राजधानी दिल्ली में हाल ही में मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर हुए ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) और कई छात्र संगठनों के विरोध प्रदर्शनों के दौरान भारी तनाव देखने को मिला। इस दौरान सोशल मीडिया पर कुछ ऐसे वीडियो सामने आए, जिसके बाद यह सवाल उठने लगा कि क्या कुछ दक्षिणपंथी या हिंदुवादी संगठनों को प्रदर्शनकारियों से मारपीट करने की खुली छूट दी गई है? विपक्षी दलों और प्रदर्शनकारी संगठनों ने आरोप लगाया कि पुलिस की मौजूदगी में दक्षिणपंथी कार्यकर्ताओं ने छात्रों और महिलाओं के साथ मारपीट की।

हालांकि, जमीनी हकीकत और दिल्ली पुलिस की त्वरित कानूनी कार्रवाई इन दावों और ‘छूट’ मिलने की अफवाहों को सिरे से खारिज करती है। भारतीय कानून व्यवस्था में किसी भी संगठन या व्यक्ति को हिंसा करने या कानून अपने हाथ में लेने की कोई छूट नहीं है, और इस मामले में भी पुलिस ने सख्त कदम उठाए हैं। 10 अक्टूबर 2026 को दिल्ली के कनॉट प्लेस और डीडीयू मार्ग (DDU Marg) पर जब प्रदर्शनकारियों को निषेधाज्ञा (धारा 163) के उल्लंघन के आरोप में हिरासत में लिया जा रहा था, उसी दौरान वहां कथित तौर पर हिंदू रक्षा दल और हनुमान सेना से जुड़े कुछ लोग पहुंच गए। सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो में कुछ पुरुषों को प्रदर्शनकारी छात्रों का पीछा करते, उन्हें अपशब्द कहते और महिलाओं के साथ धक्का-मुक्की व मारपीट करते देखा गया। इस घटना के बाद इंटरनेट पर यह नैरेटिव चलाया जाने लगा कि पुलिस मूकदर्शक बनी रही और हमलावरों को संरक्षण दिया जा रहा है। विपक्षी नेताओं और वामपंथी छात्र संगठनों (जैसे AISA और SFI) ने इसे कानून-व्यवस्था की नाकामी बताते हुए सरकार और पुलिस पर गंभीर आरोप मढ़े। जैसे ही मारपीट का यह वीडियो वायरल हुआ, दिल्ली पुलिस ने तुरंत मामले का स्वतः संज्ञान (Suo Motu) लिया। पुलिस ने साफ कर दिया कि राजधानी में किसी को भी अशांति फैलाने की इजाजत नहीं दी जाएगी। मामले की गंभीरता को देखते हुए रविवार (11 अक्टूबर 2026) की सुबह तक पुलिस ने मारपीट में शामिल मुख्य चार आरोपियों—रविंद्र, रमन, विवेक और कपिल—को चिन्हित कर गिरफ्तार कर लिया। जांच में सामने आया कि ये आरोपी दक्षिणपंथी संगठन ‘हिंदू रक्षा दल’ से जुड़े होने का दावा कर रहे थे। हिंदू रक्षा दल के प्रमुख पिंकी चौधरी ने भी स्वीकार किया कि आरोपी उनके कार्यकर्ता हैं। पुलिस की इस त्वरित कार्रवाई ने उन दावों की हवा निकाल दी, जिसमें यह कहा जा रहा था कि इन संगठनों को पुलिस का संरक्षण प्राप्त है या इन्हें किसी भी प्रकार की ‘छूट’ मिली हुई है।

दरअसल, प्रदर्शनकारी संगठनों ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर एक बड़े जमावड़े का आह्वान किया था। दिल्ली पुलिस ने कानून-व्यवस्था, यातायात में व्यवधान और सुरक्षा चिंताओं का हवाला देते हुए इस विरोध प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी थी। इसके साथ ही नई दिल्ली जिले में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 (जो पहले धारा 144 थी) लागू कर दी गई थी, जिसके तहत किसी भी अनधिकृत भीड़ या जमावड़े पर रोक थी। इसके बावजूद, जब प्रदर्शनकारियों ने मार्च निकालने की कोशिश की, तो पुलिस ने निवारक कार्रवाई (Preventive Action) करते हुए सैकड़ों प्रदर्शनकारियों और प्रमुख चेहरों को हिरासत में लिया। इसी अफरा-तफरी के बीच दोनों गुटों (प्रदर्शनकारियों और दक्षिणपंथी कार्यकर्ताओं) में झड़प और मारपीट की यह घटना घटी। संवैधानिक तौर पर भारत में शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार सभी को है, बशर्ते वह प्रशासन की अनुमति और तय नियमों के दायरे में हो। ठीक इसी तरह, किसी भी नागरिक के खिलाफ हिंसा करना पूर्णतः दंडनीय अपराध है। दिल्ली पुलिस द्वारा वायरल वीडियो पर तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपियों को जेल भेजना यह साबित करता है कि चाहे कोई भी संगठन हो—वामपंथी, दक्षिणपंथी या कोई अन्य—कानून के दायरे से ऊपर कोई नहीं है। किसी भी संगठन को दिल्ली या देश के किसी भी हिस्से में मारपीट की कोई ‘छूट’ नहीं दी गई है और पुलिस ऐसे तत्वों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई कर रही है।




