रितेश सिन्हा

मोदी सरकार में मंत्रालयों के चेहरे बदलते हैं, मंत्रियों के विभाग बदलते हैं, लेकिन सत्ता के शीर्ष गलियारों में कुछ अफसरों की उपयोगिता खत्म होती दिखाई नहीं देती। कोई सेवानिवृत्ति की दहलीज पर है तो सेवा-विस्तार मिल जाता है, कोई रिटायर होता है तो सलाहकार बनकर वापस आ जाता है और किसी महत्वपूर्ण पद पर सरकार पुराने तथा आजमाए हुए चेहरे को ही बनाए रखना बेहतर समझती है। ताजा उदाहरण कैबिनेट सचिव डॉ. टी.वी. सोमनाथन और गृह सचिव गोविंद मोहन हैं। दोनों की सेवा अवधि 1-1 वर्ष बढ़ा दी गई है। सवाल दोनों अधिकारियों की योग्यता का नहीं है। सवाल उस सरकारी व्यवस्था का है जो बार-बार यह संकेत दे रही है कि शीर्ष पदों पर बदलाव की तुलना में उसे अपने भरोसेमंद अधिकारियों की निरंतरता ज्यादा पसंद है। आखिर भारत में जहां भारतीय प्रशासनिक सेवा में हजारों अधिकारी काम कर रहे हैं, सरकार को बार-बार एक्सटेंशन की जरूरत क्यों पड़ रही है? क्या मोदी सरकार के पास विश्वस्त अधिकारियों का अकाल है?या फिर दिल्ली की नौकरशाही में एक ऐसा ‘विश्वास का घेरा’ बन चुका है, जिसके बाहर खड़े अधिकारियों के लिए शीर्ष पदों तक पहुंचना लगातार कठिन होता जा रहा है?
यह कहानी सोमनाथन और गोविंद मोहन से शुरू नहीं होती। प्रधानमंत्री कार्यालय से लेकर कैबिनेट सचिवालय, गृह मंत्रालय, राष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था, खुफिया एजेंसियों और जांच एजेंसियों तक पिछले एक दशक में सेवा-विस्तार, पुनर्नियुक्ति और सेवानिवृत्ति के बाद महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां देने के अनेक उदाहरण सामने आए हैं।प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव डॉ. पी.के. मिश्रा लंबे समय से प्रधानमंत्री कार्यालय के सबसे प्रभावशाली प्रशासनिक चेहरों में हैं। उनसे पहले नृपेंद्र मिश्र को प्रधानमंत्री का प्रधान सचिव नियुक्त करने के रास्ते में कानूनी बाधा आई तो 2014 में सरकार ने ट्राई अधिनियम में बदलाव का रास्ता अपनाया। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल तीसरे कार्यकाल में हैं। पूर्व कैबिनेट सचिव राजीव गौबा को कार्यकाल विस्तार मिला। पूर्व गृह सचिव अजय कुमार भल्ला को भी बार-बार विस्तार देकर पद पर बनाए रखा गया। खुफिया तंत्र में अरविंद कुमार को आईबी निदेशक के रूप में विस्तार मिला। सामंत कुमार गोयल का रॉ प्रमुख के रूप में कार्यकाल बढ़ाया गया। संजय कुमार मिश्रा को प्रवर्तन निदेशालय के निदेशक पद पर दिए गए लगातार विस्तार इतने विवादित हुए कि मामला सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंच गया। सेवानिवृत्ति के बाद वरिष्ठ अधिकारियों की वापसी भी दिखाई देती है। पूर्व कैबिनेट सचिव प्रदीप कुमार सिन्हा को प्रधानमंत्री का सलाहकार बनाया गया। अमित खरे और तरुण कपूर जैसे सेवानिवृत्त सचिवों को प्रधानमंत्री कार्यालय में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां मिलीं। भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर शक्तिकांत दास को भी सेवानिवृत्ति के बाद प्रधानमंत्री कार्यालय में प्रमुख सचिव-2 जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी गई।
किसी को औपचारिक सेवा-विस्तार मिला, किसी को पुनर्नियुक्ति और किसी को सेवानिवृत्ति के बाद अलग पद पर नियुक्त किया गया। हजारों अफसर, फिर भी चंद चेहरे ‘अपरिहार्य’ क्यों? भारत में आईएएस के 6800 स्वीकृत पद हैं और 5000 से ज्यादा अधिकारी सेवा में हैं। इनके अलावा आईपीएस, भारतीय विदेश सेवा, भारतीय राजस्व सेवा तथा अन्य केंद्रीय सेवाओं में हजारों अनुभवी अधिकारी मौजूद हैं। यूपीएससी पास करके आने वाला अधिकारी 2-4 वर्ष में सचिव नहीं बनता। वह लगभग 3 दशक तक जिला, राज्य और केंद्र की विभिन्न जिम्मेदारियां निभाने के बाद भारत सरकार के सचिव स्तर तक पहुंचता है। शीर्ष पद खाली होता है तो नीचे से अधिकारी ऊपर बढ़ते हैं। कैबिनेट सचिव का पद बदलता है तो सचिव स्तर पर नई संभावनाएं बनती हैं। सचिव आगे बढ़ता है तो अतिरिक्त सचिव के लिए स्थान बनता है। अतिरिक्त सचिव ऊपर जाता है तो संयुक्त सचिव स्तर पर अवसर खुलते हैं। सरकार को सक्षम और विश्वसनीय अधिकारियों की आवश्यकता होती है, लेकिन नौकरशाही का मूल चरित्र किसी राजनीतिक सरकार के प्रति व्यक्तिगत निष्ठा नहीं बल्कि संविधान, कानून और संस्थागत प्रक्रिया के प्रति जवाबदेही है। यदि किसी व्यवस्था में शीर्ष पदों के लिए यह धारणा बनने लगे कि वरिष्ठता, अनुभव और प्रदर्शन के साथ सत्ता का विशेष भरोसा भी जरूरी है, तो इसका असर नौकरशाही के मनोविज्ञान पर पड़ता है। सवाल सरकार की उस व्यवस्था पर है जिसमें कुछ चेहरे इतने महत्वपूर्ण हो जाते हैं कि उनके जाने से प्रशासनिक निरंतरता प्रभावित होने का तर्क दिया जाने लगता है। अनुभव आवश्यक है, लेकिन अनुभव के नाम पर अवसर का दरवाजा स्थायी रूप से बंद नहीं किया जा सकता।
यदि हर बार सरकार को पुराने चेहरे ही अधिक सुरक्षित विकल्प लगते हैं, तो सवाल सरकार से पूछा जाएगा-12 साल से अधिक समय सत्ता में रहने के बाद भी आपने दूसरी पंक्ति तैयार क्यों नहीं की? मजबूत सरकार की असली पहचान यह है कि एक अधिकारी जाए तो अगला उतनी ही क्षमता से उसकी कुर्सी संभालने के लिए तैयार हो। यदि ऐसा नहीं है, तो समस्या अफसरों की कमी की नहीं—व्यवस्था के भरोसे और नेतृत्व निर्माण की है। सेवा-विस्तार सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक अपवादात्मक व्यवस्था है। केंद्र सरकार के कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति और सेवा संबंधी मूल प्रावधान फंडामेंटल रूल (एफआर)-56 तथा संबंधित सेवा नियमों में निहित हैं। सामान्यतः अखिल भारतीय सेवाओं और केंद्र सरकार के अधिकारी 60 वर्ष की आयु में सेवानिवृत्त होते हैं। जनहित में केंद्र सरकार विशेष परिस्थितियों में सीमित अवधि के लिए सेवा-विस्तार या संविदा के आधार पर पुनर्नियुक्ति का निर्णय ले सकती है। कैबिनेट सचिव के मामले में केंद्र सरकार को विशेष प्रशासनिक अधिकार प्राप्त हैं और आवश्यकता पड़ने पर उनके कार्यकाल में विस्तार दिया जा सकता है। इसका उपयोग केवल अत्यंत असाधारण परिस्थितियों में ही होना चाहिए।
2021 में केंद्र सरकार ने दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम तथा केंद्रीय सतर्कता आयोग अधिनियम में संशोधन कर सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के निदेशकों का कार्यकाल 2 वर्ष से बढ़ाकर हर वर्ष समीक्षा के आधार पर अधिकतम 5 वर्ष तक बढ़ाने का प्रावधान किया। प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव, प्रधानमंत्री के सलाहकार, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और कुछ अन्य शीर्ष पदों पर सेवानिवृत्ति के बाद संविदा अथवा पुनर्नियुक्ति का प्रावधान भी मौजूद है। कानून इसकी अनुमति देता है, लेकिन यदि यही व्यवस्था बार-बार अपनाई जाए तो यह नई पीढ़ी के अधिकारियों के लिए अवसरों को सीमित करती है।
इस पूरी व्यवस्था का सबसे बड़ा राजनीतिक लाभ मोदी सरकार को मिलता है। शीर्ष पदों पर बार-बार उन्हीं अधिकारियों को बनाए रखने से सरकार के पास ऐसी प्रशासनिक टीम बनी रहती है, जो उसकी कार्यशैली, प्राथमिकताओं और निर्णय प्रक्रिया से पूरी तरह परिचित होती है। इससे सत्ता के शीर्ष स्तर पर प्रशासनिक नियंत्रण भी मजबूत बना रहता है। सरकार योग्यता से अधिक अपनी पसंद और भरोसे को महत्व दे रही है। यही कारण है कि विपक्ष और कई पूर्व नौकरशाह इसे “एक्सटेंशन कल्चर” नहीं, बल्कि “चयनित अफसरशाही के संस्थानीकरण” के रूप में देखते हैं।




