जब विपक्ष की पारंपरिक राजनीति कमजोर दिखती है, तब पार्टी दफ्तरों से बाहर निकलकर एक लोकगीत और मजिस्ट्रेट की अदालत के बाहर दिया गया एक बयान सबसे मजबूत विपक्ष बन जाता है। नेहा सिंह राठौर और नेहा बोरा ने यह दिखा दिया है कि लंबी लड़ाई में हर रोज़ चिल्लाना या अपनी पूरी ताकत एक ही मोर्चे पर गंवा देना नासमझी है।

जब युद्ध लम्बा हो, तो सारे अस्त्र एक साथ नहीं झोंके जाते। यह रणनीति सिर्फ कुरुक्षेत्र के मैदान या सैन्य विज्ञान पर लागू नहीं होती, बल्कि आधुनिक लोकतंत्र में नागरिक अधिकारों और असहमति की लंबी लड़ाई में भी उतनी ही सच है। आज के भारतीय परिदृश्य में नेहा सिंह राठौर और नेहा बोरा इस बात की जीवंत मिसाल बन चुकी हैं। इन दोनों युवा महिलाओं ने यह साबित किया है कि जब सत्ता की संस्थागत ताकत के सामने प्रतिरोध लंबा खिंचने वाला हो, तो अपनी ऊर्जा, कला और कानूनी हथियारों को किश्तों में, रणनीतिक रूप से और सही समय पर इस्तेमाल करना कितना जरूरी होता है। नेहा सिंह राठौर और नेहा बोरा, दोनों की पृष्ठभूमि और कार्यशैली बिल्कुल अलग है, लेकिन उनका गंतव्य एक है सत्ता की व्यवस्था से कड़े सवाल पूछना। बिहार और उत्तर प्रदेश के ग्रामीण व श्रमिक तबके की नब्ज पहचानने वाली लोक गायिका नेहा सिंह राठौर का सबसे बड़ा हथियार उनकी धुन और लोक विधा है। सत्ता जब भी उन्हें कानूनी मुकदमों के जाल में घेरने की कोशिश करती है, वह हड़बड़ी में कोई आत्मघाती कदम नहीं उठातीं, बल्कि अपने अस्त्रों को बेहद सहेजकर चलती हैं। जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले से जुड़े एक एक्स (ट्विटर) पोस्ट को लेकर उत्तर प्रदेश पुलिस ने नेहा के खिलाफ हजरतगंज थाने (लखनऊ) में Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023 के तहत “देश की संप्रभुता, एकता और अखंडता को खतरे में डालने” जैसी गंभीर आरोपों में एफआईआर दर्ज की। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जब उनकी एफआईआर रद्द करने और अग्रिम जमानत देने से इनकार कर दिया, तो उन्होंने तुरंत संयम बरता। वह Supreme Court of India पहुंचीं, जहाँ माननीय अदालत ने उनकी गिरफ्तारी पर अंतरिम रोक लगाते हुए उन्हें पुलिस जांच में सहयोग करने का निर्देश दिया। नेहा ने पुलिस के सामने उपस्थित होकर अपने बयान दर्ज कराए और जांच में पूरा सहयोग कर कानूनी रूप से खुद को मजबूत रखा।

सीधी पेशाब कांड पर एक कार्टून पोस्ट करने को लेकर मध्य प्रदेश के सिंगरौली में भी उनके खिलाफ Section 153A (धार्मिक या सामाजिक सौहार्द बिगाड़ना) के तहत मुकदमा दर्ज हुआ। हाईकोर्ट ने भले ही एफआईआर रद्द नहीं की, लेकिन नेहा ने इसे व्यक्तिगत हताशा बनाने के बजाय अपनी लंबी लड़ाई का एक पड़ाव माना। हाल ही में जब एक प्रमुख नेशनल न्यूज चैनल ने एक पुराने और असंबंधित वीडियो का सहारा लेकर नेहा को एक ‘सेक्स रैकेट’ से जोड़कर उनका चरित्र हनन करने की कोशिश की, तो वह चुप नहीं बैठीं। उन्होंने डिजिटल और कानूनी मोर्चे पर इस दुष्प्रचार का पुरजोर विरोध किया। National Commission for Women (NCW) ने इस मामले का स्वतः संज्ञान लिया, और चैनल को सार्वजनिक माफी मांगनी पड़ी। इसके बावजूद नेहा ने इस माफी को नाकाफी बताते हुए चैनल के खिलाफ मानहानि (Defamation Case) का मुकदमा दायर करने के लिए अपनी लीगल टीम को मोर्चे पर लगा दिया। यह कदम दिखाता है कि वे एक लंबी टेस्ट मैच की खिलाड़ी हैं, जहाँ संयम और सटीक समय पर किया गया कानूनी प्रहार ही सबसे ज्यादा कारगर होता है।

दूसरी ओर, जेएनयू और आईसा (AISA) की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा का कार्यक्षेत्र और हथियार अलग हैं। उनके अस्त्र रंगमंच, धारदार वक्तृत्व, नागरिक आंदोलन और प्रशासनिक तानाशाही के खिलाफ सीधी वैचारिक अवज्ञा हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ मंडी हाउस में आयोजित एक शांतिपूर्ण विरोध मार्च के दौरान दिल्ली पुलिस ने नेहा बोरा को हिरासत में ले लिया और रात भर पुलिस स्टेशन में रखा। इसके बाद, पुलिस ने Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023 (BNSS) की धारा 126 के तहत उन्हें एक नोटिस थमाया, जिसमें उनसे शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए ₹10,000 का पर्सनल बॉन्ड (मुचलका) भरने और एक जमानतदार लाने को कहा गया। नेहा बोरा ने हार मानने के बजाय इस पुलिस नोटिस को Delhi High Court में चुनौती दी। हालांकि, हाईकोर्ट ने उनकी याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी कि मामला अभी स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट (SEM) के पास है। लेकिन कोर्ट ने पुलिस को यह सख्त निर्देश भी दिया कि वे नेहा बोरा को उन सभी दस्तावेजों और सबूतों की कॉपी सौंपें, जिनके आधार पर यह कार्रवाई की जा रही है। हाईकोर्ट से राहत न मिलने के बावजूद नेहा बोरा ने कोर्टरूम से बाहर आकर हार नहीं मानी। जब वह मंडी हाउस पुलिस स्टेशन स्थित Special Executive Magistrate Court में पेश हुईं, तो उन्होंने मीडिया के सामने साफ कर दिया कि वह किसी भी कीमत पर इस ‘पीस बॉन्ड’ पर हस्ताक्षर नहीं करेंगी। उनका तर्क है कि ऐसे बॉन्ड पर हस्ताक्षर करना लोकतांत्रिक तरीके से विरोध करने के बुनियादी अधिकार को सरेंडर करने जैसा है। वे एक साथ सड़कों पर अपनी पूरी ताकत झोंकने के बजाय सही वक्त पर कानूनी बारीकियों को समझते हुए मजिस्ट्रेट कोर्ट से लेकर हाईकोर्ट तक इस लड़ाई को क्रमिक रूप से आगे बढ़ा रही हैं।
इन दोनों के कानूनी संघर्षों के बीच का अंतर भी नए दौर के कार्यकर्ताओं के लिए एक बड़ा सबक है। एक डिजिटल माध्यम और लोक संस्कृति पर होने वाले कानूनी हमलों को सुप्रीम कोर्ट और मानहानि के मुकदमों से काट रही हैं, तो दूसरी छात्र राजनीति और नागरिक समाज के अधिकारों के लिए ‘पीस बॉन्ड’ जैसी दमनकारी प्रशासनिक व्यवस्था के खिलाफ कोर्ट को ही मंच बना रही हैं।दोनों पर ही कई एफआईआर और कानूनी कार्रवाइयों का दबाव बनाया गया। लेकिन दोनों ने ही अपनी ‘अवज्ञा’ को कमजोर नहीं होने दिया, बल्कि कानूनी पेचीदगियों को समझते हुए अपने बचाव और हमले के कार्ड्स बहुत सोच-समझकर खेले हैं।
विपक्ष की पारंपरिक राजनीति कमजोर दिखती है, तब पार्टी दफ्तरों से बाहर निकलकर एक लोकगीत और मजिस्ट्रेट की अदालत के बाहर दिया गया एक बयान सबसे मजबूत विपक्ष बन जाता है। नेहा सिंह राठौर और नेहा बोरा ने यह दिखा दिया है कि लंबी लड़ाई में हर रोज़ चिल्लाना या अपनी पूरी ताकत एक ही मोर्चे पर गंवा देना नासमझी है। अस्त्रों को बचाकर रखना, उन्हें धार देना, जरूरत पड़ने पर कोर्ट का दरवाजा खटखटाना और सही वक्त पर सही चोट करना ही लंबी जंग जीतने का एकमात्र तरीका है। इन दोनों ने भारतीय नागरिक प्रतिरोध के व्याकरण को एक नया, कानूनी और परिपक्व आयाम दिया है।




