भाजपा के दिग्गजों में बढ़ती सुगबुगाहट, संघ में गहराती चिंता की लकीरें

भारतीय जनता पार्टी आज देश की सबसे शक्तिशाली राजनीतिक ताकत है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की जोड़ी ने भाजपा को चुनावी दृष्टि से उस ऊँचाई पर पहुँचा दिया है, जहाँ तक पहुँचने का सपना कभी पार्टी के संस्थापक नेताओं ने देखा था।- रितेश सिन्हा

भारतीय जनता पार्टी आज देश की सबसे शक्तिशाली राजनीतिक ताकत है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की जोड़ी ने भाजपा को चुनावी दृष्टि से उस ऊँचाई पर पहुँचा दिया है, जहाँ तक पहुँचने का सपना कभी पार्टी के संस्थापक नेताओं ने देखा था। लेकिन सत्ता के इस स्वर्णकाल के बीच पार्टी के भीतर एक दूसरा विमर्श भी आकार ले रहा है—क्या भाजपा की सबसे बड़ी ताकत ही भविष्य में उसकी सबसे बड़ी चुनौती बन सकती है? भाजपा की राजनीति में सबसे बड़ा परिवर्तन सत्ता, संगठन और निर्णय प्रक्रिया के अभूतपूर्व केंद्रीकरण के रूप में सामने आया। चुनावी दृष्टि से यह मॉडल बेहद सफल रहा है। लेकिन इसके समानांतर पार्टी के भीतर एक धारणा भी विकसित हुई है कि भाजपा का पारंपरिक सामूहिक नेतृत्व मॉडल लगातार कमजोर हुआ है। जनसंघ और अटल-आडवाणी युग की भाजपा में अनेक शक्ति केंद्र थे, अनेक बड़े नेता थे और संगठन की भूमिका सर्वोपरि मानी जाती थी। आज आलोचकों का एक वर्ग यह सवाल उठा रहा है कि क्या पार्टी की पूरी राजनीतिक संरचना कुछ सीमित शक्ति केंद्रों के इर्द-गिर्द सिमटती जा रही है?


भाजपा की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि यहाँ व्यक्ति नहीं, संगठन सर्वोपरि माना जाता था। लेकिन आज राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा आम है कि नरेंद्र मोदी का राजनीतिक कद भाजपा की सीमाओं से कहीं आगे निकल चुका है, जबकि संगठनात्मक ढाँचे पर अमित शाह का प्रभाव इतना व्यापक है कि बड़े से बड़ा नेता भी अपनी राजनीतिक सीमाओं को समझता है। यह भाजपा की ताकत भी है और भविष्य की चुनौती भी। यही कारण है कि पार्टी के अनेक वरिष्ठ नेताओं और उनके समर्थकों के बीच एक मौन बेचैनी दिखाई देती है। राजनाथ सिंह, शिवराज सिंह चौहान, वसुंधरा राजे, देवेंद्र फडणवीस, धर्मेंद्र प्रधान, राजीव प्रताप रूडी, शाहनवाज हुसैन जैसे नेताओं के समर्थकों का मानना है कि पार्टी में राजनीतिक कद और जनाधार की तुलना में केंद्रीय नेतृत्व की स्वीकृति अधिक महत्वपूर्ण होती जा रही है। सबसे अधिक चर्चा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को लेकर होती है। भाजपा में मोदी के बाद यदि किसी नेता का स्वतंत्र जनाधार राष्ट्रीय विमर्श का विषय बनता है तो वह योगी हैं। यही कारण है कि भाजपा के भविष्य और नेतृत्व की अगली पीढ़ी को लेकर होने वाली चर्चाओं में उनका नाम सबसे प्रमुखता से सामने आता है। हालांकि पार्टी सार्वजनिक रूप से एकजुटता का संदेश देती है, लेकिन राजनीतिक अटकलें कभी समाप्त नहीं होतीं।

मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान, राजस्थान में वसुंधरा राजे और महाराष्ट्र में देवेंद्र फडणवीस जैसे नेताओं ने अपने-अपने राज्यों में भाजपा की नींव मजबूत की। लेकिन समय के साथ यह धारणा मजबूत हुई कि पार्टी किसी भी राज्य में समानांतर शक्ति केंद्रों के उभार को लेकर अत्यंत सतर्क रहती है। यही कारण है कि कई क्षेत्रीय नेताओं की महत्वाकांक्षाएँ और संगठन की प्राथमिकताएँ हमेशा एक दिशा में नहीं चलतीं। यह स्थिति केवल हिंदी पट्टी तक सीमित नहीं है। दक्षिण भारत में बी. एस. येदियुरप्पा ने कर्नाटक में भाजपा को खड़ा किया। तमिलनाडु, तेलंगाना और केरल में भी कई नेताओं ने वर्षों तक संगठन विस्तार के लिए संघर्ष किया। पूर्वोत्तर में हिमंत बिस्वा सरमा, पेमा खांडू और अन्य नेताओं ने भाजपा के विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। लेकिन इन सभी राज्यों में भी अंतिम राजनीतिक दिशा और बड़े निर्णयों का केंद्र दिल्ली ही बना रहा। इससे यह प्रश्न बार-बार उठता है कि क्या भाजपा क्षेत्रीय नेतृत्व को पर्याप्त राजनीतिक स्पेस दे रही है या नहीं।

पार्टी के भीतर बढ़ती सुगबुगाहट का एक दूसरा कारण संगठनात्मक अवसरों का सीमित होना भी है। भाजपा आज देश की सबसे बड़ी पार्टी है, लेकिन शीर्ष पदों की संख्या सीमित है और महत्वाकांक्षी नेताओं की संख्या लगातार बढ़ रही है। राजनीति का इतिहास बताता है कि जब महत्वाकांक्षाएँ बढ़ती हैं और अवसर सीमित हो जाते हैं तो असंतोष की धीमी परतें बनने लगती हैं। आर्थिक नीतियों को लेकर भी राजनीतिक बहस लगातार तेज हुई है। विपक्षी दल और सरकार के आलोचक समय-समय पर आरोप लगाते रहे हैं कि केंद्र की कुछ नीतियाँ बड़े औद्योगिक समूहों के हितों के अधिक अनुकूल रही हैं। वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल की नीतियों को लेकर भी राजनीतिक बहस होती रही है। सरकार इन आरोपों को विकास, निवेश और औद्योगिक विस्तार की आवश्यकता बताकर खारिज करती रही है, लेकिन राजनीतिक विमर्श में यह मुद्दा लगातार मौजूद है। भाजपा के भीतर भी कुछ वर्गों का मानना है कि पार्टी को अपने पारंपरिक व्यापारी, मध्यम वर्गीय और छोटे उद्यमी आधार की चिंताओं को अधिक गंभीरता से सुनना चाहिए।

इन सबके बीच राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की भूमिका विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो जाती है। भाजपा अध्यक्ष के रूप में उनका कार्यकाल केवल संगठनात्मक प्रबंधन तक सीमित नहीं है, बल्कि उन्हें पार्टी के भीतर उभरती आकांक्षाओं, वरिष्ठ नेताओं की अपेक्षाओं, क्षेत्रीय नेतृत्व की महत्वाकांक्षाओं और केंद्रीय नेतृत्व की रणनीति के बीच संतुलन स्थापित करना होगा।
नितिन नवीन के सामने सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष नहीं, बल्कि भाजपा की अपनी विशाल संरचना है। उन्हें एक ऐसे संगठन का नेतृत्व करना है जहाँ एक ओर नरेंद्र मोदी का अभूतपूर्व जनाधार है, दूसरी ओर अमित शाह की मजबूत संगठनात्मक पकड़ है, और तीसरी ओर दर्जनों ऐसे वरिष्ठ नेता हैं जिन्होंने दशकों तक पार्टी को खड़ा करने में अपना राजनीतिक जीवन लगाया है। राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में उनकी सफलता इस बात से तय होगी कि वे संगठन को केवल संचालित करते हैं या वास्तव में उसे एकजुट भी रख पाते हैं।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लिए भी यह दौर महत्वपूर्ण माना जा रहा है। संघ का मूल दर्शन हमेशा संगठन, संवाद और सामूहिक नेतृत्व पर आधारित रहा है। इसलिए भाजपा के भीतर नेतृत्व के अत्यधिक केंद्रीकरण, क्षेत्रीय नेतृत्व की भूमिका और संगठनात्मक संतुलन को लेकर चिंतन स्वाभाविक माना जाता है। संघ की चिंता सत्ता परिवर्तन की नहीं, बल्कि संगठनात्मक संतुलन की है। भाजपा आज अपने राजनीतिक उत्कर्ष पर है। लेकिन किसी भी बड़े राजनीतिक दल की वास्तविक परीक्षा उसके कमजोर होने पर नहीं, बल्कि सबसे मजबूत होने के समय होती है। इतिहास बताता है कि बाहरी विपक्ष से अधिक चुनौती अक्सर भीतर जमा होती महत्वाकांक्षाओं, उपेक्षा की भावना और नेतृत्व संतुलन के प्रश्नों से पैदा होती है।

भाजपा के सामने आज सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि विपक्ष कितना कमजोर है। असली सवाल यह है कि क्या पार्टी अपनी पुरानी संगठनात्मक संस्कृति और वर्तमान नेतृत्व मॉडल के बीच संतुलन स्थापित कर पाएगी। यदि यह संतुलन बना रहता है तो भाजपा का प्रभुत्व लंबे समय तक कायम रह सकता है। लेकिन यदि वरिष्ठ नेतृत्व, क्षेत्रीय क्षत्रपों, नई पीढ़ी और संगठन के बीच दूरी बढ़ती है, तो आज की सुगबुगाहट कल एक बड़े राजनीतिक विमर्श का रूप ले सकती है। शायद यही वह कारण है कि भाजपा के भीतर बढ़ती खामोशी को लेकर संघ से लेकर संगठन तक, कई लोग ध्यानपूर्वक सुन रहे हैं।

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