2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को लेकर राज्य का राजनीतिक पारा अभी से चढ़ने लगा है। देश के सबसे बड़े सूबे की सत्ता का रास्ता तय करने में दलित मतदाता (करीब 21-22%) हमेशा से किंगमेकर की भूमिका में रहे हैं।

कभी बहुजन समाज पार्टी (बसपा) का अभेद्य किला माना जाने वाला यह वोट बैंक अब पूरी तरह बिखर चुका है, जिससे 2027 की चुनावी जंग बेहद दिलचस्प और अनिश्चित हो गई है। आइए तार्किक और जमीनी फैक्ट्स के आधार पर विश्लेषण करते हैं कि इस बार उत्तर प्रदेश का दलित वोटर किस ओर रुख कर सकता है और किस पार्टी के क्या चांस हैं? बहुजन समाज पार्टी (BSP): साख बचाने और वजूद की सबसे बड़ी लड़ाई-मायावती की बसपा के लिए 2027 का चुनाव अपने अस्तित्व को बचाए रखने की आखिरी उम्मीद जैसा है। 2007 में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने वाली बसपा का ग्राफ लगातार गिरा है। 2022 के विधानसभा चुनाव में पार्टी को महज 12.8% वोट और केवल 1 सीट मिली थी। 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी का वोट शेयर गिरकर 9.39% रह गया और वह शून्य पर सिमट गई। मायावती का ‘जाटव’ (करीब 10-11%) कोर वोटर अब भी पूरी तरह उनसे दूर नहीं हुआ है, लेकिन गैर-जाटव दलित (पासी, कोरी, धोबी, खटीक) लगभग छिटक चुके हैं। अगर मायावती अपने भतीजे आकाश आनंद के नेतृत्व में युवाओं को जोड़ने और आक्रामक कैडर कैंपेन करने में सफल रहती हैं, तो वह अपने कोर वोट बैंक को एकजुट रख सकती हैं। हालांकि, मुख्य लड़ाई में आने के लिए उन्हें एक बड़े चमत्कार की जरूरत होगी।

भारतीय जनता पार्टी (BJP) को गैर-जाटव दलितों पर पकड़ मजबूत रखने की चुनौती है । भाजपा ने बीते एक दशक में सोशल इंजीनियरिंग के दम पर दलित राजनीति का पूरा गणित बदल दिया है। भाजपा ने गैर-जाटव दलितों में अपनी गहरी पैठ बनाई है। केंद्र और राज्य सरकार की कल्याणकारी योजनाएं (मुफ्त राशन, उज्ज्वला, पीएम आवास और प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण) दलितों के एक बड़े हिस्से को ‘लाभार्थी वर्ग’ के रूप में भाजपा के साथ जोड़े रखने में कामयाब रही हैं। इसके अलावा, हिंदुत्व कार्ड और कानून-व्यवस्था के मुद्दे पर भी दलितों का एक वर्ग भाजपा के पाले में खड़ा रहा है। 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को यूपी में दलित वोटों का नुकसान उठाना पड़ा था, क्योंकि विपक्ष ने “संविधान बदलने” का नैरेटिव सेट कर दिया था। 2027 में भाजपा के पास इस डैमेज को कंट्रोल करने की चुनौती होगी। यदि पार्टी डबल इंजन सरकार के विकास कार्यों और प्रशासनिक सुधारों के दम पर यह भरोसा दोबारा कायम कर लेती है, तो सत्ता विरोधी लहर (Anti-incumbency) के बावजूद वह दलितों के एक बड़े हिस्से को अपने पाले में रख सकती है।

समाजवादी पार्टी (SP) और कांग्रेस (I.N.D.I.A. गठबंधन): ‘PDA’ का बढ़ता आकर्षण,2024 के आम चुनाव में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के गठबंधन ने दलित राजनीति में सबसे बड़ा उलटफेर किया। अखिलेश यादव का PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) का नारा दलितों को काफी हद तक आकर्षित करने में सफल रहा। 2024 में सपा ने अवध और पूर्वांचल के कई इलाकों में दलितों (विशेषकर पासी और कोरी समाज) का बंपर वोट हासिल किया। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी द्वारा संविधान की प्रति दिखाकर की गई रैलियों ने दलितों के मन में सुरक्षा की भावना पैदा की थी। अगर 2027 तक सपा-कांग्रेस का यह गठबंधन अटूट रहता है और वे जमीनी स्तर पर दलितों के मुद्दों (जैसे आरक्षण, रोजगार और पुरानी पेंशन योजना) को उठाने में कामयाब रहते हैं, तो वे बसपा के बचे-खुचे आधार को भी अपने पाले में ला सकते हैं। इनके लिए सबसे बड़ा चांस यह है कि दलित अब भाजपा के विकल्प के रूप में एक मजबूत और जीतने वाले मोर्चे की तलाश कर रहे हैं।
आजाद समाज पार्टी (कांशीराम): चंद्रशेखर आजाद का ‘युवा फैक्टर’-पश्चिमी उत्तर प्रदेश से उभरे चंद्रशेखर आजाद अब यूपी की दलित राजनीति के नए और उभरते हुए चेहरे बन चुके हैं।2024 में नगीना लोकसभा सीट से चंद्रशेखर आजाद की प्रचंड जीत ने यह साबित कर दिया कि दलित युवाओं का एक बड़ा वर्ग अब बसपा के पारंपरिक तौर-तरीकों को छोड़कर चंद्रशेखर की आक्रामक और आंदोलनात्मक राजनीति को पसंद कर पश्चिमी यूपी के सहारनपुर, बिजनौर, मुजफ्फरनगर और मेरठ जैसे जिलों में चंद्रशेखर आजाद की पकड़ मजबूत है। 2027 के चुनाव में यदि वह किसी बड़े गठबंधन (जैसे सपा-कांग्रेस) का हिस्सा बनते हैं या अकेले भी लड़ते हैं, तो वह बसपा के जाटव वोट बैंक में बड़ी सेंध लगा सकते हैं। युवाओं के बीच उनका बढ़ता क्रेज उन्हें एक प्रभावी फैक्टर बनाता है। मीडिया मार्ट के टीम को उत्तरप्रदेश में घूमते हुए समझ आया कि 2027 के चुनाव में दलितों के मुख्य मुद्दे यह है । 2027 की चुनावी दशा और दिशा तय करने में निम्नलिखित मुद्दे सबसे महत्वपूर्ण रहने वाले हैं । दलित समाज में आरक्षण के उप-वर्गीकरण (Sub-categorization) और क्रीमी लेयर को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के बाद से चिंताएं हैं। जो पार्टी उन्हें इस मुद्दे पर सबसे ज्यादा सुरक्षित महसूस कराएगी, उसे फायदा होगा। पेपर लीक की घटनाएं और सरकारी विभागों में संविदा (Contractual) नौकरियों के बढ़ने से दलित युवा नाराज हैं। जमीनी स्तर पर होने वाले सामाजिक उत्पीड़न के मामलों पर सरकार और प्रशासन का रुख कैसा रहता है, यह भी बड़ा फैक्टर होगा।
2027 के उत्तर प्रदेश चुनाव में दलित वोटर किसी एक पार्टी के साथ बंधकर नहीं रहने वाला है। वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए यूपी की दलित राजनीति मुख्य रूप से त्रिकोणीय विभाजन की ओर बढ़ रही है। जाटव समाज का एक बड़ा हिस्सा बसपा और चंद्रशेखर आजाद के बीच बंट सकता है। गैर-जाटव दलितों का झुकाव इस बात पर निर्भर करेगा कि वे भाजपा की कल्याणकारी योजनाओं से ज्यादा प्रभावित होते हैं या सपा-कांग्रेस के ‘PDA’ नैरेटिव से। साफ है कि जो भी दल या गठबंधन दलितों के मन से असुरक्षा की भावना को दूर कर उनके सामाजिक और आर्थिक उत्थान का स्पष्ट रोडमैप देगा, 2027 में लखनऊ के तख्त पर उसी का राजतिलक होगा।




