₹1512 करोड़ के शिलान्यास और 25 लाख घरों का लक्ष्य,2026 तक 15 हजार घरों का आंकड़ा भी पार नहीं कर सका विभाग, 25 लाख घरों के दावे पर भरोसा क्यों करे बिहार? , रितेश सिन्हा

बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने प्रधानमंत्री सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना के तहत 2.5 लाख कुटीर ज्योति उपभोक्ताओं के घरों में सौर संयंत्र लगाने के लिए ₹1512 करोड़ की परियोजना का शिलान्यास किया है। इसके साथ ही ₹1278 करोड़ की अन्य ऊर्जा परियोजनाओं का उद्घाटन, लोकार्पण और शिलान्यास भी किया गया। कुल मिलाकर लगभग ₹2790 करोड़ की योजनाओं के सहारे नवंबर 2027 तक 25 लाख घरों को सौर ऊर्जा से जोड़ने का लक्ष्य रखा गया है। सरकार इसे बिहार को ऊर्जा आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में बड़ा कदम बता रही है। घोषणा सुनने में प्रभावशाली है, लेकिन बिहार की जनता अब केवल घोषणाओं से प्रभावित नहीं होती। वह पूछती है कि जिन योजनाओं के परिणाम अभी तक सीमित रहे हैं, उनके लिए अचानक इतने बड़े लक्ष्य किस आधार पर तय किए जा रहे हैं। आखिर जिस ऊर्जा विभाग ने वर्षों में सौर ऊर्जा विस्तार की उल्लेखनीय कहानी नहीं लिखी, वह अगले डेढ़ वर्ष में 25 लाख घरों तक पहुंचने का दावा कैसे कर रहा है?

ऊर्जा विभाग की सबसे बड़ी समस्या हमेशा से यही रही है कि उसके लक्ष्य बड़े होते हैं और उपलब्धियां अपेक्षाकृत छोटी। विभाग के अधिकारी और मंत्री मंचों पर ऊर्जा क्रांति की बात करते हैं, लेकिन आंकड़े अक्सर उस दावे का साथ नहीं देते। यही कारण है कि सम्राट चौधरी की नई घोषणा से अधिक चर्चा ऊर्जा विभाग के पुराने रिकॉर्ड की हो रही है। बिहार में बिजली पहुंच के क्षेत्र में निश्चित रूप से प्रगति हुई है। गांवों का विद्युतीकरण हुआ, उपभोक्ताओं की संख्या बढ़ी और आपूर्ति व्यवस्था पहले की तुलना में बेहतर हुई। लेकिन ऊर्जा आत्मनिर्भरता का दावा आज भी अधूरा है। राज्य अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा दूसरे राज्यों और केंद्रीय उत्पादन इकाइयों से खरीदता है। 2026-27 में बिहार की अनुमानित पीक डिमांड 9602 मेगावाट तक पहुंचने की संभावना है और इसके लिए 10,440 मेगावाट से अधिक उपलब्धता सुनिश्चित करने की तैयारी की जा रही है। यह स्थिति बताती है कि बिहार अभी भी अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बाहरी स्रोतों पर निर्भर है।
यदि ऊर्जा आत्मनिर्भरता वास्तव में प्राथमिकता होती तो सौर ऊर्जा के क्षेत्र में बिहार की स्थिति कहीं अधिक मजबूत दिखाई देती। लेकिन वास्तविकता इसके उलट है। जनवरी 2026 तक प्रधानमंत्री सूर्य घर योजना के तहत बिहार में केवल 55,543 आवेदन आए थे। इनमें से मात्र 14,500 प्रतिष्ठापन हो सके थे और लाभान्वित परिवारों की संख्या लगभग 15,148 तक पहुंची थी। कुल स्थापित क्षमता केवल 51.33 मेगावाट थी। जिस योजना को आज ऊर्जा विभाग अपनी बड़ी उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत कर रहा है, वह 2 वर्षों में 15 हजार घरों तक भी प्रभावी ढंग से नहीं पहुंच सकी। ऐसे में यह पूछना स्वाभाविक है कि अगले डेढ़ वर्ष में 25 लाख घरों तक पहुंचने की योजना का आधार क्या है।
दिलचस्प बात यह है कि जनवरी 2026 में बिहार की बिजली वितरण कंपनियों को केवल 275 मेगावाट रूफटॉप सौर परियोजना के लिए निविदा जारी करनी पड़ी थी। दूसरी ओर अब सरकार 25 लाख घरों की बात कर रही है। यदि प्रति घर औसतन 2 किलोवाट क्षमता भी मानी जाए तो यह लक्ष्य लगभग 5000 मेगावाट क्षमता की मांग करता है। अर्थात जिस विभाग की उपलब्धि 51.33 मेगावाट थी, उसे अगले कुछ महीनों में हजारों मेगावाट क्षमता के बराबर विस्तार करना होगा। यह केवल महत्वाकांक्षी नहीं बल्कि अत्यंत कठिन लक्ष्य है। वर्तमान उपलब्धि की तुलना में लगभग 170 गुना विस्तार की आवश्यकता होगी। इसका मतलब है कि विभाग को हर महीने एक लाख से अधिक घरों में सौर संयंत्र लगाने होंगे।प्रतिदिन हजारों प्रतिष्ठापन करने होंगे। सवाल यह है कि क्या विभाग के पास इतना बड़ा तकनीकी, प्रशासनिक और वित्तीय ढांचा मौजूद है?
राष्ट्रीय स्तर के आंकड़े भी बिहार के दावे को कटघरे में खड़ा करते हैं। मार्च 2026 तक पूरे देश में प्रधानमंत्री सूर्य घर योजना के तहत लगभग 26 लाख से अधिक रूफटॉप सौर प्रतिष्ठापन हो चुके थे। गुजरात में 5.24 लाख से अधिक, महाराष्ट्र में 4.03 लाख और उत्तर प्रदेश में 3.35 लाख प्रतिष्ठापन दर्ज किए गए थे। वहीं बिहार मात्र 14,500 प्रतिष्ठापन पर खड़ा था। जिस उपलब्धि तक पहुंचने में पूरे देश को दो वर्ष लगे, बिहार लगभग उतने ही पैमाने का लक्ष्य अकेले हासिल करने का दावा कर रहा है। महत्वाकांक्षा अच्छी बात है, लेकिन महत्वाकांक्षा और वास्तविकता के बीच का अंतर भी देखा जाना चाहिए।
ऊर्जा विभाग की दूसरी बड़ी कमजोरी उसकी वितरण व्यवस्था है। उत्तर बिहार और दक्षिण बिहार बिजली वितरण कंपनियां वर्षों से तकनीकी एवं वाणिज्यिक हानियों, बिजली चोरी, बिलिंग विवादों और राजस्व संग्रह की समस्याओं से जूझती रही हैं। उपभोक्ता शिकायतों से लेकर ट्रांसफॉर्मर बदलने तक के मामलों में लोगों को आज भी परेशानी का सामना करना पड़ता है। रूफटॉप सोलर का विस्तार केवल पैनल लगाने का मामला नहीं है। इसके लिए मजबूत नेट मीटरिंग व्यवस्था, आधुनिक ग्रिड, प्रशिक्षित तकनीकी कर्मी, तेज निरीक्षण प्रणाली और प्रभावी रखरखाव तंत्र की आवश्यकता होती है। यदि विभाग मौजूदा उपभोक्ता सेवाओं को पूरी तरह व्यवस्थित नहीं कर पाया है, तो लाखों नए सौर उपभोक्ताओं का प्रबंधन कैसे करेगा?
सबसे बड़ा प्रश्न जवाबदेही का है। ऊर्जा विभाग नई घोषणाएं तो करता है, लेकिन पुरानी घोषणाओं का सार्वजनिक मूल्यांकन शायद ही कभी करता है। पिछले दस वर्षों में कितने सौर लक्ष्य पूरे हुए? कितनी परियोजनाएं समय पर पूरी हुईं? कितने निवेश प्रस्ताव धरातल पर उतरे? कितने जिलों में घोषित लक्ष्य हासिल हुए? इन सवालों के स्पष्ट उत्तर शायद ही कभी सामने आते हैं। कुटीर ज्योति परिवारों को लेकर भी अनेक व्यावहारिक चुनौतियां हैं। जिन 2.5 लाख परिवारों को योजना के पहले चरण में शामिल किया जा रहा है, उनमें बड़ी संख्या आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों की है। ग्रामीण क्षेत्रों में रखरखाव, तकनीकी सहायता और जागरूकता की व्यवस्था मजबूत किए बिना योजना की सफलता सुनिश्चित नहीं की जा सकती।
सम्राट चौधरी ने निश्चित रूप से एक बड़ा राजनीतिक दांव खेला है। यदि नवंबर 2027 तक लाखों घरों में वास्तव में सौर संयंत्र लग जाते हैं और लोगों के बिजली बिलों में उल्लेखनीय कमी आती है, तो यह बिहार की ऊर्जा व्यवस्था में ऐतिहासिक परिवर्तन माना जाएगा। लेकिन यदि 2026 के आंकड़ों और 2027 के लक्ष्यों के बीच मौजूद विशाल अंतर को पाटा नहीं जा सका, तो यही घोषणा सरकार के लिए सबसे बड़ा राजनीतिक बोझ बन सकती है। जनता शिलान्यास नहीं, परिणाम देखती है। जनता यह नहीं गिनती कि कितने करोड़ रुपये की योजनाओं की घोषणा हुई, बल्कि यह देखती है कि कितने घरों की छतों पर पैनल लगे, कितने परिवारों को वास्तविक लाभ मिला और कितनी बिजली बिहार ने स्वयं पैदा की।
सवाल ₹1512 करोड़ का नहीं है, सवाल यह है कि 2026 तक 14,500 प्रतिष्ठापनों और 51.33 मेगावाट क्षमता तक सीमित रही योजना 2027 तक 25 लाख घरों तक कैसे पहुंचेगी। जब तक ऊर्जा विभाग इसका ठोस और विश्वसनीय जवाब नहीं देता, तब तक सौर क्रांति का यह दावा संदेह के घेरे से बाहर नहीं निकल पाएगा।

