लोकतंत्र में असहमति और तीखे तंज की अपनी एक जगह है, लेकिन जब तीखापन बदजुबानी और गाली-गलौज में बदल जाए, तो वह पूरे समाज को बीमार बनाता है।

गाली-गलौज और निजी लांछनों की कीचड़ में डूबी समकालीन राजनीति ने बुनियादी मुद्दों को हाशिए पर धकेल दिया है, जिससे त्रस्त जनता अब विकास की वास्तविक खोज में भटक रही है। आज का भारतीय राजनीतिक परिदृश्य किसी वैचारिक विमर्श या नीतिगत बहस का मंच न रहकर, एक ऐसी कुश्ती का अखाड़ा बन चुका है जहाँ दांव-पेंच के नाम पर केवल बदजुबानी और ओछी बयानबाजी का सहारा लिया जा रहा है। नेताओं की भाषा से शालीनता गायब है और मर्यादा की हर सीमा हर दिन लांघी जा रही है।व्यक्तिगत अमर्यादित टिप्पणियां और भाषाई पतन

मल्लिकार्जुन खड़गे का विवादित पलटवार (अक्टूबर 2026): पटना में एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान मतदाता सूची संशोधन (SIR) के मुद्दे पर बोलते हुए, जब दर्शक दीर्घा से किसी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पक्ष में टिप्पणी की, तो Congress अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे आवेश में आ गए। उन्होंने मंच से सीधे “मोदी का बाप भी जाएगा” जैसी अभद्र भाषा का प्रयोग किया। हालांकि, कांग्रेस नेताओं ने इसे महज एक मुहावरा बताकर बचाव किया और प्रधानमंत्री के पुराने बयानों (जैसे ’50 करोड़ की गर्लफ्रेंड’) का हवाला दिया, लेकिन Home Minister Amit Shah और भाजपा ने इसे राजनीतिक मर्यादा की सभी सीमाओं को लांघना और हताशा की राजनीति करार दिया।
हाल के हफ्तों में नागरिक अधिकार मंचों (CJP) और विपक्ष के कुछ बयानों ने देश में तीखी बहस छेड़ दी है। प्रशांत भूषण और Sanjay Raut जैसे नेताओं के बयानों का हवाला देते हुए सत्तापक्ष ने आरोप लगाया कि विपक्ष लोकतांत्रिक जनादेश को स्वीकार करने के बजाय बांग्लादेश और नेपाल की तर्ज पर सड़कों पर भीड़ जुटाकर “रिजीम चेंज” (सत्ता परिवर्तन) की खतरनाक साजिश रच रहा है। जब राजनीतिक विमर्श रचनात्मक आलोचना के बजाय “विदेशी टूलकिट” और “देश को अस्थिर करने” के आरोपों-प्रत्यारोपों में उलझ जाता है, तो जनता की बुनियादी समस्याएं (जैसे महंगाई और बेरोजगारी) पूरी तरह नेपथ्य में चली जाती हैं। निर्वाचन आयोग द्वारा मतदाता सूचियों के ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ (SIR) के फैसले को लेकर देश भर में भारी राजनीतिक बवाल खड़ा हो गया है। विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि इस प्रक्रिया के तहत लाखों वैध वोटरों के नाम काट दिए गए, जिसके खिलाफ राजधानी दिल्ली सहित कई राज्यों में उग्र प्रदर्शन हुए। इस मुद्दे पर सड़क से लेकर Supreme Court तक जंग खिंच गई है। वहीं, प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कथित रूप से “अत्यधिक बल प्रयोग” किए जाने पर संयुक्त राष्ट्र (UN) के विशेषज्ञों ने भी चिंता जताई है।

जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah ने केंद्र सरकार की नीतियों पर निशाना साधते हुए एक रैली में बेहद संवेदनशील टिप्पणी कर दी। उन्होंने पूछा, “आपने एक पाकिस्तान तो बना दिया, अब भारत के और कितने टुकड़े करोगे?” इसके साथ ही पाक-अधिकृत कश्मीर (PoK) को लेकर दिए गए उनके बयानों पर भी भारी बवाल मचा, जिसके बाद उनके खिलाफ राजद्रोह के मुकदमे की मांग करते हुए शिकायत दर्ज कराई गई। चाहे राष्ट्रीय स्तर के नेता हों या क्षेत्रीय छत्रप, राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को घेरने के लिए अब उनके काम या नीतियों की आलोचना नहीं की जाती, बल्कि उनके परिवार, जाति या शारीरिक बनावट पर व्यक्तिगत और अशोभनीय टिप्पणियां की जाती हैं। यह गाली-गलौज अनायास नहीं है, बल्कि यह एक सोची-समझी रणनीति है। जब भी महंगाई, बेरोजगारी, गिरती अर्थव्यवस्था या लचर स्वास्थ्य सुविधाओं जैसे बुनियादी मुद्दों पर सरकार या विपक्ष को घेरने की नौबत आती है, तो कोई न कोई नेता एक नया विवादित बयान देकर पूरे नैरेटिव को ‘तू-तू, मैं-मैं’ में तब्दील कर देता है।

टीवी चैनलों की डिबेट्स और सोशल मीडिया के ट्रेंड्स अब इस बात से तय होते हैं कि किस नेता ने किसको कितनी तीखी गाली दी। इस शोर-शराबे में वह आम नागरिक पूरी तरह अदृश्य हो जाता है जो हर सुबह खराब सड़कों, महंगे इलाज और बच्चों की फीस की चिंता में घर से निकलता है। चुनाव आते ही ध्रुवीकरण और भाषाई कटुता का कॉकटेल परोसा जाता है, जिससे जनता की तार्किक सोचने की क्षमता पर भावनात्मक पर्दा डाल दिया जाए। वोट बैंक की इस राजनीति में असली ‘विकास’ सिर्फ विज्ञापनों और होर्डिंग्स तक ही सीमित रह जाता है। जब देश की मुख्यधारा का मीडिया इन विवादित बयानों को ही चौबीस घंटे मुख्य समाचार बनाकर परोसता है, तो नेताओं को भी समझ आ जाता है कि काम करने से ज्यादा सुर्खियां बटोरने में फायदा है। नीतियों पर सवाल पूछने वाली पत्रकारिता की जगह अब केवल बयानबाजियों की स्क्रूटनी ने ले ली है। लोकतंत्र में असहमति और तीखे तंज की अपनी एक जगह है, लेकिन जब तीखापन बदजुबानी और गाली-गलौज में बदल जाए, तो वह पूरे समाज को बीमार बनाता है। भारतीय जनता अब इस ‘पॉलिटिकल थिएटर’ से थक चुकी है। उसे एक ऐसा नेतृत्व चाहिए जो रैलियों में लच्छेदार गालियां देने के बजाय संसद और विधानसभाओं में रोजगार, शिक्षा और बुनियादी ढांचे पर ठोस रोडमैप पेश कर सके। अगर यह भाषाई पतन नहीं रुका, तो जनता का इस पूरी राजनीतिक व्यवस्था से भरोसा उठना तय है।




