“बिहार कांग्रेस में ‘पोस्ट की बोली’ का आरोप: नेतृत्व की नाकामी से संगठन ध्वस्त”

“बदहाली की ओर बिहार कांग्रेस: अनुभवहीन नेतृत्व और मनमानी का खेल बेनकाब”-रितेश सिन्हा

बिहार कांग्रेस आज बस कमजोर नहीं बा—विश्वसनीयता के ऐसे संकट में फंस गई है कि अपने ही लोग पूछ रहे हैं, “आखिर पार्टी चल कैसे रही है?” कभी गांव-गांव में पकड़ रखने वाली कांग्रेस आज अपने ही कार्यकर्ताओं के बीच भरोसा खोती नजर आ रही है। सवाल सीधा है—हार चुनाव में नहीं हो रही, हार तो संगठन के भीतर ही रोज-रोज हो रही है।

राहुल गांधी को भेजा गया पत्र इसी अंदरूनी बेचैनी का खुला बयान है। “संगठन सृजन अभियान” के नाम पर जो कसरत शुरू हुई थी, वही अब शक के घेरे में आ गई है। एआईसीसी के पर्यवेक्षकों की रिपोर्ट किनारे कर देने की बात अगर सच है, तो फिर यह पूरा अभियान कागजी कवायद से ज्यादा क्या रह जाता है? ऊपर से लोकतंत्र, भीतर से बंद कमरों का फैसला—यही तस्वीर उभर कर सामने आ रही है। प्रदेश नेतृत्व से उम्मीद रहती है कि सबको साथ लेकर चलेगा, लेकिन जब आरोप यही लगने लगे कि फैसले योग्यता से नहीं, “कौन किसके करीब है” से तय हो रहे हैं, तो फिर संगठन का हाल क्या होगा—यह समझना मुश्किल नहीं है। और यह कोई पहली बार नहीं हो रहा। टिकट बंटवारे के समय भी इसी तरह की बातें उठी थीं। तब कहा गया—“थोड़ा बहुत असंतोष हर पार्टी में होता है।” लेकिन आज वही “थोड़ा बहुत” असंतोष बाढ़ बन चुका है। अब सवाल एक-दो फैसलों का नहीं, पूरे ढांचे का है।

जिला अध्यक्ष जैसे पदों पर ऐसे लोगों को बैठा देना, जिनका अपने जिले से ही जुड़ाव कमजोर हो, यह तो सीधा-सीधा कार्यकर्ताओं के साथ अन्याय है। जो लोग सालों से झंडा ढो रहे हैं, वही किनारे—और जो ऊपर तक पहुंच बना लिए, वही आगे। ऐसे में नीचे का कार्यकर्ता बोले भी तो किससे? अब इसी माहौल में आया है—“सृजन साथी” अभियान। 50 रुपये में सदस्यता, पांच साल तक वैधता—सुनने में बड़ा सीधा-सादा फॉर्मूला लगता है। लेकिन बिहार की राजनीति में लोग इतना भी भोले नहीं हैं। सवाल उठना शुरू हो गया है—“ई 50 रुपया वाला खेल आखिर है क्या?” कहने को यह जनसंपर्क का तरीका है, लेकिन जमीन पर चर्चा कुछ और ही है। लोग पूछ रहे हैं—छोटा-छोटा पैसा जोड़कर बड़ा हिसाब बनेगा तो उसका हिसाब-किताब कौन देगा? पारदर्शिता कहां दिखेगी? और सबसे अहम—क्या यह सच में विचारधारा से जोड़ने का अभियान है, या फिर संगठन के नाम पर संसाधन जुटाने का नया रास्ता?


50 रुपये भले कम लगे, लेकिन जब लाखों लोग जुड़ेंगे तो रकम छोटी नहीं रहेगी। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है। और जब पहले से ही संगठन पर पारदर्शिता के सवाल खड़े हों, तब तो हर नया अभियान और ज्यादा जांच के दायरे में आता है। कांग्रेस के भीतर पहले भी सदस्यता और धन-संग्रह को लेकर चर्चा होती रही है। कार्यकर्ता अक्सर कहते हैं कि ऊपर क्या हो रहा है, इसकी साफ जानकारी नीचे तक नहीं पहुंचती। यही वजह है कि भरोसा धीरे-धीरे खिसकता जाता है। महिला कांग्रेस के स्तर पर भी सदस्यता को लेकर विवाद सामने आ चुका है। वहां भी कई लोगों ने दबाव और अस्पष्टता की बात कही थी। कुछ ने तो विरोध में पद तक छोड़ दिया। यह बताने के लिए काफी है कि समस्या नई नहीं, बल्कि पुरानी बीमारी है—बस हर बार नया रूप ले लेती है। बिहार में “सृजन साथी” ऐसे समय में आया है, जब संगठन पहले से ही हिल चुका है। ऐसे में यह अभियान मौका कम, परीक्षा ज्यादा बन गया है—नेतृत्व की नीयत और नीति, दोनों की। इसी बीच, पार्टी के भीतर से उठ रही आवाजें आग में घी का काम कर रही हैं। अखिल भारतीय किसान कांग्रेस के पूर्व राष्ट्रीय सचिव राजकुमार शर्मा का कहना है कि “यह स्थिति कांग्रेस के मूल विचारों के विपरीत है। जमीनी कार्यकर्ताओं की अनदेखी कर संगठन को कमजोर किया जा रहा है।” पीसीसी बिहार के पूर्व प्रदेश सचिव मो. दिलशाद खान ने इसे “संगठन के साथ अन्याय” बताते हुए कहा कि “अगर समर्पित कार्यकर्ताओं को लगातार नजरअंदाज किया जाएगा, तो पार्टी का ढांचा टिक नहीं पाएगा।”

पिछड़ा विभाग के प्रदेश उपाध्यक्ष सूरज यादव ने कहा कि “फैसले अब पारदर्शी नहीं रह गए हैं। योग्यता के बजाय प्रभाव का बोलबाला है, जो संगठन के लिए घातक है।” छपरा के अश्वनी कुमार सिंह, मुजफ्फरपुर के प्रवीण कुमार दास और नालंदा के अखिलेश्वर प्रसाद कुशवाहा ने संयुक्त रूप से कहा कि “संगठन सृजन अभियान का उद्देश्य जमीनी मजबूती था, लेकिन इसे कुछ लोगों ने अपने हितों तक सीमित कर दिया।” महिला कांग्रेस की पूर्व प्रदेश उपाध्यक्ष बच्ची पांडे ने कहा कि “महिलाओं और समर्पित कार्यकर्ताओं की अनदेखी संगठन को अंदर से कमजोर कर रही है।” वहीं, शिव शंकर गुप्ता ने चेतावनी दी कि “अगर समय रहते सुधार नहीं हुआ, तो संगठन केवल नाम मात्र का रह जाएगा।”

इन आवाजों को अब “नाराजगी” कहकर टालना आसान नहीं है। ई सब वही लोग हैं, जिनके कंधे पर पार्टी खड़ी रही। जब वही लोग बोलने लगें, तो समझ लीजिए मामला गंभीर है। सबसे बड़ा सवाल अब भी वही है—“का ई सब खाली बिहार में हो रहा है, या पूरा ढांचा ही ऐसा हो गया है?” जब फैसले कुछ लोगों तक सिमट जाएं, जब नीचे की आवाज ऊपर पहुंचे ही नहीं, और जब जवाबदेही नाम की चीज गायब हो जाए तो फिर संगठन कागज पर ही बचता है, जमीन पर नहीं।

बिहार कांग्रेस आज चौराहे पर खड़ी है। एक रास्ता है-साफ-साफ गलती मानकर सुधार करने का। दूसरा रास्ता है—सब कुछ ऐसे ही चलने देने का। “पोस्ट की बोली” के आरोप, नियुक्तियों पर उठते सवाल और अब “50 रुपये वाला फॉर्मूला”—तीनों मिलकर एक ही बात कह रहे हैं कि बीमारी ऊपर से नीचे तक फैली है।

अगर अब भी नेतृत्व नहीं जागा, तो “सृजन” का यह नारा कहीं “विनाश” की कहानी न बन जाए। और तब 50 रुपये की सदस्यता कोई साधारण फीस नहीं रहेगी—लोग कहेंगे, “ई पैसा नहीं, भरोसा वसूला जा रहा था… और वही सबसे पहले खत्म हो गया।”

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