क्या बदलेंगे बिहार के सरकारी स्कूलों के दिन? रितेश सिन्हा, वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक

बिहार की शिक्षा व्यवस्था लंबे समय से बदलाव की प्रतीक्षा कर रही है। राज्य में शिक्षा का विस्तार तो हुआ है, लेकिन गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, आधारभूत सुविधाओं और विद्यार्थियों के सीखने के स्तर को लेकर चुनौतियां आज भी बनी हुई हैं। ऐसे समय में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी द्वारा ‘बिहार स्कूल लाइव क्लासेज’ की शुरुआत शिक्षा व्यवस्था में तकनीक आधारित बदलाव की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल मानी जा रही है। राजकीय कन्या उच्च माध्यमिक विद्यालय, शास्त्रीनगर, पटना में आयोजित कार्यक्रम में मुख्यमंत्री ने इस योजना का शुभारंभ किया। इसके साथ ही बिहार विद्यालय परीक्षा समिति द्वारा संचालित नीट और जेईई की निःशुल्क तैयारी कार्यक्रम की शुरुआत की गई। पहले चरण में राजधानी के 10 मॉडल विद्यालयों के विद्यार्थियों को लाइव क्लासेज से जोड़ा गया है। आगे इसका विस्तार अधिक विद्यालयों तक करने की योजना है।

शिक्षा विभाग ने शिक्षा में नवाचार और गुणवत्ता सुधार के लिए 7 स्वयंसेवी संस्थाओं के साथ समझौता किया है। इनके माध्यम से कृत्रिम बुद्धिमत्ता, विज्ञान एवं गणित शिक्षा, शिक्षक प्रशिक्षण, तकनीकी अध्ययन सामग्री और विद्यार्थियों के मूल्यांकन की आधुनिक व्यवस्था विकसित करने का लक्ष्य रखा गया है। बिहार में लगभग 72 हजार सरकारी विद्यालय हैं, जिनमें करोड़ों विद्यार्थी अध्ययन करते हैं। यू-डाइस प्लस के आंकड़ों के अनुसार बिहार के सरकारी विद्यालयों में ही एक करोड़ 66 लाख से अधिक विद्यार्थी नामांकित हैं। ऐसे विशाल शिक्षा तंत्र में किसी भी योजना की असली परीक्षा राजधानी के कुछ विद्यालयों में नहीं, बल्कि राज्य के सुदूर गांवों और पिछड़े क्षेत्रों के विद्यालयों में होगी।
पटना के मॉडल विद्यालयों से शुरू हुई यह पहल तभी सफल मानी जाएगी जब इसका लाभ अररिया, किशनगंज, कटिहार, मधुबनी, पश्चिम चंपारण, जमुई, कैमूर और राज्य के अन्य जिलों के सामान्य सरकारी विद्यालयों तक समान रूप से पहुंचे। बिहार की शिक्षा व्यवस्था की सबसे बड़ी चुनौती केवल तकनीक की नहीं, बल्कि बुनियादी सुविधाओं की भी है। कई विद्यालयों में आज भी विज्ञान प्रयोगशाला, पुस्तकालय, कंप्यूटर सुविधा और इंटरनेट जैसी व्यवस्थाओं को मजबूत करने की आवश्यकता है। यू-डाइस प्लस की रिपोर्ट भी देशभर में विद्यालयों की आधारभूत सुविधाओं को लेकर कई चुनौतियों की ओर संकेत करती है।
यही कारण है कि सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि लाइव क्लासेज केवल स्क्रीन तक सीमित न रहें, बल्कि विद्यार्थी वास्तव में सीखने की प्रक्रिया से जुड़ें। इसके लिए प्रशिक्षित शिक्षक, नियमित निगरानी और विद्यालय स्तर पर तकनीकी सहायता जरूरी होगी। बिहार की शिक्षा व्यवस्था के सामने सबसे बड़ी चुनौती सीखने के स्तर की भी है। विभिन्न शिक्षा सर्वेक्षणों में यह सामने आता रहा है कि बड़ी संख्या में विद्यार्थी अपनी कक्षा के अनुरूप पढ़ने और गणित की बुनियादी क्षमता हासिल करने में पीछे हैं। इसका अर्थ यह है कि उच्च तकनीक आधारित शिक्षा के साथ-साथ प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा की नींव को मजबूत करना भी उतना ही आवश्यक है।
मुख्यमंत्री द्वारा नीट और जेईई की निःशुल्क तैयारी की शुरुआत आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के विद्यार्थियों के लिए बड़ा अवसर बन सकती है। आज निजी शिक्षण संस्थानों में इन परीक्षाओं की तैयारी पर लाखों रुपये खर्च होते हैं। गांव और गरीब परिवारों के प्रतिभाशाली विद्यार्थी अक्सर आर्थिक संसाधनों के अभाव में पीछे रह जाते हैं। यदि सरकारी व्यवस्था विशेषज्ञ शिक्षकों, नियमित अभ्यास और बेहतर मार्गदर्शन के साथ आगे बढ़ती है तो यह बिहार के युवाओं के लिए बड़ा बदलाव साबित हो सकता है।
केवल प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं होगा। यह भी सुनिश्चित करना होगा कि विद्यार्थियों को नियमित अभ्यास, परीक्षा आधारित मूल्यांकन और व्यक्तिगत मार्गदर्शन मिले। राजधानी और ग्रामीण क्षेत्रों के विद्यार्थियों के बीच सुविधा का अंतर समाप्त करना सबसे बड़ी चुनौती होगी। सरकार ने जिन 7 संस्थाओं के साथ समझौता किया है, उनका अनुभव शिक्षा सुधार में उपयोगी हो सकता है। लेकिन बिहार में कई योजनाओं का अनुभव यह बताता है कि शुरुआत जितनी महत्वपूर्ण होती है, उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण उसका लगातार संचालन होता है। योजनाएं तभी सफल होती हैं जब उनकी निगरानी मजबूत हो और जवाबदेही तय हो।
बिहार में सरकारी विद्यालयों की संख्या और विद्यार्थियों की बड़ी आबादी को देखते हुए यह पहल केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक बड़ी जिम्मेदारी है। यू-डाइस के आंकड़ों के अनुसार देश में सरकारी विद्यालयों में विद्यार्थियों की संख्या में बदलाव की चुनौती भी सामने आई है, ऐसे में सरकारी शिक्षा व्यवस्था की गुणवत्ता और विश्वास को मजबूत करना जरूरी है। बिहार से हर वर्ष बड़ी संख्या में विद्यार्थी बेहतर शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए दूसरे राज्यों और बड़े शहरों की ओर जाते हैं। यदि राज्य के सरकारी विद्यालयों में ही गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी उपलब्ध हो सके तो यह शिक्षा पलायन को कम करने की दिशा में बड़ा कदम होगा।
सम्राट चौधरी सरकार ने शिक्षा के क्षेत्र में एक नई शुरुआत की है। लेकिन जनता अब केवल घोषणाओं से संतुष्ट नहीं होगी। वह परिणाम देखना चाहती है। वह देखना चाहती है कि क्या गांव के सामान्य सरकारी विद्यालय में पढ़ने वाला विद्यार्थी भी बड़े शहरों के विद्यार्थियों के समान अवसर प्राप्त कर पा रहा है।बिहार के सरकारी स्कूलों के दिन तभी बहुरेंगे, जब तकनीक के साथ शिक्षक, संसाधन, गुणवत्ता और जवाबदेही भी सुनिश्चित होगी।
‘बिहार स्कूल लाइव क्लासेज’ केवल एक योजना नहीं, बल्कि बिहार की शिक्षा व्यवस्था की अग्निपरीक्षा है। यदि यह पहल 72 हजार विद्यालयों और करोड़ों विद्यार्थियों तक प्रभावी रूप से पहुंची, तो यह राज्य के शिक्षा इतिहास में बड़ा बदलाव साबित हो सकती है। लेकिन यदि यह कुछ चुनिंदा विद्यालयों तक सीमित रह गई, तो उम्मीद और हकीकत के बीच की दूरी बनी रहेगी।
शिक्षा में बदलाव उद्घाटन से नहीं, परिणामों से साबित होता है। अब परीक्षा विद्यार्थियों की नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था की है।

