“खाली ट्रेन पर टिकट नहीं” जैसी स्थिति भारतीय रेल प्रबंधन की कार्यकुशलता पर एक बहुत बड़ा सवालिया निशान है। रेलवे का बुनियादी मकसद देश के हर नागरिक को सुलभ, सुरक्षित और सस्ती यात्रा प्रदान करना है। आधुनिक स्टेशन और तेज रफ्तार ट्रेनें निश्चित रूप से देश का गौरव हैं, लेकिन यह गौरव तब तक अधूरा है जब तक देश का एक आम नागरिक हाथ में वैध टिकट की उम्मीद लिए प्लेटफॉर्म पर आंसू बहाने को मजबूर है।

भारतीय रेलवे को देश की “लाइफलाइन” कहा जाता है। हर रोज करोड़ों लोग अमीर-गरीब के भेद को भूलकर एक जगह से दूसरी जगह जाने के लिए ट्रेनों का सहारा लेते हैं। लेकिन पिछले कुछ समय से आम यात्रियों को एक बेहद अजीब और दर्दनाक विरोधाभास का सामना करना पड़ रहा है। काउंटर पर या ऑनलाइन बुकिंग पर जाओ तो पता चलता है कि ट्रेन में महीनों तक “नो रूम” या लंबी वेटिंग लिस्ट है। वहीं जब ट्रेन प्लेटफार्म पर आती है, तो उसके कई डिब्बे पूरी तरह खाली दिखाई देते हैं। यह स्थिति आम जनता को मानसिक और आर्थिक रूप से प्रताड़ित कर रही है। ऐसा लगता है कि सिस्टम की इस अव्यवस्था से जनता बेहाल है और सरकार तथा रेल प्रशासन अपनी ही धुन में मस्त हैं। आज के दौर में रेलवे टिकट बुक करना किसी लॉटरी जीतने जैसा हो गया है। आम यात्री महीनों पहले से कंप्यूटर और मोबाइल स्क्रीन पर उंगलियां घिसते हैं, लेकिन परिणाम वही पुराना वेटिंग लिस्ट, आरएसी। जब कोई मजबूर यात्री मजबूरी में भारी-भरकम प्रीमियम या दलालों को एक्स्ट्रा पैसे देकर ट्रेन में चढ़ता है, तो वह हैरान रह जाता है। स्लीपर या थर्ड एसी (3AC) के कई केबिन खाली पड़े होते हैं। सवाल उठता है कि जब सीटें खाली हैं, तो ऑनलाइन सिस्टम उन्हें ‘बुक’ क्यों नहीं दिखाता? क्या यह सॉफ्टवेयर की नाकामी है या फिर इसके पीछे कोई गहरा व्यावसायिक खेल चल रहा है?

वेटिंग लिस्ट के नाम पर रेलवे करोड़ों रुपये का ट्रांजैक्शन संभालती है? टिकट कैंसिल होने पर कटने वाला ‘कैंसिलेशन चार्ज’ रेलवे के लिए कमाई का एक बड़ा जरिया बन चुका है, जिसका खामियाजा सीधे आम आदमी को भुगतना पड़ता है। पहले जहां रेलवे की बदइंतजामी स्टेशनों की चहारदीवारी के भीतर दबकर रह जाती थी, वहीं आज सोशल मीडिया ने आम जनता को एक ऐसा हथियार दे दिया है जिसने रेल प्रशासन के दावों की पोल खोलकर रख दी है। एक्स (ट्विटर), इंस्टाग्राम और फेसबुक जैसे प्लेटफॉर्म्स पर हर रोज ऐसे दर्जनों वीडियो वायरल हो रहे हैं, जो भारतीय रेलवे की जमीनी हकीकत और आम यात्रियों के दर्द को बयां करते हैं। कई वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि ट्रेन के स्लीपर या थर्ड एसी (3AC) के कुछ केबिन पूरी तरह खाली हैं, उन पर कोई यात्री नहीं है। लेकिन वहीं दूसरी तरफ, कन्फर्म टिकट न मिलने के कारण आरक्षित टिकट (Waiting/RAC) वाले यात्री या मजबूर लोग डिब्बे के फर्श पर, टॉयलेट के पास चादर बिछाकर सफर करने को मजबूर हैं। भारी भीड़ के कारण कन्फर्म टिकट वाले यात्री अपनी ही सीट पर नहीं बैठ पा रहे हैं। कई युवाओं ने आईआरसीटीसी (IRCTC) ऐप और वेबसाइट का स्क्रीन रिकॉर्डिंग वीडियो शेयर किया है, जिसमें तत्काल टिकट बुकिंग खुलते ही (सुबह 10 और 11 बजे) महज 30 सेकंड के भीतर उपलब्ध सीटें सीधे ‘रिग्रेट’ (Regret) या ‘नो रूम’ (No Room) में बदल जाती हैं। जनता सीधे सवाल उठा रही है कि जब आम आदमी को टिकट नहीं मिल रहा और ट्रेनें खाली चल रही हैं, तो ये सीटें जा कहां रही हैं?
इस पूरी अव्यवस्था के पीछे रेलवे की कुछ नीतियां और कोटे की व्यवस्था भी जिम्मेदार हैं, जिसने आम नागरिक को हाशिए पर धकेल दिया है। सरकार ने कई ट्रेनों में हवाई जहाज की तर्ज पर ‘डायनेमिक प्राइसिंग’ (Dynamic Pricing) लागू कर दी है। जैसे-जैसे सीटें कम होती हैं, किराया बढ़ता जाता है। कई बार किराया इतना ज्यादा हो जाता है कि आम आदमी उसे खरीद नहीं पाता। नतीजतन, सीटें खाली रह जाती हैं और गरीब यात्री स्टेशन पर बैठकर अपनी किस्मत को कोसता है। ट्रेनों में वीआईपी (VIP), तत्काल, प्रीमियम तत्काल, रेलवे कर्मचारी और विभिन्न प्रकार के कोटे के लिए भारी संख्या में सीटें रिजर्व रखी जाती हैं। चार्ट बनने के आखिरी समय तक ये सीटें ब्लॉक रहती हैं। यदि ये सीटें नहीं भरतीं, तो ट्रेन खाली ही रवाना हो जाती है, जबकि वेटिंग लिस्ट वाले यात्री का टिकट कन्फर्म नहीं होता। पिछले कुछ वर्षों में भारतीय रेलवे का ध्यान आधुनिकरण के नाम पर ‘वंदे भारत’ और ‘अमृत भारत’ जैसी प्रीमियम ट्रेनों और पूरी तरह एसी (AC) कोचों की संख्या बढ़ाने पर रहा है। इस प्रक्रिया में आम आदमी की जेब को सबसे बड़ा झटका लगा है। एक्सप्रेस ट्रेनों से स्लीपर (Sleeper) और जनरल (General) डिब्बों की संख्या को लगातार कम करके उनकी जगह थर्ड एसी (Economic/Normal AC) के डिब्बे लगाए जा रहे हैं। भारत की एक बड़ी आबादी आज भी एसी का किराया वहन नहीं कर सकती। स्लीपर डिब्बे कम होने से उनमें इतनी भीड़ हो जाती है कि लोगों का दम घुटने लगता है। वहीं दूसरी तरफ, महंगे किराए के कारण कुछ एसी डिब्बे खाली दौड़ते रहते हैं। यह नीति पूरी तरह से जनविरोधी प्रतीत होती है। जब जनता इस अव्यवस्था के खिलाफ सोशल मीडिया (X/Twitter) पर वीडियो और तस्वीरें पोस्ट करती है, तो रेल मंत्रालय की तरफ से अक्सर तयशुदा (Automated) जवाब आते हैं।
जमीनी स्तर पर कोई ठोस सुधार देखने को नहीं मिलता। ऐसा लगता है कि सरकार का पूरा ध्यान रेलवे को एक ‘लोक कल्याणकारी सेवा’ के बजाय विशुद्ध रूप से एक ‘कमर्शियल बिजनेस’ (व्यावसायिक संस्था) बनाने पर है। बुलेट ट्रेन और चमचमाते स्टेशनों के विज्ञापनों के बीच आम यात्री की बुनियादी जरूरतें दम तोड़ रही हैं। सीटों के खाली होने और ऑनलाइन कन्फर्म न होने का सीधा फायदा भ्रष्टाचार को बढ़ावा देता है। ट्रेन चलने के बाद खाली सीटों को ऊंचे दामों पर बेचने का खेल आज भी स्टेशनों और ट्रेनों में धड़ल्ले से चल रहा है। रेलवे को इस संकट से उबारने और जनता को राहत देने के लिए सरकार को अपनी ‘मस्ती’ छोड़कर तुरंत निम्नलिखित कदम उठाने होंगे। आईआरसीटीसी (IRCTC) के एल्गोरिदम को पारदर्शी बनाया जाए। जैसे ही कोई सीट खाली हो, वह तुरंत वेटिंग लिस्ट वाले यात्री को ‘ऑटो-अपग्रेड’ या कन्फर्म हो जानी चाहिए। ट्रेन छूटने के आखिरी आधे घंटे पहले तक वेटिंग टिकटों को कन्फर्म करने की प्रक्रिया को आसान बनाया जाए। वीआईपी और अन्य गैर-जरूरी कोटे की सीटों की समीक्षा हो। यदि ट्रेन छूटने से 4 घंटे पहले तक ये सीटें न भरें, तो इन्हें तुरंत आम जनता (General Waiting List) के लिए खोल दिया जाना चाहिए। हर एक्सप्रेस ट्रेन में स्लीपर और जनरल डिब्बों की संख्या को दोबारा बढ़ाया जाए। विकास का मतलब गरीबों को ट्रेन से बेदखल करना नहीं होना चाहिए। डायनेमिक प्राइसिंग की एक अधिकतम सीमा (Upper Cap) तय हो, ताकि यह कभी भी हवाई जहाज के किराए के बराबर या उससे अधिक न हो सके।
“खाली ट्रेन पर टिकट नहीं” जैसी स्थिति भारतीय रेल प्रबंधन की कार्यकुशलता पर एक बहुत बड़ा सवालिया निशान है। रेलवे का बुनियादी मकसद देश के हर नागरिक को सुलभ, सुरक्षित और सस्ती यात्रा प्रदान करना है। आधुनिक स्टेशन और तेज रफ्तार ट्रेनें निश्चित रूप से देश का गौरव हैं, लेकिन यह गौरव तब तक अधूरा है जब तक देश का एक आम नागरिक हाथ में वैध टिकट की उम्मीद लिए प्लेटफॉर्म पर आंसू बहाने को मजबूर है। जनता का सब्र अब जवाब दे रहा है। अगर सरकार वाकई गंभीर है, तो मेरे इस लेख को ‘प्रोपेगैंडा’ या ‘अपवाद’ मानने के बजाय एक गंभीर चेतावनी के रूप में लेना चाहिए। रेल प्रशासन को तुरंत अपने टिकट बुकिंग एल्गोरिदम की जांच करनी होगी, कोटे के खेल को बंद करना होगा और यह सुनिश्चित करना होगा कि चलती ट्रेन की हर एक खाली सीट पर हक सिर्फ और सिर्फ देश के आम प्रतीक्षारत (Waiting) यात्री का हो। जब तक ऐसा नहीं होगा, तब तक “जनता परेशान, सरकार मस्त” का यह नारा गूंजता रहेगा। सरकार और रेल मंत्रालय को अपनी प्राथमिकताओं को दोबारा तय करना होगा। उन्हें आंकड़ों की बाजीगरी और विज्ञापनों की चमक से बाहर निकलकर आम जनता के इस दर्द को समझना होगा, क्योंकि लोकतंत्र में जनता को परेशान रखकर कोई भी सरकार लंबे समय तक ‘मस्त’ नहीं रह सकती।




