एक तरफ देश भर में शारदीय नवरात्रि के पावन अवसर पर आदि शक्ति, मां दुर्गा के नौ रूपों की उपासना की जा रही है, नारी शक्ति को पूजनीय मानकर पंडालों और घरों में शीश नवाया जा रहा है; वहीं दूसरी तरफ, देश की राजधानी दिल्ली की सड़कों से आई कुछ तस्वीरें और खबरें हर सजग नागरिक को भीतर तक झकझोर रही हैं।

हाल ही में दिल्ली में विभिन्न नागरिक और छात्र संगठनों के शांतिपूर्ण प्रदर्शन के दौरान महिलाओं के साथ कथित धक्का-मुक्की, मारपीट और उन्हें धमकाने की घटनाओं ने एक बार फिर सुरक्षा, व्यवस्था और हमारी सामूहिक सोच को कटघरे में खड़ा कर दिया है। यह विरोधाभास हमें सोचने पर मजबूर करता है कि क्या महिलाओं का सम्मान केवल धार्मिक अनुष्ठानों और राजनीतिक भाषणों के मंचों तक ही सीमित है? जब वही महिलाएं और नागरिक अपने लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए सड़कों पर उतरते हैं, तो उनकी सुरक्षा का दायित्व किसका है? देश में लंबे समय से “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” का नारा गूंज रहा है। यह केवल एक राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि समाज के प्रति एक गहरी प्रतिबद्धता का प्रतीक होना चाहिए। परंतु, जब राजधानी के मुख्य व्यावसायिक और प्रशासनिक क्षेत्रों में सार्वजनिक रूप से शांतिपूर्ण मार्च निकाल रहे प्रदर्शनकारियों, विशेषकर महिला छात्रों और महिला नागरिकों को असामाजिक तत्वों द्वारा निशाना बनाया जाता है, तो यह प्रतिबद्धता कमजोर पड़ती दिखाई देती है। लोकतंत्र में नागरिकों को अपनी बात रखने और शांतिपूर्ण विरोध दर्ज कराने का अधिकार संविधान ने दिया है। यदि उस विरोध के दौरान महिलाओं को सुरक्षा की कमी महसूस हो, या उन्हें डराया-धमकाया जाए, तो यह सीधे तौर पर हमारी संवैधानिक प्राथमिकताओं पर सवालिया निशान लगाता है।

इस घटनाक्रम ने समाज और प्रशासन के सामने कुछ ऐसे बुनियादी सवाल खड़े कर दिए हैं, जिनका उत्तर खोजना बेहद आवश्यक है.
महिलाओं और शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों की सुरक्षा कौन सुनिश्चित करेगा?
किसी भी लोकतांत्रिक समाज में कानून-व्यवस्था बनाए रखना और हर नागरिक—चाहे वह राहगीर हो या प्रदर्शनकारी—की सुरक्षा की जिम्मेदारी पुलिस और प्रशासन की होती है। जब कानून के रखवालों की मौजूदगी में उपद्रवी तत्व महिलाओं के साथ बदसलूकी करते हैं, तो सुरक्षा तंत्र की जवाबदेही पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।
कानून हाथ में लेने वालों पर निष्पक्ष कार्रवाई कब होगी?
भीड़ या किसी संगठन का मुखौटा पहनकर हिंसा करने वाले तत्वों को यह विश्वास कहां से मिलता है कि वे सरेआम कानून तोड़ सकते हैं? यद्यपि दिल्ली पुलिस ने इस मामले का संज्ञान लेते हुए कुछ गिरफ्तारियां की हैं, लेकिन जनता में विश्वास तभी बहाल होगा जब ऐसी कार्रवाई त्वरित, सख्त और बिना किसी राजनीतिक या वैचारिक भेदभाव के निष्पक्ष होगी।
क्या महिला सम्मान केवल भाषणों और नारों तक सीमित रहना चाहिए?
नवरात्रि में कन्या पूजन की पवित्र परंपरा और चुनावी रैलियों में ‘महिला सशक्तिकरण’ के लंबे-चौड़े वादों के बीच का अंतर तब साफ हो जाता है, जब जमीनी स्तर पर महिलाओं की गरिमा को ठेस पहुंचाई जाती है। महिलाओं को सुरक्षा और सम्मान किसी उपकार के रूप में नहीं, बल्कि उनके मौलिक अधिकार के रूप में मिलना चाहिए।
क्या सत्ता से सवाल पूछना और शांतिपूर्ण विरोध करना नागरिकों का अधिकार नहीं है?
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19 नागरिकों को शांतिपूर्ण ढंग से बिना हथियारों के इकट्ठा होने और अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार देता है। यदि शांतिपूर्ण ढंग से अपनी मांगें रखने वाले नागरिकों को हिंसा या भय का सामना करना पड़े, तो यह लोकतांत्रिक ताने-बाने को कमजोर करता है।
समाज के प्रबुद्ध वर्गों और निष्पक्ष विचारकों का मानना है कि हिंसा किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं हो सकती। चाहे वह किसी भी राजनीतिक दल, धार्मिक संगठन या विचारधारा के नाम पर की जाए। गलत करने वाला कोई भी हो—चाहे वह प्रदर्शनकारियों के गुट से हो या उनका विरोध करने वाले गुट से—कानून की लाठी सब पर बराबर चलनी चाहिए। जब तक जांच की प्रक्रिया में पूर्ण पारदर्शिता नहीं होगी और अपराधियों को कड़ा संदेश नहीं दिया जाएगा, तब तक सड़कों पर सुरक्षा का माहौल नहीं बन सकता। कानून व्यवस्था का डर किसी राजनीतिक दल को देखकर नहीं, बल्कि अपराध की प्रकृति को देखकर स्थापित होना चाहिए। नारी शक्ति की वास्तविक पूजा तब तक अधूरी है, जब तक हम अपनी बेटियों को एक ऐसा सुरक्षित वातावरण नहीं दे पाते जहां वे बिना किसी भय के अपनी आवाज उठा सकें, पढ़ सकें, बढ़ सकें और अपने अधिकारों की बात कर सकें। महिला सम्मान कोई राजनीतिक मुद्दा या चुनावी नफा-नुकसान का गणित नहीं है, यह हमारी सामाजिक और संवैधानिक जिम्मेदारी है।

यदि आज हम सड़कों पर महिलाओं के साथ हो रही इस प्रकार की बदसलूकी पर मौन रहे, तो यह मौन आने वाले कल में और बड़ी अराजकता को जन्म देगा। देश की बेटियां और जागरूक नागरिक न डरेंगे, न चुप रहेंगे। वे अपनी हर आवाज को देश के संविधान और कानून के दायरे में रहकर उठाते रहेंगे। शासन, प्रशासन और समाज—तीनों को मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि देवी की आराधना के इस पावन काल में, देश की वास्तविक ‘शक्तियों’ (बेटियों) को अपनी सुरक्षा के लिए दर-दर की ठोकरें न खानी पड़ें।




