भारतीय लोकतंत्र की नींव पारदर्शी और निष्पक्ष चुनाव प्रणाली पर टिकी है। लेकिन हाल के हफ्तों में मतदाता सूचियों (Electoral Rolls) में बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने और ‘तार्किक विसंगतियों’ (Logical Discrepancies) के नाम पर लाखों लोगों को नोटिस जारी किए जाने के बाद देश में एक बड़ा सियासी और सामाजिक उबाल देखा जा रहा है। इसी पृष्ठभूमि में विपक्षी दलों के विपक्षी गठबंधन (INDIA Bloc) और कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) जैसे संगठनों ने “चलो दिल्ली — लोकतंत्र के लिए मार्च” का आह्वान किया है।

प्रदर्शनकारियों की मुख्य मांग है कि मतदाता सूची में की गई कथित गड़बड़ियों की निष्पक्ष जांच हो और मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार अपने पद से इस्तीफा दें। इस बड़े आंदोलन और मतदाता सूची से जुड़े तथ्यात्मक आंकड़ों ने भारतीय नागरिकों के बीच चुनावी जवाबदेही को लेकर एक गंभीर बहस छेड़ दी है। इस पूरे विवाद के केंद्र में चुनाव आयोग (ECI) द्वारा चलाया जा रहा विशेष गहन संशोधन (Special Intensive Revision – SIR) अभियान है। चुनाव आयोग का कहना है कि इस प्रक्रिया का उद्देश्य मतदाता सूची को दुरुस्त करना और फर्जी, मृत या दोहरे नामों (Duplicate Voters) को हटाना है। लेकिन नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं और राजनीतिक दलों का आरोप है कि इस पारदर्शी दिखने वाली प्रक्रिया के पीछे व्यापक स्तर पर ‘वोट चोरी’ का खेल हो रहा है, जिससे गरीब, प्रवासी और युवा मतदाताओं के नाम सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं। यह विवाद तब और गहरा गया जब मीडिया रिपोर्ट्स में यह दावा किया गया कि स्वयं चुनाव आयोग के भीतर दो चुनाव आयुक्तों ने 10 महीनों में करीब 14 बार इस संशोधन प्रक्रिया के कुछ पहलुओं पर गंभीर आंतरिक आपत्तियां उठाई थीं, हालांकि चुनाव आयोग ने इस दावे को खारिज करते हुए सभी फैसलों को सर्वसम्मत बताया है।

मतदाता सूची में हुए संशोधनों के जो आंकड़े सार्वजनिक हुए हैं, वे सचमुच चौंकाने वाले और किसी भी सजग नागरिक को सोचने पर मजबूर करने वाले हैं। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में कुल 1.45 करोड़ मतदाता थे। कार्यकर्ताओं के अनुसार, इस अभियान के प्रारंभिक चरण में करीब 47 लाख नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। इसके बाद जो 97 लाख नाम मसौदा सूची (Draft List) में शामिल रहे, उनमें से भी लगभग 33 लाख मतदाताओं को ‘तार्किक विसंगतियों’ (Logical Discrepancies) या ‘अनमैप्ड’ होने के आधार पर नोटिस थमा दिए गए हैं। आलोचकों और विपक्षी नेताओं का दावा है कि देश भर में करोड़ों नाम इस सूची से हटाए जा चुके हैं। उदाहरण के तौर पर, बिहार में ड्राफ्ट रोल से 65 लाख नाम घटे हैं। वहीं उत्तर प्रदेश में, जहां अगले साल चुनाव होने हैं, स्थानीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार सत्यापन प्रक्रिया में लगभग 13% नाम सूची से गायब मिले हैं। यह मुद्दा अब देश की सबसे बड़ी अदालत, सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है। वरिष्ठ अधिवक्ताओं और याचिकर्ताओं ने अदालत के समक्ष यह दलील दी कि मतदाताओं को दिए गए नोटिस पूरी तरह से “मशीन-जनरेटेड” (Machine-Generated Notices) प्रतीत होते हैं और इनके पीछे कोई ठोस मानवीय जांच नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने भी चुनाव आयोग से इस मामले में स्पष्टीकरण मांगते हुए सवाल किया है कि वे इन ‘तार्किक विसंगतियों’ के मापदंडों को स्पष्ट करें, क्योंकि आम जनता को यह समझ ही नहीं आ रहा है कि उनके नाम पर नोटिस क्यों जारी किए गए हैं। अदालत ने चुनाव आयोग को सुझाव दिया है कि वे बूथ स्तर के अधिकारियों (BLOs) की संख्या बढ़ाएं और मतदाताओं की सहूलियत के लिए एक स्पष्ट मानक प्रश्नोत्तर (Q&A Format) जारी करें।

“चलो दिल्ली” मार्च को रोकने के लिए प्रशासन ने कड़े सुरक्षा उपाय किए हैं। दिल्ली पुलिस ने नई दिल्ली जिले में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 (जो पूर्व में धारा 144 थी) लागू कर दी है। संसद मार्ग और जंतर-मंतर की ओर बढ़ने वाले रास्तों पर बैरिकेड्स लगा दिए गए हैं, मेट्रो स्टेशनों को आंशिक रूप से बंद किया गया और मध्य व्यावसायिक क्षेत्रों में इंटरनेट सेवाओं को भी निलंबित किया गया। कई छात्र नेताओं, विपक्षी सांसदों और विभिन्न राज्यों से दिल्ली आ रहे प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सरकार द्वारा शांतिपूर्ण प्रदर्शनों को इस तरह से दबाना लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन है, जबकि सत्ता पक्ष का तर्क है कि कानून-व्यवस्था और सार्वजनिक सुरक्षा बनाए रखने के लिए ऐसे कड़े कदम आवश्यक हैं। चुनावों में निष्पक्षता केवल इस बात से तय नहीं होती कि मतदान के दिन क्या होता है, बल्कि इस बात से तय होती है कि क्या हर पात्र नागरिक को बिना किसी भेदभाव के मतदान करने का अधिकार मिल रहा है। मतदाता सूची से लाखों नामों का कटना और जटिल कानूनी प्रक्रिया के कारण आम नागरिकों का परेशान होना सीधे तौर पर लोकतांत्रिक मूल्यों पर आघात है। लोकतंत्र में जनता का विश्वास बनाए रखने के लिए इन तीन मांगों पर त्वरित अमल होना चाहिए। चुनाव आयोग स्पष्ट रूप से सार्वजनिक करे कि किस सॉफ्टवेयर एल्गोरिदम या क्राइटेरिया के आधार पर 33 लाख से अधिक दिल्लीवासियों को विसंगति के दायरे में डाला गया। मतदाता सूचियों में हुए इस भारी बदलाव का किसी स्वतंत्र न्यायिक या तकनीकी समिति द्वारा ऑडिट कराया जाए ताकि यह साफ हो सके कि किसी विशेष वर्ग या विचारधारा के मतदाताओं को जानबूझकर तो बाहर नहीं किया गया। आम नागरिकों, विशेषकर कम पढ़े-लिखे या मजदूर वर्ग के लोगों के लिए अपने नाम को दोबारा जोड़ने की प्रक्रिया को बेहद सरल और परेशानी मुक्त बनाया जाए। “चलो दिल्ली — लोकतंत्र के लिए मार्च” सिर्फ एक राजनीतिक विरोध प्रदर्शन नहीं है, बल्कि यह देश के हर उस नागरिक की आवाज है जो अपने सबसे बड़े संवैधानिक अधिकार—’राइट टू वोट’ (Right to Vote)—की रक्षा करना चाहता है। सरकार और चुनाव आयोग को दमनकारी नीतियों के बजाय पारदर्शिता और संवाद का रास्ता चुनना चाहिए, क्योंकि जब तक चुनाव प्रणाली पर निष्पक्षता के सवाल उठते रहेंगे, तब तक लोकतंत्र पूरी तरह से सुरक्षित नहीं कहा जा सकता।




