55000 करोड़ के दावे, 6 अरब डॉलर का बाजार, लाखों युवाओं का पलायन,बिहार बनेगा तो देश बढ़ेगा या फिर यह केवल ‘रील गोल’ है? रितेश सिन्हा, वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक

नई दिल्ली के भारत मंडपम में मंगलवार से शुरू हुए भारत टेक्स-2026 ने एक बार फिर दुनिया का ध्यान भारत के वस्त्र एवं परिधान उद्योग की ओर खींचा है। 130 से अधिक देशों के खरीदार, 60 हजार से अधिक पंजीकृत प्रतिभागी, हजारों प्रदर्शक, वैश्विक ब्रांड, निवेशक और नीति-निर्माता एक मंच पर जुटे हैं। उद्घाटन करते हुए केंद्रीय वस्त्र मंत्री गिरिराज सिंह ने कहा कि भारत टेक्स अब केवल एक प्रदर्शनी नहीं, बल्कि भारत के सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों, बुनकरों, स्टार्टअप और निर्यातकों को वैश्विक बाजार से जोड़ने वाला सबसे बड़ा मंच बन चुका है। भारत का लक्ष्य केवल कपड़ा बनाना नहीं, बल्कि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला का नेतृत्व करना है। ऐसे में भारत मंडपम से उठता सबसे बड़ा सवाल सीधे बिहार की ओर जाता है—क्या बिहार इस वैश्विक अवसर के लिए तैयार है?

दुनिया तेजी से चीन पर अपनी निर्भरता कम कर रही है। चीन-प्लस-वन रणनीति, बांग्लादेश में उत्पादन संबंधी अनिश्चितता और वैश्विक कंपनियों की नई सोर्सिंग नीति ने भारत को एक बड़ा अवसर दिया है। भारत का वस्त्र एवं परिधान उद्योग आज लगभग 172 अरब अमेरिकी डॉलर का है। यह क्षेत्र देश के सकल घरेलू उत्पाद में लगभग 2 प्रतिशत, विनिर्माण उत्पादन में लगभग 12 प्रतिशत और कुल निर्यात में लगभग 8 प्रतिशत का योगदान देता है। लगभग 4.5 करोड़ लोगों को प्रत्यक्ष तथा 5 से 6 करोड़ लोगों को अप्रत्यक्ष रोजगार इसी उद्योग से मिलता है। केंद्र सरकार वर्ष 2030 तक इस उद्योग को 350 से 400 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य लेकर चल रही है। इस लक्ष्य को केवल गुजरात, तमिलनाडु और महाराष्ट्र के भरोसे हासिल नहीं किया जा सकता। बिहार जैसे श्रमप्रधान राज्य की भूमिका निर्णायक होगी।
बिहार सरकार आज स्वयं को “वैश्विक सोर्सिंग का अगला केंद्र” बताने में कोई कसर नहीं छोड़ रही। निवेश सम्मेलनों में “बिहार टेक्सटाइल इन्वेस्टमेंट अपॉर्च्युनिटीज” को प्रमुखता से प्रस्तुत किया जा रहा है। सरकार का दावा है कि राज्य में लगभग 55 हजार करोड़ रुपये के निवेश प्रस्ताव आए हैं। बिहार देश के सर्वाधिक सड़क घनत्व वाले राज्यों में शामिल है। ऊर्जा क्षेत्र में 11,995 मेगावाट से अधिक क्षमता के लिए विद्युत क्रय समझौते किए जा चुके हैं। वर्ष 2024-25 में राज्य का वस्त्र एवं परिधान बाजार लगभग 6 अरब अमेरिकी डॉलर का बताया जा रहा है। इसके साथ ही जीविका मिशन के तहत 10 लाख से अधिक स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी 1.30 करोड़ से अधिक महिलाएं उत्पादन आधारित अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत बताई जा रही हैं।
कागज पर देखें तो तस्वीर बेहद आकर्षक है। श्रम शक्ति उपलब्ध है। भूमि उपलब्ध है। सड़क संपर्क बेहतर बताया जा रहा है। बिजली उत्पादन क्षमता बढ़ने का दावा है। नेपाल, बांग्लादेश और पूर्वोत्तर भारत तक पहुंच का रणनीतिक लाभ भी बिहार के पास है। यदि केवल सरकारी प्रस्तुतियों पर विश्वास किया जाए तो बिहार आज देश का अगला बड़ा वस्त्र विनिर्माण केंद्र बनने की दहलीज पर खड़ा दिखाई देता है।
केंद्रीय वस्त्र मंत्री गिरिराज सिंह लगातार यह कहते रहे हैं कि भारत को “फार्म टू फाइबर, फाइबर टू फैक्ट्री, फैक्ट्री टू फैशन और फैशन टू फॉरेन” की पूरी मूल्य श्रृंखला पर काम करना होगा। उनका यह भी कहना है कि छोटे उद्यमियों, बुनकरों और एमएसएमई को सीधे वैश्विक बाजार से जोड़ना ही भारत टेक्स का सबसे बड़ा उद्देश्य है। दूसरी ओर बिहार सरकार में उद्योग मंत्री श्रेयसी सिंह का दावा है कि बिहार में निवेश का वातावरण तेजी से बदल रहा है और राज्य उद्योगों के लिए नई मंजिल बन रहा है। बिहार औद्योगिक क्षेत्र विकास प्राधिकरण (बियाडा) के अध्यक्ष कुंदन कुमार सिंह भी लगातार दावा करते रहे हैं कि नई औद्योगिक नीति, लैंड बैंक, प्लग-एंड-प्ले शेड और तेज स्वीकृति प्रक्रिया के कारण निवेशकों का भरोसा बढ़ा है।
यदि बिहार वास्तव में वैश्विक वस्त्र निवेश का अगला केंद्र बनने जा रहा है, तो देश के सबसे बड़े गारमेंट क्लस्टर—तिरुपुर, सूरत, नोएडा, गुरुग्राम, बेंगलुरु, लुधियाना और अहमदाबाद—की फैक्ट्रियों में सबसे अधिक श्रमिक बिहार से ही क्यों पहुंचते हैं? यदि बिहार में रोजगार की नई क्रांति आ चुकी है तो हर वर्ष लाखों युवा रोजगार के लिए दूसरे राज्यों की ओर पलायन क्यों करते हैं? यदि उद्योगों का माहौल इतना अनुकूल है तो बिहार अभी तक देश के प्रमुख वस्त्र निर्यातक राज्यों की सूची में क्यों नहीं पहुंच पाया?
बिहार के पास भागलपुर सिल्क जैसा विश्वविख्यात उत्पाद है, जिसे भौगोलिक संकेतक (जीआई) का दर्जा प्राप्त है। मिथिला की पारंपरिक कला, सीमांचल का विशाल श्रमबल, कोसी क्षेत्र की मानव संसाधन क्षमता और पूर्वी भारत का रणनीतिक भूगोल उसे प्राकृतिक बढ़त देते हैं। इसके बावजूद बिहार आज भी तैयार परिधान (रेडीमेड गारमेंट) निर्माण, तकनीकी वस्त्र, बड़े निर्यात क्लस्टर और वैश्विक ब्रांडों के निवेश के मामले में पिछड़ा हुआ दिखाई देता है।
सबसे बड़ा प्रश्न तो यह भी है कि केंद्र सरकार की पीएम मित्र मेगा टेक्सटाइल पार्क योजना के तहत गुजरात, तमिलनाडु, कर्नाटक, तेलंगाना, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश का चयन हुआ, लेकिन बिहार को स्थान नहीं मिला। यदि बिहार वास्तव में “वैश्विक सोर्सिंग का अगला केंद्र” बनने की क्षमता रखता है, तो देश की सबसे महत्वाकांक्षी वस्त्र अवसंरचना योजना से उसका बाहर रह जाना कई गंभीर सवाल खड़े करता है। क्या बिहार प्रस्ताव तैयार करने में पीछे रह गया? क्या आधारभूत संरचना अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंची? या फिर सरकार के दावे और धरातल की वास्तविकता के बीच अभी भी लंबी दूरी बाकी है? ‘बिहार बनेगा तो देश बढ़ेगा’ का सपना तभी साकार होगा, जब बिहार केवल श्रमिक नहीं, बल्कि वैश्विक वस्त्र उद्योग का नेतृत्व करने वाला राज्य भी बने। बिहार औद्योगिक क्षेत्र विकास प्राधिकरण (बियाडा) के अध्यक्ष कुंदन कुमार सिंह का कहना है कि राज्य में निवेशकों का विश्वास बढ़ा है, नई औद्योगिक इकाइयों को तेजी से भूमि आवंटित की जा रही है और हजारों करोड़ रुपये के निवेश प्रस्तावों को स्वीकृति मिली है। यह स्वागतयोग्य है। लेकिन निवेश प्रस्ताव और धरातल पर चालू उद्योग—दोनों अलग-अलग बातें हैं। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि 55 हजार करोड़ रुपये के प्रस्तावित निवेश में से वास्तविक निवेश कितना हुआ? कितनी परियोजनियां उत्पादन शुरू कर चुकी हैं? और उनमें से वस्त्र उद्योग की हिस्सेदारी कितनी है? जब तक इन प्रश्नों का स्पष्ट उत्तर सार्वजनिक नहीं होगा, तब तक दावों की विश्वसनीयता अधूरी रहेगी।
बिहार सरकार की उद्योग मंत्री श्रेयसी सिंह का कहना है कि राज्य में औद्योगिक माहौल तेजी से बदल रहा है। लेकिन वस्त्र उद्योग में बदलाव का सबसे बड़ा पैमाना यह होना चाहिए कि क्या बिहार के युवाओं का पलायन कम हुआ? यदि आज भी लाखों युवा तिरुपुर, सूरत, नोएडा, गुरुग्राम और बेंगलुरु की गारमेंट फैक्ट्रियों में काम कर रहे हैं, तो इसका अर्थ है कि बिहार अब भी रोजगार पैदा करने वाला नहीं, बल्कि रोजगार निर्यात करने वाला राज्य बना हुआ है।
यह विडंबना है कि जिस बिहार के श्रमिक भारत के वस्त्र उद्योग की रीढ़ हैं, उसी बिहार में बड़े परिधान निर्माण क्लस्टर आज भी गिने-चुने हैं। भागलपुर सिल्क की अंतरराष्ट्रीय पहचान है, लेकिन क्या उसे इटली के सिल्क उद्योग, चीन के रेशम बाजार या बांग्लादेश के परिधान मॉडल की तरह वैश्विक ब्रांड बनाया जा सका? उत्तर निराशाजनक है।
विश्व बैंक और विभिन्न औद्योगिक अध्ययनों में बार-बार यह बात सामने आई है कि केवल सस्ता श्रम निवेश नहीं लाता। निवेशक विश्वसनीय बिजली, गुणवत्तापूर्ण औद्योगिक भूमि, कुशल मानव संसाधन, बंदरगाहों तक तेज संपर्क, एकल खिड़की प्रणाली की प्रभावशीलता, न्यायिक स्थिरता और समयबद्ध सरकारी निर्णय भी देखते हैं। बिहार ने इनमें कुछ क्षेत्रों में सुधार किया है, लेकिन प्रतिस्पर्धा गुजरात, तमिलनाडु, कर्नाटक और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों से है, जिन्होंने वर्षों पहले वस्त्र उद्योग का मजबूत पारिस्थितिकी तंत्र विकसित कर लिया।
सबसे अधिक चर्चा पीएम मित्र मेगा टेक्सटाइल पार्क की होती है। यह केवल एक औद्योगिक पार्क नहीं, बल्कि संपूर्ण मूल्य श्रृंखला—फाइबर, प्रोसेसिंग, डाइंग, गारमेंट, परीक्षण, पैकेजिंग और निर्यात—को एक स्थान पर विकसित करने की योजना है। सात राज्यों को इसका लाभ मिला, लेकिन बिहार इस सूची से बाहर रह गया। यह केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि बिहार के लिए एक खोया हुआ अवसर भी माना जा सकता है। यदि बिहार इस योजना में शामिल होता, तो हजारों करोड़ रुपये का निवेश और लाखों रोजगार आकर्षित करने की संभावना बन सकती थी।
दूसरी ओर, बिहार के पास ऐसी ताकत भी है जिसे अभी तक पूरी तरह इस्तेमाल नहीं किया गया। जीविका मिशन से जुड़ी 1.30 करोड़ से अधिक महिलाएं यदि आधुनिक परिधान निर्माण, तकनीकी वस्त्र, स्कूल यूनिफॉर्म, अस्पताल लिनेन, रक्षा क्षेत्र के वस्त्र, ई-कॉमर्स और निर्यात आधारित उत्पादन से जोड़ी जाएं, तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था की तस्वीर बदल सकती है। आज बांग्लादेश का परिधान उद्योग मुख्यतः महिला श्रमिकों के दम पर खड़ा है। बिहार भी इस मॉडल से सीख सकता है।
भागलपुर सिल्क, मधुबनी कला आधारित वस्त्र, गया का कॉटन शिल्प, सीमांचल का जूट और उत्तर बिहार की बुनाई परंपरा—ये केवल सांस्कृतिक धरोहर नहीं, बल्कि अरबों रुपये के निर्यात की संभावनाएं हैं। लेकिन इसके लिए डिजाइन सेंटर, कॉमन फैसिलिटी सेंटर, आधुनिक परीक्षण प्रयोगशालाएं, ब्रांडिंग, वैश्विक विपणन और ई-कॉमर्स नेटवर्क विकसित करना होगा। केवल हस्तशिल्प मेलों से वैश्विक बाजार नहीं जीते जाते।
भारत मंडपम में आयोजित भारत टेक्स-2026 का सबसे बड़ा संदेश यही था कि आने वाला दशक मूल्य संवर्धन, तकनीकी वस्त्र, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित विनिर्माण, स्थायी उत्पादन और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला का होगा। यदि बिहार अभी भी केवल परंपरागत बुनाई और छोटे उत्पादन तक सीमित रहा, तो वह एक बार फिर अवसर खो देगा।
सरकार को केवल निवेश समझौतों की संख्या बताने के बजाय पांच स्पष्ट लक्ष्य घोषित करने चाहिए—पहला, बिहार का पहला विश्वस्तरीय गारमेंट निर्यात क्लस्टर; दूसरा, भागलपुर सिल्क के लिए वैश्विक ब्रांड रणनीति; तीसरा, जीविका समूहों को निर्यातोन्मुख वस्त्र उत्पादन से जोड़ना; चौथा, हर प्रमंडल में एक आधुनिक टेक्सटाइल पार्क; और पांचवां, अगले पांच वर्षों में कम-से-कम 10 लाख नए प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रोजगार का रोडमैप।
प्रश्न सरकार की नीयत का नहीं, नतीजों का है। यदि बिहार के दावे सही हैं, तो आने वाले पांच वर्षों में राज्य को देश के शीर्ष वस्त्र निवेश केंद्रों में शामिल होना चाहिए। यदि ऐसा नहीं होता, तो “बिहार—वैश्विक सोर्सिंग का अगला केंद्र” और “बिहार बनेगा तो देश बढ़ेगा” जैसे नारे केवल प्रस्तुति की स्लाइडों तक सीमित रह जाएंगे।
बिहार के पास श्रम है, बाजार है, परंपरा है, भूगोल है और अवसर भी। अब जरूरत है राजनीतिक इच्छाशक्ति से आगे बढ़कर औद्योगिक परिणाम देने की। क्योंकि इतिहास न तो घोषणाओं को याद रखता है और न ही निवेश प्रस्तावों को। इतिहास केवल उन राज्यों को याद रखता है, जिन्होंने अपने युवाओं को पलायन से उत्पादन की ओर, और संभावनाओं को समृद्धि में बदल दिया।

