एडवोकेट, शुभम पांडे, सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया
घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 (PWDVA) भारतीय संसद द्वारा पारित सबसे प्रगतिशील कानूनों में से एक माना जाता है।

इसे बनाने के पीछे सोच बहुत साफ थी – भारत में लाखों महिलाएं घर के भीतर हिंसा झेलती हैं, लेकिन उनके पास थाने जाने के अलावा कोई तुरंत राहत नहीं थी। भारतीय दंड संहिता की धारा 498A में एफआईआर तो हो जाती थी, लेकिन उसमें पत्नी को न तो घर में रहने का अधिकार मिलता था, न ही तुरंत खर्चा। इसी कमी को पूरा करने के लिए 2005 का कानून लाया गया। पिछले 5-6 वर्षों से मैं दिल्ली एनसीआर की अदालतों में इस कानून के तहत मुकदमे लड़ रहा हूँ। कभी पीड़ित महिला की तरफ से, तो कभी पति और उसके परिवार की तरफ से। इस दोहरे अनुभव ने मुझे यह सिखाया है कि यह कानून आज भी उतना ही जरूरी है जितना 2005 में था, लेकिन इसके दुरुपयोग को रोकने के लिए न्यायिक संतुलन की सख्त जरूरत है। सरल भाषा में आप समझिए कानून वास्तव में क्या कहता है? बहुत से लोग समझते हैं कि घरेलू हिंसा का मतलब सिर्फ मार-पीट है। लेकिन कानून की धारा 3 के अनुसार घरेलू हिंसा के चार रूप हैं:
क) शारीरिक हिंसा: मारना, धक्का देना, किसी भी तरह से शरीर को चोट पहुँचाना।
ख) यौन हिंसा: जबरदस्ती यौन संबंध, या किसी भी तरह का यौन शोषण।
ग) मौखिक और भावनात्मक हिंसा: गाली-गलौज करना, चरित्र पर लांछन लगाना, बच्चा न होने पर ताना देना, नौकरी न करने देने पर मजबूर करना। सुप्रीम कोर्ट ने इसे भी गंभीर हिंसा माना है।
घ) आर्थिक हिंसा: पत्नी को घर के खर्च के लिए पैसे न देना, उसकी सैलरी छीन लेना, उसे घर से निकाल देना, उसके स्त्रीधन (गहने, कपड़े) को वापस न करना।

इस कानून के तहत एक महिला धारा 12 में मजिस्ट्रेट के पास आवेदन देकर पाँच तरह की राहत मांग सकती है:
1. संरक्षण आदेश (धारा 18): पति को दोबारा हिंसा न करने का आदेश।
2. निवास आदेश (धारा 19): उसे ससुराल के घर से न निकाला जाए, चाहे वह घर सास-ससुर के नाम ही क्यों न हो।
3. आर्थिक राहत (धारा 20): भरण-पोषण, बच्चों की फीस, मेडिकल खर्च।
4. कस्टडी आदेश (धारा 21): बच्चों की अस्थायी कस्टडी।
5. मुआवजा आदेश (धारा 22): मानसिक पीड़ा के लिए मुआवजा।
यह कानून सिविल है, यानी इसमें तुरंत राहत मिलती है, लेकिन अगर पति संरक्षण आदेश का उल्लंघन करे तो धारा 31 के तहत उसे एक साल तक की जेल हो सकती है।

अब आप जानिए सुप्रीम कोर्ट का वो दो ऐतिहासिक फैसला जिन्होंने सब बदल दिया,पिछले पाँच सालों में दो फैसलों ने इस कानून की दिशा तय की है:
पहला – सतीश चंदर आहूजा बनाम स्नेहा आहूजा (2020): इससे पहले कई पति कहते थे कि “यह घर मेरे माँ-बाप का है, मेरा नहीं, इसलिए पत्नी को यहाँ रहने का हक नहीं।” सुप्रीम कोर्ट ने कहा – अगर पत्नी शादी के बाद उस घर में पति के साथ रही है, चाहे वह घर किसी के भी नाम हो, वह साझा गृहस्थी (Shared Household) है। मेरी कई मुवक्किलों के लिए यह फैसला वरदान बना। एक 30 वर्षीय महिला जिसे मैं जानता हूँ, उसे ससुराल वालों ने कहा कि घर तो हमारे नाम है, तुम निकलो। इसी फैसले के आधार पर हम उसे घर में रहने का आदेश दिला पाए।
दूसरा – रजनेश बनाम नेहा (2021): यह भरण-पोषण के मामलों में मील का पत्थर है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पति और पत्नी दोनों को अपनी आय, संपत्ति, खर्च, बैंक खातों का पूरा हलफनामा (Affidavit of Disclosure) देना होगा। इससे पहले क्या होता था – पत्नी कहती थी पति 2 लाख कमाता है, पति कहता था मैं बेरोजगार हूँ। कोर्ट अंदाजे से आदेश कर देता था। अब अदालतें ITR, सैलरी स्लिप, बैंक स्टेटमेंट मांगती हैं। एक वकील के तौर पर मेरा काम कठिन हो गया है, क्योंकि मुझे अब सिर्फ आरोप नहीं, सबूत देना पड़ता है, लेकिन यह ज्यादा निष्पक्ष है।

जमीनी हकीकत – जो मैंने अदालतों में देखी- मैं यहाँ दो सच्ची तस्वीरें रखना चाहता हूँ, बिना किसी का नाम लिए:
पहली तस्वीर – जहाँ कानून जीवन बचाता है: पिछले साल मेरे पास एक महिला आई, उम्र 30 साल, शादी को 4 महीने हुए थे। उसे दहेज के लिए रोज ताने दिए जाते थे और फिर एक दिन रात में घर से निकाल दिया गया। उसके माता-पिता बिहार में थे, वह दिल्ली में अकेली थी। उसके पास कोई आय नहीं थी। हमने धारा 12 की अर्जी और धारा 23 में अंतरिम राहत मांगी। कोर्ट ने 7 दिन में उसे 15,000 रुपये प्रतिमाह अंतरिम भरण-पोषण और घर में वापस रहने का आदेश दिया। उसके लिए वह आदेश सिर्फ कागज नहीं, उसके जीने का सहारा था।
दूसरी तस्वीर – जहाँ कानून का दुरुपयोग होता है: दूसरी तरफ, मैं ऐसे मामले भी देखता हूँ जहाँ शिकायत में पति के साथ-साथ उसके 70 साल के बीमार पिता, 65 साल की माँ, जो गाँव में रहते हैं, उसकी शादीशुदा बहन जो 5 साल से अपने ससुराल में है, और 19 साल के देवर को भी घसीट लिया जाता है। जैसे एक मामले में, परिवार के सभी 5 लोग जो दिल्ली में भी नहीं रहते, उन्हें पक्षकार बनाया गया। जब मैंने कोर्ट में पूछा कि इनके खिलाफ घरेलू हिंसा का कौन सा विशिष्ट कृत्य है, तारीख क्या है, समय क्या है, तो अर्जी में सिर्फ लिखा था “सभी ने मिलकर तंग किया।” यह “ओवर-इम्प्लिकेशन” है। मेरे पिछले 6 साल के अनुभव में 10 में से 7 मामलों में ऐसा होता है। एक नोटिस आने से ही उस बुजुर्ग पिता की समाज में बदनामी हो जाती है, उसे अदालतों के चक्कर लगाने पड़ते हैं, वकील करना पड़ता है।
2025-26 में हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट का नया रुख अदालतों ने अब इस दुरुपयोग को गंभीरता से लेना शुरू किया है:
क) पारदर्शिता पर जोर: अब अदालतें कह रही हैं कि सिर्फ यह कहना काफी नहीं कि “पति की बड़ी दुकान है।” आपको GST नंबर, दुकान का किरायानामा, आय का सबूत देना होगा।
ख) सभी रिश्तेदारों को न घसीटने की हिदायत: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2025 में _मोहम्मद शाहिद बनाम स्टेट_ और दिल्ली हाईकोर्ट ने कई मामलों में कहा है कि बिना विशिष्ट आरोपों के ससुराल के सभी सदस्यों को आरोपी बनाना प्रक्रिया का दुरुपयोग है। सुप्रीम कोर्ट ने भी अपनी हालिया गाइडलाइन में कहा है कि मजिस्ट्रेट को धारा 13 का नोटिस जारी करने से पहले यह देखना चाहिए कि क्या शिकायत में उस व्यक्ति के खिलाफ कोई प्रथम दृष्टया मामला बनता भी है या नहीं। यंत्रवत तरीके से समन जारी नहीं होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा है कि डीवी एक्ट की शिकायत कोई पारिवारिक वंशावली नहीं है। कानून को दो चीजें साबित करनी होती हैं – पहला, उस व्यक्ति के साथ घरेलू संबंध (Domestic Relationship) था, और दूसरा, उस व्यक्ति ने घरेलू हिंसा का कोई कृत्य किया है। दोनों का होना जरूरी है। अब सवाल है -समाधान क्या है? एक वकील के तौर पर मेरे सुझाव- मेरा मानना है कि हमें कानून को कमजोर नहीं करना है, बल्कि उसके क्रियान्वयन को मजबूत करना है:
पहला – अनिवार्य काउंसलिंग और मध्यस्थता: मेरे अनुभव में, अगर पति-पत्नी को पहले 30 दिनों में एक अच्छे मध्यस्थ (Mediator) के पास बैठाया जाए, तो 30% मामले वहीं सुलझ जाते हैं। कई बार झगड़ा अहंकार का होता है, हिंसा का नहीं। अदालत को नोटिस जारी करने से पहले एक बार काउंसलिंग का मौका जरूर देना चाहिए।
दूसरा – धारा 13 का सही उपयोग: मजिस्ट्रेटों को जल्दबाजी में एकतरफा (Ex-parte) आदेश देने से बचना चाहिए। दोनों पक्षों को सुनना न्याय का मूल सिद्धांत है। जल्द न्याय देना अच्छी बात है, लेकिन एकतरफा न्याय देना अन्याय है।
तीसरा – जागरूकता: महिलाओं को यह समझना होगा कि यह कानून सुरक्षा की ढाल है, संपत्ति हड़पने की तलवार नहीं। इसका उपयोग अपने अधिकारों के लिए करें, बदला लेने के लिए नहीं। और परिवारों को भी समझना होगा कि दहेज मांगना, पत्नी को “बांझ” कहना, उसे नौकरी न करने देना, उसके पैसों पर कब्जा करना – ये सब भी घरेलू हिंसा है, जिसके लिए कानून में सजा है।
अंत में, मैं अदालत में हमेशा अपने मुवक्किलों से एक ही बात कहता हूँ – यह अधिनियम कभी पति बनाम पत्नी का नहीं था। यह हिंसा बनाम गरिमा का कानून है। जब एक महिला अपने ही घर में असुरक्षित महसूस करे, तो राज्य का यह कर्तव्य है कि वह उसे सुरक्षा दे। लेकिन जब एक निर्दोष बुजुर्ग माता-पिता को बिना किसी कसूर के अदालतों के चक्कर लगाने पड़ें, तो यह भी न्याय की विफलता है।यदि हम सुरक्षा और निष्पक्षता के बीच की इस पतली रेखा पर संतुलन बनाकर चलें, तो ही यह कानून अपने उद्देश्य में सफल रहेगा – एक ऐसा घर जहाँ कोई भी, चाहे महिला हो या पुरुष, हिंसा के डर के बिना गरिमा के साथ रह सके।

