रितेश सिन्हा
बिहार में गरीबों के लिए पक्के मकान का वादा एक बार फिर बड़े आंकड़ों के साथ सामने है। प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण के तहत वित्तीय वर्ष 2026-27 में 11 लाख 18 हजार 937 पक्के मकान बनाने का लक्ष्य रखा गया है और इसके लिए केंद्र सरकार की ओर से 13,427 करोड़ रुपये की सहायता बताई गई है। लाभुकों को चाबी दी जा रही है, स्वीकृति पत्र बांटे जा रहे हैं और सरकार अपनी उपलब्धियां गिना रही है। लेकिन असली सवाल यह है कि क्या यह लक्ष्य जमीन पर उतरने वाला है या फिर एक और ऐसा सरकारी आंकड़ा है, जिसकी चमक घोषणा के दिन तक ही सीमित रह जाएगी?

सरकार के अनुसार 1986 से 2014 तक इंदिरा आवास योजना के तहत करीब 30 लाख पक्के मकान बनाए गए। यानी 28 वर्षों में औसतन लगभग 1.07 लाख मकान प्रतिवर्ष। इसके बाद 2014 से 2026 तक प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण के तहत करीब 50 लाख मकानों का आवंटन किया गया। यह औसत करीब 4.17 लाख आवंटन प्रतिवर्ष बैठता है। अब 2026-27 में एक ही वर्ष में 11.19 लाख मकानों का लक्ष्य रखा गया है। सवाल है कि आखिर ऐसी कौन-सी प्रशासनिक और निर्माण क्षमता विकसित हो गई कि एक साल का लक्ष्य पुराने वार्षिक औसत से कई गुना अधिक हो गया? यहां आवंटन, स्वीकृति और वास्तविक निर्माण के बीच अंतर समझना जरूरी है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार जुलाई 2026 तक बिहार में करीब 50.13 लाख मकानों का लक्ष्य था। इनमें लगभग 49.10 लाख मकान स्वीकृत हुए, लेकिन करीब 41.89 लाख मकान ही पूरे हुए। यानी स्वीकृत मकानों का एक बड़ा हिस्सा अभी भी निर्माण प्रक्रिया में था। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल है कि जब पुराने स्वीकृत मकानों का पूरा निर्माण अभी बाकी है, तब 11.19 लाख नए मकानों का लक्ष्य किस आधार पर तय किया गया? 11 लाख से अधिक मकान बनाना केवल घोषणा का विषय नहीं है। 11,18,937 मकान यदि एक वर्ष में पूरे करने हैं तो औसतन हर महीने करीब 93 हजार, हर सप्ताह करीब 21 हजार और हर दिन लगभग 3,065 मकान पूरे करने होंगे। क्या बिहार के पंचायत, प्रखंड और जिला स्तर का प्रशासन इस गति से काम करने के लिए तैयार है? क्या पर्याप्त अभियंता, तकनीकी कर्मचारी, निर्माण सामग्री, श्रमिक और भुगतान व्यवस्था उपलब्ध है? यदि सरकार का जवाब हां है तो उसे केवल मंच से दावा करने के बजाय जिला और प्रखंडवार कार्ययोजना सार्वजनिक करनी चाहिए।

13,427 करोड़ रुपये की केंद्रीय सहायता का आंकड़ा भी सवालों से मुक्त नहीं है। 11.19 लाख मकानों से इसे जोड़ने पर लगभग 1.20 लाख रुपये प्रति मकान बैठते हैं। सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि केंद्र की सहायता के अलावा राज्य सरकार कितनी राशि देगी और लाभुक को कुल कितनी आर्थिक सहायता मिलेगी। आज ईंट, सीमेंट, सरिया, बालू, मजदूरी और परिवहन की कीमतों को देखते हुए यह भी सवाल है कि निर्धारित सहायता में मकान पूरा करने में लाभुक को अपनी जेब से कितना पैसा लगाना पड़ता है। बिहार में बाढ़ प्रभावित क्षेत्र इस चुनौती को और गंभीर बनाते हैं। कई इलाकों में सामान्य मकान की तुलना में ऊंची नींव और अतिरिक्त निर्माण लागत जरूरी होती है। दूसरी ओर भूमिहीन गरीब परिवारों के लिए केवल आवास की स्वीकृति पर्याप्त नहीं है। जिसके पास मकान बनाने के लिए जमीन ही नहीं है, उसके लिए सरकारी आवास योजना का लाभ आखिर कैसे जमीन पर उतरेगा? सरकार को 11.19 लाख लक्षित परिवारों में यह भी बताना चाहिए कि कितने परिवारों के पास अपनी जमीन है और कितने भूमिहीन हैं। मुख्यमंत्री के अनुसार वर्ष 2018 के सर्वे में 19 लाख परिवार पक्के मकान से वंचित पाए गए थे। यह आंकड़ा बताता है कि बिहार में आवास की जरूरत कितनी बड़ी है, लेकिन यह सवाल भी खड़ा करता है कि 2018 में चिन्हित परिवारों को इतने वर्षों तक आवास से वंचित क्यों रहना पड़ा? क्या सर्वे में खामियां थीं, क्या जमीन की समस्या थी, क्या प्रशासनिक मंजूरी में देरी हुई या भुगतान व्यवस्था बाधित रही? गरीब परिवार के लिए सरकारी सूची में नाम होना उपलब्धि नहीं, उसके सिर पर छत होना उपलब्धि है।
2026-27 में 2 लाख 35 हजार पूर्ण मकानों के गृह प्रवेश का कार्यक्रम हुआ है। यह निश्चित रूप से लाभुकों के लिए महत्वपूर्ण अवसर है। लेकिन दूसरी तरफ पूरे वित्तीय वर्ष में 11.19 लाख नए मकानों का लक्ष्य है। दोनों आंकड़ों के बीच भारी अंतर है। इसका अर्थ साफ है कि सरकार को मौजूदा निर्माण गति में कई गुना वृद्धि करनी होगी। इसलिए अब सरकार के पास लक्ष्य पूरा नहीं होने की स्थिति में लक्ष्य को ही छोटा बताने का रास्ता नहीं होना चाहिए, क्योंकि 11.19 लाख का लक्ष्य सरकार ने स्वयं तय किया है। मुख्यमंत्री ने ‘सहयोग कार्यक्रम’ के तहत 6 लाख 42 हजार आवेदन मिलने और उनमें 96 प्रतिशत आवेदनों के निष्पादन का दावा किया है। इसके तहत 9,500 अधिकारियों को प्रथम नोटिस, 950 को द्वितीय और 350 को तृतीय नोटिस जारी किए जाने की जानकारी भी दी गई। यदि सरकार प्रशासनिक जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए इतनी सख्ती कर सकती है तो यही व्यवस्था प्रधानमंत्री आवास योजना में क्यों नहीं लागू होनी चाहिए? हर पंचायत की प्रगति सार्वजनिक होनी चाहिए और यह साफ होना चाहिए कि किस अधिकारी के क्षेत्र में कितने मकान स्वीकृत हुए, कितने निर्माणाधीन हैं और कितने पूरे हुए। बिहार में 1 करोड़ 81 लाख जीविका दीदियों के स्वयं सहायता समूहों से जुड़ने और 30 लाख से अधिक के लखपति दीदी बनने का दावा भी किया गया है। यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन मकान और आय को अलग-अलग योजनाओं की तरह देखने से समस्या का पूरा समाधान नहीं होगा। गरीब परिवार को पक्का घर देने के साथ स्थायी रोजगार और आय का साधन भी चाहिए। आवास योजना को जीविका, मनरेगा, कौशल विकास और स्थानीय बाजार से जोड़ना होगा, ताकि मकान केवल रहने की जगह नहीं बल्कि आर्थिक सुरक्षा का आधार भी बने।
सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि क्या सरकार गरीबों को घर दे रही है या आंकड़ों की राजनीति कर रही है? चाबी वितरण और गृह प्रवेश की तस्वीरें सरकार की उपलब्धि दिखा सकती हैं, लेकिन योजना की वास्तविक सफलता तब होगी जब लाभुक परिवार उस घर में स्थायी रूप से रह रहा हो। घर के साथ बिजली, पानी, शौचालय, सड़क और रोजगार की व्यवस्था भी होनी चाहिए। वरना केवल चार दीवारें गरीब की जिंदगी नहीं बदल सकतीं। बिहार में 1986 से 2014 के बीच करीब 30 लाख मकान, 2014 से 2026 के बीच करीब 50 लाख मकानों का आवंटन और अब 2026-27 में 11.19 लाख मकानों का लक्ष्य—ये आंकड़े अपने आप में बड़ी कहानी कहते हैं। लेकिन सवाल यह नहीं कि सरकार ने कितने मकानों की घोषणा की। सवाल यह है कि कितने मकान वास्तव में पूरे हुए और कितने परिवारों को उनकी चाबी मिली।
बिहार को अब खोखले वादों और कागजी उपलब्धियों से आगे बढ़ना होगा। सरकार को हर तिमाही लक्ष्य बनाम निर्माण, स्वीकृति बनाम पूर्णता और भुगतान बनाम वास्तविक निर्माण का सार्वजनिक हिसाब देना चाहिए। तभी जनता यह तय कर पाएगी कि 11.19 लाख मकानों का लक्ष्य वास्तविक विकास की शुरुआत है या फिर चुनावी राजनीति में एक और बड़ा आंकड़ा।
गरीब परिवार को सरकारी फाइल में दर्ज मकान नहीं चाहिए। उसे सिर पर पक्की छत चाहिए। इसलिए 2026-27 के अंत में असली सवाल यही होगा—11 लाख मकान बिहार के गांवों में खड़े होंगे या फिर सरकारी प्रेस विज्ञप्तियों में ही?




