बिहार इस समय एक डिजिटल चौराहे पर खड़ा है। सूचना तकनीक का उपयोग जनहित में होना चाहिए, इसमें कोई दो राय नहीं है। सरकार की अच्छी योजनाओं की जानकारी जनता तक पहुंचनी ही चाहिए, और इसके लिए आधुनिक माध्यमों का उपयोग स्वागत योग्य है। लेकिन जब यह प्रक्रिया एकतरफा हो जाए और सत्ता की आलोचना के हर स्वर को आर्थिक रूप से पंगु बनाने का जरिया बन जाए, तो इसे लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी माना जाना चाहिए।

बिहार की राजनीति और प्रशासनिक गलियारों में इन दिनों एक नया नारा गूंज रहा है “सरकार की तारीफ करो और इनाम पाओ।” यह नारा किसी विपक्षी दल का तंज नहीं, बल्कि राज्य के सूचना एवं जनसंपर्क विभाग (IPRD) और डिजिटल मीडिया नीति के क्रियान्वयन के बाद आम जनता और पत्रकारों के बीच चर्चा का मुख्य विषय बन चुका है। राज्य सरकार ने अपनी योजनाओं के व्यापक प्रचार-प्रसार के लिए सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स, यूट्यूबर्स, फेसबुक क्रिएटर्स और डिजिटल पत्रकारों के लिए एक नई विज्ञापन नीति को मंजूरी दी है। इस नीति के तहत सरकार के पक्ष में सकारात्मक कंटेंट बनाने वाले क्रिएटर्स को लाखों रुपये के विज्ञापन देने का प्रावधान किया गया है। लेकिन इस चमक-दमक के पीछे एक गहरा ‘भ्रमजाल’ भी बुना जा रहा है, जिसने बिहार के लोकतांत्रिक ढांचे, पत्रकारिता के मूल्यों और आम जनता के अधिकारों पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

बिहार सरकार की नई सोशल मीडिया विज्ञापन नीति के तहत राज्य की कल्याणकारी योजनाओं, जैसे सात निश्चय पार्ट-2, मुख्यमंत्री साइकिल योजना, कन्या उत्थान योजना, और बुनियादी ढांचा विकास को जन-जन तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है। इसके लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को उनके फॉलोअर्स और सब्सक्राइबर्स की संख्या के आधार पर अलग-अलग श्रेणियों (ए, बी, सी, और डी) में बांटा गया है। 5 लाख से अधिक फॉलोअर्स वाले क्रिएटर्स को हर महीने बड़ी राशि के सरकारी विज्ञापन और स्पॉन्सर्ड पोस्ट मिलेंगे। मध्यम स्तर के यूट्यूबर्स और रील्स बनाने वालों को शामिल किया गया है। जिला और ब्लॉक स्तर के स्थानीय क्रिएटर्स, जिनके पास 10,000 से अधिक फॉलोअर्स हैं, उन्हें भी इस तंत्र का हिस्सा बनाया गया है। सरकार का तर्क है कि पारंपरिक मीडिया (अखबार और टीवी) की तुलना में आज की युवा पीढ़ी सोशल मीडिया पर अधिक समय बिताती है। इसलिए, सरकारी योजनाओं का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने के लिए डिजिटल इन्फ्लुएंसर्स को जोड़ना एक प्रगतिशील कदम है। इससे न केवल ग्रामीण युवाओं को रोजगार मिलेगा, बल्कि सूचनाओं का प्रसार भी तेजी से होगा।
इस नीति के लागू होते ही बिहार के डिजिटल मीडिया परिदृश्य में एक अभूतपूर्व बाढ़ आ गई है। हर दूसरे स्मार्टफोन धारक ने खुद को ‘पत्रकार’ या ‘कंटेंट क्रिएटर’ घोषित कर दिया है। लेकिन समस्या इस बात से नहीं है कि लोग कंटेंट बना रहे हैं; समस्या उस ‘भ्रमजाल’ से है जो इस नीति के वित्तीय प्रलोभन के कारण पैदा हुआ है। जब सरकार खुद यह तय करने लगे कि “सकारात्मक खबर” लिखने या दिखाने पर ही आर्थिक मदद (विज्ञापन) मिलेगी, तो पत्रकारिता का मूल सिद्धांत,निष्पक्षता दम तोड़ने लगता है। बिहार की जमीन पर अब ऐसे वीडियो और पोस्ट्स की भरमार है, जहां चमचमाती सड़कों, नए पुलों और सरकारी शिविरों के विजुअल्स दिखाए जा रहे हैं। लेकिन उसी सड़क के बगल में जलभराव से जूझते किसान, पुल के निर्माण में बरती गई कथित अनियमितताएं, और स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टरों की अनुपस्थिति जैसी जमीनी हकीकतें इन वीडियो से पूरी तरह गायब हैं। यह नीति अनजाने में (या शायद जानबूझकर) एक ऐसा इको-सिस्टम तैयार कर रही है, जहां ‘सवाल पूछना’ घाटे का सौदा बन गया है और ‘बड़ाई करना’ मुनाफे का धंधा। स्थानीय स्तर के स्वतंत्र पत्रकार, जो कभी प्रशासन की कमियों को उजागर कर जनता की आवाज बनते थे, अब इस असमंजस में हैं कि वे जनता की समस्या दिखाएं या सरकार का गुणगान कर अपने परिवार के लिए राजस्व जुटाएं।
बिहार एक ऐसा राज्य है जो बाढ़, सुखाड़, बेरोजगारी और पलायन जैसी गंभीर संरचनात्मक समस्याओं से लगातार जूझता रहा है। उत्तरी बिहार का एक बड़ा हिस्सा हर साल बाढ़ की विभीषिका झेलता है। दक्षिण बिहार के कई जिले पानी की बूंद-बूंद को तरसते हैं। युवाओं का एक बड़ा वर्ग ग्रुप-डी की नौकरियों से लेकर तकनीकी पदों तक के लिए परीक्षा लीक और अदालती मुकदमों के फेर में फंसा हुआ है। ऐसे में, जब सोशल मीडिया फीड्स पर केवल “ऑल इज वेल” (सब कुछ ठीक है) का नैरेटिव चलाया जाता है, तो यह जमीनी हकीकत और डिजिटल परसेप्शन (धारणा) के बीच एक बड़ा फासला पैदा करता है। ग्रामीण इलाकों का एक आम नागरिक जब अपने टूटे हुए घर के बाहर बैठकर मोबाइल पर सरकार की ‘अभूतपूर्व उपलब्धियों’ के वीडियो देखता है, तो वह एक अजीब किस्म के अलगाव और मानसिक भ्रमजाल का शिकार हो जाता है। उसे लगने लगता है कि विकास तो हो रहा है, लेकिन शायद सिर्फ उसके गांव या उसकी जाति तक ही नहीं पहुंच पा रहा है। यह स्थिति सामाजिक असंतोष और अविश्वास को और गहरा करती है। लोकतंत्र में मीडिया को चौथा स्तंभ माना गया है, जिसका काम सरकार की नीतियों की समीक्षा करना और उसकी कमियों को उजागर करना है ताकि प्रशासनिक सुधार हो सके। लेकिन “पैसे पाओ और बड़ाई करो” की यह संस्कृति इस चौथे स्तंभ की नींव को ही खोखला कर रही है।
अब सरकार को किसी खबर को दबाने के लिए सीधे तौर पर लाठी या जेल का इस्तेमाल करने की जरूरत नहीं है। आर्थिक नाकेबंदी और वित्तीय प्रोत्साहन का यह कॉम्बिनेशन अपने आप में एक ‘सॉफ्ट सेंसरशिप’ का काम करता है। क्रिएटर्स खुद ही अपनी खबरों को सेंसर करने लगे हैं ताकि उनका सरकारी पैनल में नाम न कट जाए। जब झूठ या आधे सच को आकर्षक थंबनेल और बैकग्राउंड म्यूजिक के साथ परोसा जाता है, तो आम दर्शक असली और नकली पत्रकारिता के बीच का अंतर भूल जाता है। इससे समाज में सूचना की विश्वसनीयता खत्म हो रही है। इस डिजिटल नैरेटिव बिल्डिंग में विपक्ष के उठाए गए मुद्दों को आसानी से ‘नकारात्मकता’ या ‘विकास विरोधी’ बताकर खारिज कर दिया जाता है, जिससे राजनीतिक विमर्श का संतुलन बिगड़ रहा है। सरकार के समर्थक इस नीति को युवाओं के डिजिटल सशक्तिकरण और रोजगार सृजन से जोड़कर देखते हैं। यह सच है कि बिहार के कई सुदूर जिलों जैसे पूर्णिया, सहरसा, गया और छपरा के युवाओं ने यूट्यूब के माध्यम से अपनी पहचान बनाई है और वे पैसे भी कमा रहे हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह रोजगार उन्हें आत्मनिर्भर बना रहा है या फिर उन्हें सत्ता के वैचारिक दायरे में बंधक बना रहा है? जब एक युवा क्रिएटर को यह समझ आ जाता है कि उसकी आय पूरी तरह से सत्ताधारी दल की संतुष्टि पर निर्भर है, तो उसकी रचनात्मकता और स्वतंत्र सोच समाप्त हो जाती है। वह एक स्वतंत्र नागरिक के बजाय सरकार की पीआर (पब्लिक रिलेशंस) मशीनरी का एक छोटा सा पुर्जा बनकर रह जाता है। लंबे समय में, यह प्रवृत्ति बिहार की उस युवा मेधा के लिए नुकसानदेह है जो अपनी बेबाकी और राजनीतिक चेतना के लिए जानी जाती है।
बिहार सरकार IPRD Bihar द्वारा सोशल मीडिया विज्ञापन नीति के तहत डिजिटल क्रिएटर्स को प्रति वीडियो 10,000 से 1 लाख रुपये तक की प्रोत्साहन राशि देने के फैसले पर राज्य का राजनीतिक और पत्रकारिता जगत पूरी तरह दो धड़ों में बंट गया है। इस विषय पर पक्ष, विपक्ष और वरिष्ठ पत्रकारों के रुख इस वैचारिक टकराव को साफ बयां करते हैं। सत्ताधारी दल और सरकारी प्रतिनिधियों का मानना है कि पारंपरिक प्रचार माध्यमों के सीमित दायरे को देखते हुए डिजिटल मीडिया को मुख्यधारा में जोड़ना समय की मांग है। “आज की युवा पीढ़ी अखबारों या टीवी डिबेट्स से ज्यादा रील्स और यूट्यूब वीडियो देखना पसंद करती है। यदि राज्य सरकार अपनी जनकल्याणकारी योजनाओं (जैसे मुख्यमंत्री साइकिल योजना या सात निश्चय) की सही जानकारी उन तक पहुंचाना चाहती है, तो इसमें डिजिटल इन्फ्लुएंसर्स की मदद लेना एक व्यावहारिक और आधुनिक कदम है। इससे न केवल ग्रामीण क्षेत्रों के युवाओं के लिए रोजगार के नए रास्ते खुल रहे हैं, बल्कि प्रशासनिक योजनाओं में पारदर्शिता भी बढ़ेगी.” “विपक्ष हर प्रगतिशील सोच में केवल राजनीति ढूंढता है। यह नीति बिहार के उन प्रतिभाशाली युवाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाएगी, जो सुदूर जिलों (जैसे सहरसा, पूर्णिया या गया) में बैठकर अपने दम पर कंटेंट तैयार कर रहे हैं। इसे ‘चाटुकारिता’ कहना बिहार की युवा मेधा का अपमान है।” विपक्षी दलों ने इस नीति को लेकर मुख्यमंत्री और कैबिनेट के फैसले पर तीखे सवाल उठाए हैं। विपक्ष का आरोप है कि राज्य में बुनियादी समस्याओं को छिपाने के लिए जनता के टैक्स के पैसे का दुरुपयोग किया जा रहा है।
“बिहार में नीतिगत रूप से ‘भ्रष्टाचार और बेरोजगारी’ चरम पर है। बाढ़ से किसान तबाह हैं और युवा परीक्षाओं के पेपर लीक होने से सड़कों पर लाठियां खा रहे हैं। ऐसे समय में जमीन पर काम करने के बजाय सरकार अपनी कुर्सी बचाने के लिए डिजिटल नैरेटिव खरीदने का प्रयास कर रही है। यह सीधे तौर पर ‘सरकारी खजाने से चुनावी पीआर’ करने और स्वतंत्र आवाजों को खरीदने की एक सोची-समझी साजिश है। जो भी क्रिएटर सरकार की कमियां दिखाएगा, उसे ब्लैकलिस्ट कर दिया जाएगा, जबकि केवल गुणगान करने वालों की जेबें भरी जाएंगी।” बिहार के जमीनी हालातों पर नजर रखने वाले वरिष्ठ पत्रकारों और संपादकों ने इस फैसले को पत्रकारिता के बुनियादी सिद्धांतों के लिए एक गंभीर चुनौती बताया है। “इस प्रदर्शन आधारित वित्तीय इंसेंटिव नीति के बाद बिहार में पत्रकारिता और पीआर (जनसंपर्क) के बीच की बची-खुची रेखा भी पूरी तरह मिट जाएगी। जब एक स्थानीय पत्रकार को पता होगा कि सरकार की तारीफ वाले वीडियो पर 1 लाख व्यूज आने से उसे 10,000 रुपये का सरकारी चेक मिल सकता है, तो वह किसी अस्पताल की बदहाली या पुल निर्माण की घटिया गुणवत्ता पर स्टोरी क्यों करेगा? यह नीति स्वतंत्र रिपोर्टिंग का गला घोंटने और पत्रकारों को सत्ता का वैचारिक बंधक बनाने जैसी है।” “लोकतंत्र का चौथा स्तंभ इसलिए जीवित है क्योंकि वह सत्ता से कड़े सवाल पूछता है। सरकार को अपनी योजनाओं का प्रचार करने का पूरा हक है, लेकिन इसके लिए पत्रकारों और क्रिएटर्स को ‘व्यूज के बदले पैसे’ का लालच देना सूचना की विश्वसनीयता को खत्म कर देगा। आने वाले समय में आम जनता के लिए असली पत्रकारिता और प्रायोजित (पेड) पीआर के बीच अंतर करना नामुमकिन हो जाएगा, जिससे समाज में केवल एकतरफा ‘भ्रमजाल’ ही फैलेगा।”
बिहार इस समय एक डिजिटल चौराहे पर खड़ा है। सूचना तकनीक का उपयोग जनहित में होना चाहिए, इसमें कोई दो राय नहीं है। सरकार की अच्छी योजनाओं की जानकारी जनता तक पहुंचनी ही चाहिए, और इसके लिए आधुनिक माध्यमों का उपयोग स्वागत योग्य है। लेकिन जब यह प्रक्रिया एकतरफा हो जाए और सत्ता की आलोचना के हर स्वर को आर्थिक रूप से पंगु बनाने का जरिया बन जाए, तो इसे लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी माना जाना चाहिए। “सरकार की बड़ाई करो और पैसे पाओ” का यह भ्रमजाल भले ही तात्कालिक रूप से चुनावों में या हेडलाइंस में फायदा पहुंचा दे, लेकिन यह बिहार की बुनियादी समस्याओं गरीबी, अशिक्षा और बेरोजगारी का समाधान नहीं कर सकता। कागजी या डिजिटल स्क्रीन की चमक से जमीनी अंधेरा दूर नहीं होता। बिहार की जनता को इस भ्रमजाल को चीरकर वास्तविक मुद्दों पर सवाल पूछते रहना होगा, और सरकार को भी यह समझना होगा कि एक जीवंत लोकतंत्र में स्तुतिगान करने वाले भाटों से ज्यादा अहमियत कमियां बताने वाले आलोचकों की होती है।




