साख का संकट: जब लोकतंत्र के स्तंभ ही जन-विश्वास खोने लगें, तो आगे क्या?

किसी भी जीवंत लोकतंत्र की नींव इस बात पर टिकी होती है कि उसके नागरिक अपनी बुनियादी संस्थाओं पर कितना भरोसा करते हैं। लेकिन समकालीन भारतीय परिदृश्य में एक बेहद चिंताजनक और गंभीर प्रवृत्ति उभरकर सामने आ रही है। आज आम जनता के बीच यह धारणा लगातार मजबूत हो रही है कि लोकतंत्र के चारों प्रमुख स्तंभ सरकार, संसद, मीडिया और न्यायपालिका (कोर्ट) अपनी साख और जन-विश्वास खोते जा रहे हैं।

जब रक्षक और नियामक संस्थाएं ही कटघरे में खड़ी हो जाएं, तो यह सवाल उठना लाजिमी है कि एक समाज और राष्ट्र के रूप में हमारे सामने आगे क्या रास्ता बचता है? इस व्यवस्थागत साख-संकट को हम निम्नलिखित तीन प्रमुख आयामों और उसके बाद के संभावित विकल्पों के जरिए समझ सकते हैं। नीतियां बनाने वाली सरकार और कानून बनाने वाली संसद अब रचनात्मक बहस का केंद्र नहीं रहीं। संसद में बिना गंभीर विमर्श के विधेयकों का पारित होना, विपक्ष की आवाज को तकनीकी तर्कों से दबाना और जनता के बुनियादी मुद्दों (जैसे बेरोजगारी, महंगाई) के बजाय राजनीतिक नफा-नुकसान को प्राथमिकता देना संसदीय गरिमा को चोट पहुंचाता है। जब जनता देखती है कि उसके चुने हुए प्रतिनिधि जनता के बजाय अपनी पार्टी के एजेंडे के प्रति वफादार हैं, तो उसका भरोसा टूटने लगता है। लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाने वाला मीडिया अब सत्ता से कड़े सवाल पूछने की अपनी मूल जिम्मेदारी से पूरी तरह विमुख हो चुका है। जनहित की खबरों को जगह देने के बजाय मुख्यधारा का मीडिया अक्सर सत्तापक्ष के नैरेटिव को आगे बढ़ाने, ध्रुवीकरण को बढ़ावा देने और निरर्थक राजनीतिक गाली-गलौज को टीआरपी का जरिया बनाने में व्यस्त रहता है। इस ‘गोदी मीडिया’ बनाम ‘पक्षपातपूर्ण पत्रकारिता’ के दौर में आम नागरिक खुद को पूरी तरह सूचना-विहीन और ठगा हुआ महसूस करता है।न्यायपालिका को भारतीय लोकतंत्र में आम आदमी की सुरक्षा का अंतिम किला माना जाता रहा है। परंतु हाल के वर्षों में मुकदमों के निपटारे में अत्यधिक देरी, संवेदनशील और नागरिक अधिकारों से जुड़े मामलों की सुनवाई में चयनात्मक रुख, और प्रशासनिक दबाव के आगे घुटने टेकने के आरोपों ने कोर्ट की निष्पक्षता पर भी धुंध के बादल खड़े कर दिए हैं। जब अदालतों से भी न्याय त्वरित और निष्पक्ष नहीं दिखता, तो जन-अविश्वास अपनी चरम सीमा पर पहुंच जाता है।

जब चारों तरफ से हताशा का माहौल हो, तो इतिहास गवाह है कि बदलाव की नई राहें हमेशा जनता के बीच से ही निकलती हैं। इस संकट से पार पाने के लिए निम्नलिखित तीन रणनीतिक मोर्चों पर काम करना होगा। जब राजनीतिक दल और पारंपरिक संस्थाएं नाकाम होती हैं, तब सड़कों का शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक प्रतिरोध सबसे बड़ा हथियार बनता है। इतिहास में जेपी आंदोलन से लेकर हालिया किसान आंदोलनों ने यह साबित किया है कि सजग नागरिक समाज अपनी सामूहिक ताकत से सोई हुई व्यवस्था को जगाने और उसे जवाबदेह बनाने में पूरी तरह सक्षम है। युवाओं, छात्रों और बुद्धिजीवियों को बिना किसी दलगत राजनीति के नागरिक अधिकारों की रक्षा के लिए आगे आना होगा। मुख्यधारा के कॉर्पोरेट मीडिया के समानांतर, स्वतंत्र पत्रकारों, डिजिटल पोर्टलों और यूट्यूटबर्स ने एक नई उम्मीद जगाई है। जनता को अब सूचनाओं के लिए केवल पारंपरिक टीवी चैनलों पर निर्भर रहने के बजाय स्वतंत्र, फैक्ट-चेक्ड और निष्पक्ष डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को न केवल अपनाना होगा बल्कि उन्हें आर्थिक रूप से भी सहारा देना होगा ताकि वे बिना किसी दबाव के निर्भीक पत्रकारिता कर सकें। लोकतंत्र का सबसे बड़ा अस्त्र अंततः नागरिक का ‘वोट’ ही है। जब तक जनता जाति, धर्म और मुफ्त के लोक-लुभावन वादों के जाल से ऊपर उठकर शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और संस्थागत शुचिता के नाम पर वोट नहीं करेगी, तब तक राजनीतिक दलों में सुधार की कोई गुंजाइश नहीं बनेगी। स्थानीय स्तर पर पंचायतों से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक संवैधानिक मूल्यों और नागरिक अधिकारों के प्रति जागरूकता फैलानी होगी।

संस्थाओं का कमजोर होना किसी एक सरकार या एक दल का संकट नहीं है, बल्कि यह पूरे देश के लोकतांत्रिक ताने-बाने के कमजोर होने का संकेत है। जब सरकार, संसद, मीडिया और कोर्ट अपना विश्वास खोने लगें, तो जिम्मेदारी सीधे इस देश के मालिकों—यानी आम जनता—पर आ जाती है। यह समय निराशा में डूबने का नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक अवज्ञा, संवैधानिक अधिकारों के प्रति सजगता और सामूहिक जिम्मेदारी निभाने का है। शॉर्टकट या त्वरित चमत्कारों के जाल से बाहर निकलकर, व्यवस्था बदलने के लिए एक लंबी और सधी हुई लोकतांत्रिक लड़ाई लड़ना ही आगे का एकमात्र और वास्तविक रास्ता है।

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