शरद आगमन और प्रकृति का दार्शनिक स्वरूप ‘बरषा बुढ़ाई’ का मर्म..

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह, सहज़, हरदा , मध्य प्रदेश

गोस्वामी तुलसीदास जी की अमर कृति ‘श्रीरामचरितमानस’ केवल भक्ति का महासागर ही नहीं, बल्कि प्रकृति चित्रण का एक अत्यंत सजीव और अद्वितीय दस्तावेज भी है। महाकवि तुलसीदास केवल मर्यादा और भक्ति के चितेरे नहीं हैं, बल्कि वे प्रकृति और मानव मन के बीच के बारीक रिश्तों को गहराई से समझने वाले प्रकृति-प्रेमी भी हैं। जब भगवान श्रीराम के मुख से शरद ऋतु का वर्णन प्रगट होता है, तो वह पाठक के मन में प्रकृति के प्रति अगाध प्रेम और विस्मय जगा देता है। प्रस्तुत चौपाई इसी सौन्दर्य की पराकाष्ठा है:

बरषा बिगत सरद रितु आई। लछमन देखहु परम सुहाई॥

फूलें कास सकल महि छाई। जनु बरषाँ कृत प्रगट बुढ़ाई॥

इन दिव्य पंक्तियों में भगवान श्रीराम अपने अनुज लक्ष्मण को संबोधित करते हुए शरद के आगमन पर अपनी असीम प्रसन्नता व्यक्त करते हैं। यह उल्लास केवल मौसम के बदलाव का नहीं, बल्कि मानसिक शांति और आत्मिक पवित्रता का प्रतीक है, जो वर्षा की उमस, सघन बादलों और कीचड़ के बाद एक गहरी राहत बनकर धरती पर उतरता है।

शरद आगमन के प्रमुख आयाम

वर्षा की विदाई और बुढ़ापा,वर्षा बुढ़ाई’ का अर्थ है कि वर्षा ऋतु अब अपनी पूर्णता और चरम यौवन से आगे बढ़कर क्षीण होने लगी है, ठीक वैसे ही जैसे मनुष्य के जीवन का अंतिम पड़ाव या बुढ़ापा होता है। सावन-भादो के उमड़-घुमड़कर बरसने वाले काले बादल थम जाते हैं और मानसून की आक्रामक गतिविधियाँ मंद पड़ जाती हैं।

धवल कांस फूलों की चादर,

नदियों के किनारे, खेतों की मेड़ों और खुले मैदानों में सफ़ेद कास के फूलों का खिलना शरद के आगमन का सबसे सुंदर और जीवंत प्रमाण है। नीले आसमान के नीचे झूमते ये चमकीले सफ़ेद फूल ऐसे प्रतीत होते हैं मानो प्रकृति ने पृथ्वी पर अपनी श्वेत चाँदनी बिछा दी हो। स्वच्छ और निर्मल वातावरण,वर्षा की फुहारों से धूल-कणों के धुल जाने के कारण आसमान अत्यंत स्वच्छ, नीला और गहरा हो जाता है। हवा में घुली हल्की सी सिहरन और शीतलता मन को प्रफुल्लित कर देती है।

संस्कृति और उल्लास से जुड़ाव,भारतीय लोकजीवन में कास के फूलों का खिलना और वर्षा का थमना दुर्गा पूजा, दशहरा और शरद पूर्णिमा जैसे बड़े त्योहारों के आगमन की सूचना देता है। यह समय उदासी को पीछे छोड़कर उत्सव और उल्लास को गले लगाने का होता है।काव्य सौंदर्य और दार्शनिक चिंतन , तुलसीदास जी ने शरद ऋतु के सौन्दर्य को व्यक्त करने के लिए कास के फूलों का बेहद अनूठा प्रयोग किया है। वे कहते हैं कि चारों तरफ सफ़ेद और फूले हुए कास के फूलों से पूरी पृथ्वी इस तरह ढँक गई है, मानो किसी ने दूर तक रेशमी सफेद चादर बिछा दी हो। इस वर्णन को जो चीज़ परम असाधारण बनाती है, वह है आगे की पंक्ति में प्रयुक्त उत्प्रेक्षा अलंकार—”…जनु बरषाँ कृत प्रगट बुढ़ाई॥” सावन के उमड़ते काले बादल और भादो की घटाएँ अंतत,शरद की इस धवल और शांत चादर में विलीन हो जाती हैं। यहाँ कवि कल्पना करते हैं कि ये कास के फूल मानो वर्षा ऋतु के सफ़ेद बाल हैं, जिनके माध्यम से उसने अपना बुढ़ापा प्रकट कर दिया हो। यह एक बेहद गहरी और विचारोत्तेजक उपमा है। वर्षा ऋतु अपनी तरुणाई में यौवन और शक्ति से परिपूर्ण होती है, किंतु शरद के आते-आते, अपने बुढ़ापे में, वह इन्हीं सफ़ेद फूलों के ज़रिए अपनी शांति और परिपक्वता को दर्शाती है। इस उपमा में समय का शाश्वत चक्र, प्रकृति का निरंतर परिवर्तन और जीवन का गाढ़ दर्शन एक साथ झलक उठता है।

यह पंक्ति और इसके साथ जुड़ी प्राकृतिक छटा हमें यह सिखाती है कि परिवर्तन ही प्रकृति का अटल नियम है। जिस प्रकार वर्षा के प्रस्थान के बाद शरद की यह श्वेत सुंदरता धरती को नया जीवन प्रदान करती है, ठीक उसी प्रकार जीवन में भी हर एक अंत एक नई शुरुआत की संभावना लेकर आता है। तुलसीदास जी का यह काव्य-प्रसंग हमें यह सिखाता है कि जीवन के तमाम संघर्षों और पतझड़ के बाद ही शरद जैसी शीतलता, शांति और परिपक्वता का आगमन होता है। उनकी लेखनी का यह जादू एक साधारण से प्राकृतिक दृश्य को आध्यात्मिक एवं दार्शनिक चिंतन में बदल देता है, जो पाठक के मन को सदैव के लिए मोहित कर लेता है।

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