कैफ़ी रज़ा, अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन, जमुई, बिहार

बचपन में एक चुटकुला सुना था। एक किसान अपनी कमजोर गाय को लेकर पशु चिकित्सक के पास पहुंचा। उसने बताया कि गाय दिन-ब-दिन कमजोर होती जा रही है। डॉक्टर ने कुछ देर सोचा और कहा, “इसे हरे रंग का चश्मा पहना दो।” किसान हैरान हुआ। उसने पूछा, “हरे चश्मे से गाय की सेहत कैसे सुधरेगी?” डॉक्टर ने मुस्कुराकर कहा, “जब गाय को चारों तरफ हरा-भरा चारा दिखाई देगा तो उसे लगेगा कि खाने के लिए बहुत कुछ है। वह ज्यादा खाएगी और उसकी सेहत ठीक हो जाएगी।” बचपन में इस चुटकुले पर खूब हंसी आती थी। लेकिन उम्र बढ़ने के साथ समझ आया कि यह सिर्फ गाय और चश्मे की कहानी नहीं है। इसमें इंसानी जिंदगी का एक गहरा सच छिपा है-हम दुनिया को जैसी नजर से देखते हैं, कई बार दुनिया हमें वैसी ही दिखाई देने लगती है। दुनिया वही रहती है, लेकिन उसे देखने का नजरिया बदल जाता है। यहीं से इंसान की एक महत्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक जरूरत सामने आती है-मन की संतुष्टि। मुश्किल समय में यही सोच हमें संभालती है, लेकिन कई बार यही सोच हमें सच देखने से भी रोक देती है।

असफलता इसका आसान उदाहरण है। परीक्षा में कम नंबर आए तो हम कहते हैं-“पेपर बहुत कठिन था”, “सवाल सिलेबस से बाहर था”, “उस दिन दिमाग काम नहीं कर रहा था।” और जब कोई कारण नहीं मिलता तो बात किस्मत तक पहुंच जाती है “मेरी किस्मत में ही नहीं था।” हो सकता है इनमें से कुछ बातें सच हों। परिस्थितियां वास्तव में हमारे खिलाफ हो सकती हैं। लेकिन कई बार हम कारण इसलिए खोजते हैं ताकि मन को यह समझा सकें कि गलती हमारी नहीं थी। इससे मन को राहत मिलती है, लेकिन एक जरूरी सवाल पीछे छूट जाता है. अगली बार मैं क्या बदलूंगा? शायद यही वह जगह है जहां आत्म-संतुष्टि और आत्म-विकास अलग-अलग रास्तों पर चले जाते हैं। इसे बाजार के एक छोटे उदाहरण से समझिए। आप चावल खरीदने जाते हैं।
कई तरह के चावल देखकर लंबे, साफ और चमकदार चावल आपको तुरंत पसंद आ जाते हैं। आप कहते हैं-“ये अच्छे लग रहे हैं।”लेकिन अच्छा दिखना और अच्छा होना हमेशा एक बात नहीं है। फिर भी आंखों को जो सुंदर लगता है, मन उसे जल्दी स्वीकार कर लेता है। यानी हमारा फैसला केवल जरूरत या गुणवत्ता से नहीं, हमारी धारणा से भी प्रभावित होता है। खाने के साथ भी ऐसा ही है। कभी किसी रेस्टोरेंट का कोई व्यंजन इतना अच्छा लगता है कि वर्षों बाद भी उसका नाम सुनते ही चेहरे पर मुस्कान आ जाती है। स्वाद खत्म हो चुका होता है, लेकिन उससे जुड़ा अनुभव हमारी यादों में बचा रहता है। इंसान सिर्फ चीजों को नहीं देखता। वह उनके साथ भावनाएं, यादें और अर्थ भी जोड़ता है।
शायद बाजार ने इंसान के इस मनोविज्ञान को सबसे अच्छी तरह समझ लिया है। “सिर्फ दो घंटे का ऑफर।” “केवल पांच पीस बाकी।” “आज खरीदेंगे तो इतनी छूट।” ये सिर्फ विज्ञापन की पंक्तियां नहीं हैं। इनके पीछे हमारे मन की एक पुरानी प्रवृत्ति काम करती है-मौका हाथ से निकल जाने का डर। हमें लगता है कि अभी नहीं खरीदा तो शायद बाद में मौका नहीं मिलेगा। बाजार हमारी जरूरत ही नहीं बेचता, कई बार हमारी बेचैनी भी खरीद लेता है। लेकिन यह मनोविज्ञान अब बाजार से निकलकर हमारी जिंदगी तक पहुंच चुका है। इसकी सबसे बड़ी खिड़की है-सोशल मीडिया। पहले हम अपने आसपास के कुछ लोगों से अपनी तुलना करते थे। आज मोबाइल की स्क्रीन पर हर दिन सैकड़ों जिंदगियां हमारे सामने होती हैं-किसी की नई कार, किसी का घर, विदेश यात्रा, शानदार नौकरी या सफलता।
फिर मन पूछता है-“उसके पास यह सब है, मेरे पास क्यों नहीं?” यहीं से असंतोष शुरू हो सकता है। हम भूल जाते हैं कि सोशल मीडिया पर हमें किसी की पूरी जिंदगी नहीं दिखाई जाती। वहां अक्सर वही हिस्सा दिखाई देता है जिसे दिखाना पसंद किया गया है।
हम किसी की एक तस्वीर देखकर अपनी पूरी जिंदगी का फैसला करने लगते हैं। जो चीज कल तक हमारे लिए खुशी का कारण थी, वही आज किसी दूसरे के पास देखकर हमें छोटी लगने लगती है। संतुष्टि और असंतोष के बीच कई बार परिस्थिति नहीं, सिर्फ नजरिया खड़ा होता है। हमारे बुजुर्ग कहा करते थे कि धन और अन्न को बहुत अधिक दिखाना नहीं चाहिए। “नजर लग जाएगी” जैसी बातें भी सुनने को मिलती थीं। उसका वैज्ञानिक आधार अलग विषय है, लेकिन उस सोच में एक व्यावहारिक बात जरूर थी-हर चीज को दुनिया के सामने रखने की जरूरत नहीं होती। आज हर खुशी साझा करने का दौर है। समस्या सोशल मीडिया नहीं है। समस्या तब शुरू होती है जब हम वहां दिखाई जाने वाली जिंदगी को अपनी वास्तविक जिंदगी का पैमाना बना लेते हैं। हम दुनिया को नहीं, अपना चश्मा देख रहे होते हैं काले रंग का चश्मा पहन लीजिए तो दुनिया कुछ अलग दिखाई देगी। हरे रंग का चश्मा पहनेंगे तो वही दुनिया दूसरी लगेगी। हमारी मानसिक स्थिति भी कुछ ऐसा ही करती है।
कुएं का पानी अपनी जगह पर वही रहता है। गर्मी में वही पानी बेहद ठंडा लगता है और सर्दी में अपेक्षाकृत गुनगुना। पानी नहीं बदला, हमारी अनुभूति बदल गई। जिंदगी में भी कई बार परिस्थिति उतनी कठिन नहीं होती, जितनी हमारी नजर उसे बना देती है।
एक ही घटना किसी व्यक्ति को तोड़ सकती है और दूसरे को मजबूत बना सकती है। घटना वही, लेकिन उसका अर्थ अलग।
एडलरियन मनोविज्ञान भी इस बात की ओर संकेत करता है कि इंसान केवल घटनाओं से प्रभावित नहीं होता, बल्कि उन घटनाओं को दिए गए अर्थ से भी प्रभावित होता है। इसलिए अतीत हमारे वर्तमान पर असर डाल सकता है। किसी ने धोखा दिया, कोई अवसर हाथ से निकल गया, परीक्षा में असफलता मिली या हमने कोई गलत फैसला लिया। घटना हो चुकी है। उसे मिटाना हमारे हाथ में नहीं है। लेकिन उसके बाद एक सवाल हमेशा हमारे हाथ में रहता है “अब इस अनुभव के साथ क्या करना है?” हम पूरी जिंदगी पूछ सकते हैं-“मेरे साथ ही ऐसा क्यों हुआ?” लेकिन यह सवाल हमें पीछे देखता रहता है। शायद इससे बेहतर सवाल है-“जो हुआ, उससे मैं आगे के लिए क्या सीख सकता हूं?” अतीत बदला नहीं जा सकता, लेकिन कई बार अतीत का अर्थ बदला जा सकता है। और यहीं से सवाल हमारे व्यक्तित्व तक पहुंचता है। क्या हमारा व्यक्तित्व भी बदल सकता है? हम अक्सर कहते हैं-“मैं ऐसा ही हूं”, “मेरा स्वभाव ही ऐसा है”, “मुझे जल्दी गुस्सा आता है”, “मैं लोगों से ज्यादा घुलता-मिलता नहीं।”
धीरे-धीरे ये बातें हमारी पहचान बन जाती हैं। लेकिन क्या ये सचमुच हमारा स्वभाव है या वर्षों से दोहराया गया व्यवहार? हमारे बहुत से व्यवहार परिवार, समाज और अनुभवों से सीखे होते हैं। बार-बार दोहराए जाने के बाद वे आदत बन जाते हैं और फिर हमें लगता है कि यही हमारा व्यक्तित्व है। गुस्से को ही देखिए। गुस्सा आना स्वाभाविक भावना है, लेकिन हम उसे कब और किसके सामने दिखाते हैं, यह हमेशा एक जैसा नहीं होता। कई बार कोई व्यक्ति बच्चे पर गुस्सा कर रहा होता है। तभी फोन आता है। वही व्यक्ति फोन उठाकर बेहद शांत आवाज में बात करता है। फोन रखने के बाद उसका गुस्सा फिर लौट आता है। इसका मतलब यह नहीं कि हर गुस्सा दिखावा है। लेकिन यह जरूर बताता है कि हम अपनी भावनाओं को केवल महसूस नहीं करते, कई बार उनका इस्तेमाल भी करते हैं। यदि बचपन से हमें यह अनुभव हो कि गुस्सा करने से सामने वाला डरता है और हमारी बात मान लेता है, तो धीरे-धीरे गुस्सा हमारी आदत बन सकता है। फिर एक दिन हम कहते हैं-“मैं तो ऐसा ही हूं।” शायद बदलाव की शुरुआत इसी वाक्य को चुनौती देने से होती है। क्योंकि जो व्यवहार हमने सीखा है, उसे बदला भी जा सकता है और दोबारा सीखा भी जा सकता है।
आज सोशल मीडिया के दौर में किसी दूसरे जैसा बनने की इच्छा सामान्य है। किसी का अनुशासन पसंद आता है, किसी की बोलने की शैली, किसी की सफलता। दूसरे से सीखना अच्छी बात है, लेकिन उसकी पूरी जिंदगी की नकल करना नहीं। वह अनुशासित है तो उसका अनुशासन सीखिए। वह अच्छा वक्ता है तो उसकी संवाद शैली सीखिए। लेकिन उसकी पूरी जिंदगी की फोटोकॉपी मत बनिए। फोटोकॉपी बनने के बजाय अपना बेहतर संस्करण बनने की कोशिश कीजिए। आपकी शुरुआती रेखा अलग है। आपकी परिस्थितियां अलग हैं। आपकी जिम्मेदारियां अलग हैं। इसलिए आपकी मंजिल भी अलग हो सकती है। जरूरी यह नहीं कि आप किसी दूसरे से आगे निकल जाएं। जरूरी यह है कि आप कल के अपने आप से थोड़ा बेहतर हों। शायद जिंदगी का सबसे स्वस्थ मुकाबला यही है-दूसरों से नहीं, अपने पुराने संस्करण से। इसीलिए कभी-कभी अपने चश्मे को उतारकर देखना जरूरी है। हो सकता है कुछ पल के लिए आंखें चौंधिया जाएं। लेकिन शायद उसके बाद दुनिया थोड़ी साफ दिखाई दे। दुनिया को बदलने से पहले अपना देखने का तरीका बदलकर देखिए। क्योंकि हो सकता है समस्या पूरी दुनिया में न हो-हो सकता है हमारे चेहरे पर लगा चश्मा ही दुनिया का रंग तय कर रहा हो।




