डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह ‘सहज़’, हरदा, मध्य प्रदेश

इलाका पहाड़ी था,कोहरे और धुंध की चादर ओढ़े ऊँचे-ऊँचे पाकीज़ा दरख़्त, आसमान से बातें करती चोटियाँ, और घुमावदार रास्तों पर पसरा हुआ एक पुर इसरार सन्नाटा। पहाड़ों से नीचे गाँवों में उतरती पगडंडियाँ और बुलंदियों से नज़र आती मनोरम बस्तियाँ इस समूचे अंचल को किसी हसीन ख़्वाब की मानिंद सजाती थीं। कश्मीर की बर्फ़ानी और सर्द वादियों में, जब हवाएँ रूह को कंपा देती थीं, मैं अक्सर अपनी चार पहिया गाड़ी में रसद और सामान लेकर सफ़र किया करता था। एक रोज़, गर्दिश-ए-हालात ने मुझे एक ऐसे सुनसान और घुमावदार मोड़ पर ला पटका जहाँ मेरी गाड़ी ने अचानक दम तोड़ दिया। बर्फ़ की हल्की परत सड़कों पर जम चुकी थी और मरम्मत की कोई सूरत दूर-दूर तक नज़र न आती थी। तमाम कोशिशों के बाद जब कोई रास्ता न सूझा, तो मैंने अपने हेल्पर से कहा, “तुम गाड़ी में ही मुस्तैद रहना। मैं नीचे बस्ती की सिम्त जाकर किसी मैकेनिक या मदद का इंतज़ार करता हूँ। अगर लौटने में ताख़ीर हो जाए तो घबराना मत।” मैंने उसके खाने-पीने के लिए कुछ बिस्किट और ज़रूरी सामान वहीं छोड़ दिया और खुद ढलान उतरकर नीचे बस्ती की तरफ पैदल ही चल पड़ा। रास्ते में एक अजीब से साए नुमा मुसाफ़िर ने मेरी रहनुमाई की, और उसकी मदद से बड़ी मुश्किल से गाड़ी फिर से रफ़्तार पकड़ने के क़ाबिल हो सकी। मैकेनिक को उसके ठिकाने पर छोड़कर जब मैं वापस लौट रहा था, तो अचानक धुंध के आगोश में एक छोटा सा पहाड़ी ढाबेनुमा आशियाना दिखाई दिया।

वहाँ एक ख़ामोश और निहायत हसीन लड़की मौजूद थी, जो मुसाफ़िरों के लिए चाय और खाना तैयार करती थी। उसकी आँखों में एक अजीब सा समंदर ठहरा हुआ था,गहरा, पुरइसरार और किसी अनकहे राज़ की तरह मुख़्तफ़ि (छिपा हुआ)। उसकी निगाहों की कशिश ने मेरे पाँव जकड़ लिए। मैंने वहीं रुककर खाना खाया और रात की तन्हाई वहीं बसर करने का इरादा कर लिया। रात भर सर्द हवाओं के बीच हमने ज़िंदगी के तल्ख़ और शीरीं (कड़वे-मीठे) पहलुओं पर गुफ़्तगू की। सुबह जब रुख़सत का लम्हा आया, तो मैंने अपनी उंगली से एक कीमती अंगूठी निकालकर उसकी हथेली पर रख दी और बड़े अदब व दबी जुबान से कहा,”अगर ज़िंदा रहा और वक़्त ने साथ दिया, तो मैं मुहब्बत का पैग़ाम लेकर इस वादी में ज़रूर लौटूँगा।” उसने कोई साफ़ जवाब नहीं दिया, बस अपने लबों पर एक सर्द सी मुस्कान सजा ली। मैं अपनी मंज़िल की जानिब बढ़ गया। महीनों का तवील अरसा बीत गया। कड़ी मेहनत और कमाई के बाद, जब हालात ने मुस्कुराकर देखा, तो दिल में उम्मीद की धड़कनें और बेचैनी का तूफ़ान लिए मैं उसी मुक़ाम पर वापस पहुँचा। मैंने उस ढाबे में कदम रखा। वह वहीं थी, मगर उसके चेहरे पर पहचान का कोई तास्सुर न था,मानो वह मुझे पहचानती ही न हो। मैंने थोड़ा आगे बढ़कर काँपते हुए लहजे में कहा, “क्या तुम्हें याद है? मैंने जाते वक़्त तुम्हें एक अंगूठी दी थी और वादा किया था कि लौटूँगा… देखो, मैं अपना वादा निभाने आ गया हूँ!” वह बेसाख़्ता मुस्कुराई। उसकी उस मुस्कान में कोई ख़ुशी न थी, बल्कि एक अजीब सा सिहरन पैदा करने वाला ठहराव था। वह चुपचाप अंदर के कमरे में गई और एक पुराना, सियाह लकड़ी का संदूक उठा लाई। जब उसने उस संदूकच को मेरे सामने खोला, तो मेरी आँखें हैरत से फटी की फटी रह गईं,उस संदूक में दर्जनों अंगूठियाँ चमक रही थीं! हर अंगूठी के साथ एक अलग चमक और एक अनकही दास्तान जुड़ी थी।

उसने अपनी पुरसुकून और सर्द आवाज़ में कहा, “इनमें से अपनी अंगूठी पहचान लो… अगर पहचान सको तो!” मेरे हाथ सुन्न हो गए। मैंने एक अंगूठी उठाई, फिर दूसरी, और फिर तीसरी… सब एक जैसी लग रही थीं। मैंने घबराकर पूछा, “ये… ये सब क्या है?”
उसने अपनी गहरी और ख़ामोश निगाहों से मेरी तरफ़ देखते हुए कहा, “ये सब उन मुसाफ़िरों के अहद (वादे) हैं जो यहाँ से गुज़रे थे। हर अंगूठी के साथ किसी ने लौटने का वादा किया था… मगर इस वादी से आज तक कोई वापस नहीं लौटा। सबके वादे इसी संदूक में दफ़्न होकर रह गए।” हवा का एक तेज़ और सर्द झोंका आया, जैसे कोई अदृश्य आवाज़ मेरे कान में गूँजी हो। मेरे दिल में एक कसक और अजीब सी बेचैनी उठी। क्या मैं भी अब सिर्फ़ एक भूली हुई कहानी बनकर रह गया हूँ? क्या मेरा यह लौटना वाक़ई हक़ीक़त है, या मैं भी उसी संदूक का एक हिस्सा बन चुका हूँ? मैंने हिम्मत जुटाकर उस संदूक में फिर से हाथ डाला। इस बार मेरी उंगलियों ने एक ख़ास अंगूठी को छुआ। मैंने उसे बाहर निकाला और पुरएतमाद लहज़े में कहा, “ये रही मेरी अंगूठी! क्योंकि मैंने अपना वादा निभाया है और मैं लौट आया हूँ।” उसने मेरी तरफ़ देखा, उसकी आँखों में इस बार ताज्जुब और एक गहरा अक़्स था। उसने काँपते हुए हाथों से वह अंगूठी ली और आहिस्ता से कहा, “तुम… तुम वाक़ई लौट आए हो? सदियों के इस वीरान सफ़र में किसी ने अपना वादा नहीं निभाया… सिवाय तुम्हारे।” उसकी आँखों में खुशी के आँसू चमक उठे। पहाड़ों की सर्द फिज़ा में अचानक एक गर्मजोशी सी घुल गई। मैंने अपने हेल्पर को बुलाया, जो गाड़ी के पास हैरान खड़ा था, मैने उसको गाड़ी की चाबी दी और कहा अब तुम इसके मालिक हो,जाओ अपनी ज़िंदगी अपने हिसाब से बसर करो मैं जल्दी तुम्हारे पास लौट कर आऊंगा और गाड़ी तुम्हारे नाम कर दूंगा,,,,और वहीं उस वादी में हमेशा के लिए ठहर जाने का फ़ैसला कर लिया। अब उस छोटे से आशियाने में न कोई अधूरापन था, और न ही कोई अधूरा इंतज़ार। सिर्फ़ हम थे, हमारी वफ़ा थी, और वो वादियाँ थीं,जिन्होंने एक सच्चे वादे के सामने आख़िरकार अपनी सारी खामोशियाँ तोड़ दी थीं।




