इंटरनेट बंद, सुरक्षा बलों के खिलाफ उबाल,आखिर कब जागेगी सरकार— रितेश सिन्हा

पूर्वोत्तर का कभी शांत और संतुलित माना जाने वाला राज्य मणिपुर आज भय, हिंसा और प्रशासनिक विफलता की एक भयावह प्रयोगशाला बन चुका है। सवाल सीधा है—क्या राज्य अब अपने ही नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने में असमर्थ हो गया है? अगर नहीं, तो फिर महीनों से जलते घर, खाली होते गांव, बंद बाजार और खामोश सड़कों का जिम्मेदार कौन है? यह केवल कानून-व्यवस्था का संकट नहीं, बल्कि शासन की साख पर लगा गहरा धब्बा है।
हालात इतने बेकाबू हो चुके हैं कि सरकार को इंटरनेट बंद करने जैसे कठोर कदम उठाने पड़े हैं। तर्क दिया जा रहा है कि अफवाहों को रोकना जरूरी है, लेकिन सच्चाई यह है कि इंटरनेट बंद करना अक्सर सरकारों की असफलता को ढकने का सबसे आसान हथियार बन चुका है। जब संवाद बंद होता है तो अविश्वास और तेजी से बढ़ता है। मणिपुर में यही हो रहा है—लोग न सिर्फ हिंसा से जूझ रहे हैं, बल्कि सूचना के अंधेरे में भी धकेल दिए गए हैं। यह “डबल लॉकडाउन” है—एक डर का, दूसरा सूचना का।
सुरक्षा बलों के खिलाफ बढ़ता आक्रोश इस बात का संकेत है कि स्थिति केवल नियंत्रण से बाहर ही नहीं, बल्कि जनता के भरोसे से भी बाहर जा चुकी है। जिन बलों को सुरक्षा का प्रतीक होना चाहिए, उनके प्रति ही गुस्सा फूट रहा है। यह किसी भी लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत है। कई इलाकों में स्थानीय लोगों और सुरक्षाबलों के बीच टकराव की घटनाएं इस बात को और पुष्ट करती हैं कि जमीनी हकीकत सरकारी दावों से बिल्कुल अलग है।

कांग्रेस सांसद प्रोफेसर बिमोल अकोजैम का “प्रशासन का पूर्ण पतन” वाला बयान केवल राजनीतिक आरोप नहीं, बल्कि उस सच्चाई की गूंज है जिसे मणिपुर का हर पीड़ित नागरिक महसूस कर रहा है। जब राज्य अपने नागरिकों को सुरक्षा नहीं दे पाता, तो यह केवल नाकामी नहीं, बल्कि जिम्मेदारी से पलायन है। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने केंद्र और राज्य सरकार दोनों को कठघरे में खड़ा किया है।
उनका आरोप है कि शुरुआती चेतावनियों को नजरअंदाज किया गया, हालात को हल्के में लिया गया और जब तक सरकार जागी, तब तक बहुत देर हो चुकी थी। सवाल यह भी है कि क्या राजनीतिक प्राथमिकताएं, मानवीय संवेदनाओं पर भारी पड़ गईं? राहुल गांधी ने भी इस मुद्दे पर स्पष्ट कहा है कि मणिपुर में जो हो रहा है, वह केवल एक राज्य का संकट नहीं, बल्कि देश की एकता और सामाजिक ताने-बाने के लिए खतरा है।
उनका यह बयान कि “इंटरनेट बंद करना समस्या का समाधान नहीं, बल्कि आवाज को दबाना है”—सीधे तौर पर सरकार की नीति पर सवाल खड़ा करता है। उन्होंने सरकार से संवाद और विश्वास बहाली की दिशा में ठोस पहल करने की अपील की है, लेकिन सवाल यह है—क्या सरकार सुनने के लिए तैयार है?

सरकार अपनी तरफ से हर संभव प्रयास का दावा कर रही है—अतिरिक्त सुरक्षाबलों की तैनाती, संवेदनशील क्षेत्रों में निगरानी, शांति समितियों का गठन। लेकिन अगर ये प्रयास प्रभावी होते, तो हालात इतने भयावह क्यों बने रहते? “स्थिति नियंत्रण में है” जैसे बयान अब लोगों के जख्मों पर नमक छिड़कने जैसे लगते हैं।
सरकारी सूत्र बाहरी तत्वों और असामाजिक शक्तियों की बात करते हैं, लेकिन यह तर्क भी अब कमजोर पड़ता दिख रहा है। क्योंकि अगर बाहरी ताकतें इतनी आसानी से राज्य को अस्थिर कर सकती हैं, तो यह सुरक्षा और खुफिया तंत्र की भी गंभीर विफलता है।
सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि इस राजनीतिक और प्रशासनिक खींचतान के बीच आम नागरिक पिस रहा है। जिनके घर जला दिए गए, जिनके अपने बिछड़ गए, जिनकी रोजी-रोटी खत्म हो गई—उनके लिए यह बहस नहीं, बल्कि जिंदगी और मौत का सवाल है। बच्चे स्कूल से दूर हैं, मरीज इलाज के लिए भटक रहे हैं, छोटे व्यापारी कर्ज में डूब रहे हैं। और इस सबके बीच, सरकार “स्थिति सामान्य होने” का इंतजार कर रही है।
सच्चाई यह है कि मणिपुर में केवल सुरक्षा बलों की संख्या बढ़ाने से शांति नहीं आएगी। यह समस्या गहरी सामाजिक और राजनीतिक जड़ों से जुड़ी है। इसे हल करने के लिए ईमानदार संवाद, पारदर्शी जांच और त्वरित न्याय की जरूरत है। जब तक दोषियों को सजा नहीं मिलेगी और पीड़ितों को न्याय नहीं मिलेगा, तब तक शांति केवल एक सरकारी बयान बनकर रह जाएगी। विपक्ष को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। केवल आरोप लगाना आसान है, लेकिन समाधान का हिस्सा बनना कठिन। अगर राजनीति केवल बयानबाजी तक सीमित रही, तो मणिपुर का दर्द और गहरा होगा।
मणिपुर आज एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। यहां लिया गया हर फैसला यह तय करेगा कि राज्य शांति की ओर बढ़ेगा या अराजकता के दलदल में और धंसता जाएगा। सरकार को यह समझना होगा कि सुरक्षा केवल बंदूक से नहीं, भरोसे से आती है। और भरोसा तब बनता है, जब नागरिक खुद को सुरक्षित, सुना हुआ और सम्मानित महसूस करता है।
अगर मणिपुर में आज भी लोग अपने ही घरों में कैदी बनकर जी रहे हैं, तो यह केवल एक राज्य की विफलता नहीं—यह पूरे तंत्र की असफलता है। अब भी समय है या तो सरकार कठोर और संवेदनशील दोनों बनकर निर्णायक कदम उठाए, या फिर इतिहास इस चुप्पी और देरी को कभी माफ नहीं करेगा।