद जैसे नेताओं के प्रभाव वाले दलित वोट बैंक में कांग्रेस कितनी जगह बना पाएगी, यह बड़ा सवाल है। इन दोनों नेताओं की प्रदेश की लगभग हर विधानसभा सीट पर राजनीतिक उपस्थिति मानी जाती है। केवल ‘जय भीम’ का नारा लगाने भर से कांग्रेस उम्मीदवार अपनी जमानत तक बचा पाएंगे या नहीं, इसे लेकर पार्टी के भीतर भी सवाल उठने लगे हैं।

प्रियंका गांधी के प्रभारी रहने के दौरान बसपा से आए बृजलाल खाबरी को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया था। खाबरी की व्यक्तिगत छवि संवाद स्थापित करने वाले नेता की रही और आज भी कांग्रेस कार्यकर्ताओं में उनके प्रति सम्मान है। इसके बावजूद वे मायावती और चंद्रशेखर आजाद के प्रभाव को चुनौती देने में सफल नहीं हो सके। स्थानीय निकाय चुनावों में भी कांग्रेस अपना खाता तक नहीं खोल सकी, जिससे संगठन की वास्तविक स्थिति उजागर हो गई। पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने 15 मार्च को लखनऊ में कांशीराम जयंती कार्यक्रम में शामिल होकर दलित समाज को राजनीतिक संदेश देने का प्रयास किया था। लेकिन अब तक उसका कोई ठोस राजनीतिक प्रभाव दिखाई नहीं दिया। दूसरी ओर, राजेंद्र पाल गौतम कांग्रेस आलाकमान के स्पष्ट निर्देश के बिना मायावती से राजनीतिक समझौते की कोशिश करने भी पहुंचे थे, जहां से उन्हें बैरंग लौटना पड़ा। इस घटनाक्रम के बाद कांग्रेस की काफी किरकिरी हुई। यहां तक कि उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी किए जाने की चर्चाएं भी तेज हो गई थीं। इसके बावजूद किस राजनीतिक समीकरण के तहत उन्हें उत्तर प्रदेश जैसा महत्वपूर्ण प्रभार सौंपा गया, यह आज भी कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं की समझ से परे है।

उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जाति की आबादी लगभग 23 प्रतिशत है। इस वर्ग का बड़ा हिस्सा लंबे समय से बहुजन समाज पार्टी के साथ जुड़ा रहा है। वहीं समाजवादी पार्टी, भारतीय जनता पार्टी और आजाद समाज पार्टी भी दलित मतदाताओं के बीच अपनी राजनीतिक पकड़ बना चुकी हैं। ऐसे में कांग्रेस की गांधीवादी विचारधारा से इतर आंबेडकरवादी राजनीति की पहचान रखने वाले राजेंद्र पाल गौतम पार्टी को कितना चुनावी लाभ दिला पाएंगे, यह बड़ा प्रश्न है। कहीं ऐसा न हो कि ओबीसी समाज को जोड़ने के नाम पर कांग्रेस में शामिल हुए अनिल जयहिंद की तरह उनका राजनीतिक प्रभाव भी केवल पार्टी कार्यालय तक ही सीमित रह जाए। इसका वास्तविक उत्तर चुनाव परिणाम ही देंगे। कांग्रेस भी उत्तर प्रदेश में अपनी वास्तविक राजनीतिक स्थिति से अनभिज्ञ नहीं है। रायबरेली की पारंपरिक सीट, जहां से मोना मिश्रा आराधना चुनाव लड़ती हैं और जिसे अघोषित रूप से विभिन्न दलों का समर्थन मिलता रहा है, उसे छोड़ दें तो दूसरी सीट जीतने के लिए पार्टी को भारी संघर्ष करना पड़ सकता है। दूसरी ओर, हिन्दू देवी-देवताओं पर राजेंद्र पाल गौतम की विवादित टिप्पणियां चुनाव के दौरान कांग्रेस के लिए कितना बड़ा राजनीतिक बोझ बनेंगी और भाजपा उन्हें किस प्रकार चुनावी मुद्दा बनाएगी, इसका अंदाजा राजनीतिक विश्लेषक पहले से लगा रहे हैं।

उत्तर प्रदेश से पहले बिहार में भी कांग्रेस का दलित प्रयोग अपेक्षित परिणाम नहीं दे सका। विधानसभा चुनाव के नतीजे आए सात महीने से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन प्रदेश प्रभारी और प्रदेश अध्यक्ष को बदलने की बात तो दूर, कांग्रेस आज तक विधानसभा में अपना नेता सदन भी तय नहीं कर सकी है। संगठनात्मक स्तर पर पसरी यह अनिश्चितता पार्टी की चुनावी स्थिति को और कमजोर करती है। वहीं, दस से अधिक चुनाव हारने का पारिवारिक रिकॉर्ड रखने वाले राज्यसभा सांसद अखिलेश सिंह अब भी पूरे आत्मविश्वास के साथ अपनी राजनीतिक उपलब्धियों का दावा करते हैं। वे यह बताने से नहीं चूकते कि कांग्रेस की छह से अधिक सीटों पर पार्टी को जीत दिलाने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। हालांकि वे यह तथ्य प्रायः नहीं बताते कि उसी लोकसभा चुनाव में सबसे सुरक्षित माने जाने वाले जातीय समीकरण वाली सीट से भी वे अपने बेटे को हार से नहीं बचा सके। इसके बावजूद वे एक बार फिर प्रदेश अध्यक्ष के रूप में वापसी की इच्छा जता रहे हैं।

दलित समुदाय से आने वाले कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के नेतृत्व में यह भी संभव है। बिहार में प्रभारी कृष्णा अल्लावरू और प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम अब भी अपने पदों पर बने हुए हैं। पार्टी के भीतर यह धारणा है कि दोनों नेताओं का शीर्ष नेतृत्व, विशेषकर खरगे से निकट संबंध होने के कारण उनके खिलाफ कोई बड़ा संगठनात्मक निर्णय नहीं लिया जा रहा है। दूसरी ओर, उत्तर प्रदेश में गैर-कांग्रेसी पृष्ठभूमि से आए और ‘जय भीम’ की राजनीति की पहचान रखने वाले राजेंद्र पाल गौतम को प्रभारी बनाए जाने के निर्णय ने भी अनेक कांग्रेस नेताओं को असहज कर दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल दलित चेहरा आगे करने की नहीं, बल्कि उसे वोट में बदलने की है। उत्तर प्रदेश में दलित मतदाता पहले से ही कई राजनीतिक दलों में बंटा हुआ है। ऐसे में केवल नारे या प्रतीकों के सहारे इस वर्ग का विश्वास जीतना आसान नहीं होगा। कांग्रेस की परंपरागत गांधीवादी राजनीति और राजेंद्र पाल गौतम की आंबेडकरवादी राजनीतिक पहचान के बीच संतुलन कैसे स्थापित होगा, यह भी देखने वाली बात होगी। कांग्रेस का यह नया दलित प्रयोग उत्तर प्रदेश में कितना सफल होगा, इसका फैसला चुनाव परिणाम करेंगे। लेकिन यदि पार्टी संगठनात्मक मजबूती, विश्वसनीय स्थानीय नेतृत्व और स्पष्ट राजनीतिक संदेश देने में विफल रहती है, तो बिहार की तरह उत्तर प्रदेश में भी उसे भारी राजनीतिक कीमत चुकानी पड़ सकती है। यही कारण है कि पार्टी के भीतर भी यह सवाल लगातार उठ रहा है कि क्या केवल चेहरे बदलने से कांग्रेस की चुनावी तस्वीर बदल पाएगी, या फिर यह प्रयोग भी बिहार की तरह एक और असफल राजनीतिक अध्याय बनकर रह जाएगा।

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