नैरेटिव का सरताज : राहुल की रणनीति बनाम जन-आकांक्षायेँ

राहुल गांधी चुनाव नहीं जीतते हैं, जीतने की चिन्ता नहीं करते हैं या प्रधानमंत्री बनने की जल्दी में नहीं हैं या चुनाव जीतने के लिए वह सब नहीं करते हैं जो आप चाहते हैं – तो यह आप की समस्या है, राहुल गांधी की नहीं। अगर राहुल गांधी को लगता है कि आरएसएस की पोल खोलना ज्यादा जरूरी है तो कोई नहीं कहता कि आप उनसे सहमत होइए या उनकी मदद कीजिए। वे अपना काम अपनी मर्जी से, जो साथ दे रहा है उसकी सहायता से अपनी योग्यता-क्षमता से कर रहे हैं। हो सकता है, नाकाम रहें लेकिन कोशिश कर रहे हैं और खुलकर कर रहे हैं। यह प्रशंसनीय है। आपको नरेन्द्र मोदी या भाजपा को सत्ता से हटाने की जल्दी है यह आपकी समस्या है।

आप चाहते हैं कि राहुल गांधी जल्दी से जल्दी प्रधानमंत्री बन जाएं यह आपकी जरूरत हो सकती है। लेकिन इसके लिए उन्हें मजबूर नहीं किया जा सकता है। वैसे भी, एक नागरिक के रूप में देश को मोदी से आजाद कराने के लिए (अगर इसकी जरूरत या संभावना है) वे अकेले जिम्मेदार नहीं हैं या वे आपको सक्षम लगते हैं इसका मतलब नहीं है वे यही काम करें। वे अपना काम कर रहे हैं जो उन्हें पसंद है या जो उन्होंने चुना है। अगर आपको गांधी परिवार से ही उम्मीद है तो कुछ वरुण गांधी से भी रखिए। राहुल गांधी जो कर रहे हैं उसमें गलत हो सकते हैं लेकिन यह तो तय लगता है कि वे प्रधानमंत्री बनने के लिए नहीं कर रहे हैं। भारतीय राजनीति के वर्तमान परिदृश्य में राहुल गांधी के तौर-तरीकों को लेकर बुद्धिजीवियों, रणनीतिकारों और आम जनता में एक गहरा असमंजस रहता है। अक्सर यह आलोचना की जाती है कि वे पारंपरिक रूप से चुनाव जीतने की कला में माहिर नहीं हैं या फिर सत्ता की शीर्ष कुर्सी तक पहुँचने के लिए आवश्यक आक्रामकता का प्रदर्शन नहीं करते। सच्चाई यह है कि यदि राहुल गांधी चुनाव नहीं जीतते, जीतने की चिंता नहीं करते, प्रधानमंत्री बनने की जल्दी में नहीं हैं या चुनाव जीतने के लिए वह सब साम-दाम-दंड-भेद नहीं अपनाते जो एक आम मतदाता उनसे अपेक्षा करता है तो यह विशुद्ध रूप से आपकी समस्या है, राहुल गांधी की नहीं। रणनीतिक रूप से हमें यह समझना होगा कि हर राजनेता का अपना एक वैचारिक एजेंडा और प्राथमिकताएं होती हैं। अगर राहुल गांधी को यह लगता है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और सत्ता के वैचारिक आवरण की पोल खोलना देश के भविष्य के लिए अधिक जरूरी है, तो इसके लिए किसी को उनसे जबरन सहमत होने या उनकी मदद करने की आवश्यकता नहीं है। वे अपनी मर्जी, अपनी योग्यता, अपनी क्षमता और अपने साथ खड़े लोगों के सहयोग से अपना चुना हुआ काम कर रहे हैं। परिणाम चाहे जो भी हो—चाहे वे नाकाम ही क्यों न रहें—लेकिन वे खुलकर और बिना किसी लाग-लपेट के अपनी कोशिशों में जुटे हैं, और उनका यह अडिग स्वभाव लोकतांत्रिक विमर्श में प्रशंसनीय माना जाना चाहिए।

यहाँ मुख्य समस्या जन-मानस और विपक्ष के समर्थकों की अपनी अधीरता है। यदि आपको नरेंद्र मोदी या भाजपा को सत्ता से हटाने की भारी जल्दी है, तो यह आपकी जरूरत और आपकी समस्या हो सकती है। आप चाहते हैं कि राहुल गांधी अविलंब प्रधानमंत्री की कुर्सी पर आसीन हो जाएं, यह आपकी राजनीतिक इच्छा हो सकती है; लेकिन इसके लिए किसी नेता को उसकी मूल प्राथमिकताओं को छोड़ने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। वैसे भी, एक लोकतांत्रिक नागरिक के रूप में देश को वर्तमान सत्ता के प्रभाव से मुक्त कराने की जिम्मेदारी (यदि इसकी आवश्यकता या संभावना है) अकेले किसी एक व्यक्ति पर नहीं थोपी जा सकती। महज़ इसलिए कि वे आपको इस काम के लिए सबसे सक्षम लगते हैं, इसका मतलब यह कतई नहीं है कि वे अपनी प्राथमिकताओं को दरकिनार कर केवल वही काम करें जो आप चाहते हैं। यदि आम जनता और विपक्ष के समर्थकों को केवल ‘गांधी’ उपनाम से ही सारी उम्मीदें हैं, तो उन्हें अपनी उम्मीदों का दायरा बढ़ाना चाहिए और वरुण गांधी जैसे अन्य विकल्पों की तरफ भी नजर डालनी चाहिए। राहुल गांधी जो कर रहे हैं, रणनीतिक रूप से वह गलत या धीमा हो सकता है, लेकिन यह पूरी तरह से स्पष्ट है कि वे प्रधानमंत्री पद की तात्कालिक लालसा के लिए यह सब नहीं कर रहे हैं। यदि आपकी इच्छा उन्हें प्रधानमंत्री बनाने की है, तो केवल आलोचना करने के बजाय आगे आइए, उनके साथ जुड़िए, सकारात्मक सलाह दीजिए और धरातल पर काम करके दिखाइए।

भारतीय राजनीति में चुनाव जीतने के लिए ‘वोटों के हेरफेर’, सीटों की खरीद-फरोख्त और उम्मीदवारों के दलबदल की एक नई और जटिल शैली विकसित हो चुकी है, जिसके बारे में राहुल गांधी खुद कई मंचों से खुलकर बोल चुके हैं। इस दूषित राजनीतिक शैली और व्यवस्थागत खामियों को ठीक करने की जिम्मेदारी सामूहिक रूप से आपकी, मेरी और इस देश के हर सजग नागरिक की है। अगर सब कुछ अकेले राहुल गांधी को ही करना है, तो निश्चित रूप से प्राथमिकताएं भी उन्हीं की मर्जी और पसंद-नापसंद से तय होंगी। अंततः, हमें इस कड़वी हकीकत को स्वीकार कर लेना चाहिए कि वर्तमान संस्थागत और राजनीतिक व्यवस्था के भीतर राहुल गांधी शायद उस पारंपरिक तरीके से चुनाव न जीत सकें जैसा मीडिया या विश्लेषक चाहते हैं। वे स्पष्ट रूप से सत्ता के खेल को खेलने के बजाय, उस व्यवस्था को बदलने के लिए एक लंबी वैचारिक लड़ाई लड़ रहे हैं। यदि आपके पास सत्ता परिवर्तन का कोई जादुई शॉर्टकट है, तो आगे बढ़कर नेतृत्व संभालिए, राहुल गांधी को सत्ता दिला दीजिए या खुद सत्ता हासिल कर लीजिए। वर्तमान परिदृश्य में राहुल गांधी का यह रवैया आलोचना करने वालों के लिए एक स्पष्ट और करारा जवाब है—जैसे को तैसा।

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