11 अक्टूबर 2026 को संपूर्ण क्रांति के प्रणेता, भारत रत्न लोकनायक जयप्रकाश नारायण (जेपी) की 124वीं जयंती के पावन अवसर पर देश की राजधानी में एक वैचारिक महामंथन का आयोजन किया गया। नई दिल्ली स्थित जेपी की ऐतिहासिक कर्मस्थली कमला देवी भवन में ‘कल, आज और कल’ विषय पर एक विशेष परिचर्चा का सफल आयोजन संपन्न हुआ। इस कार्यक्रम में देश भर से आए प्रबुद्ध विचारकों, समाजशास्त्रियों, गांधीवादी विचारकों और गणमान्य अतिथियों ने जेपी के विचारों की समकालीन प्रासंगिकता और भविष्य के भारत के निर्माण में उनकी भूमिका पर विस्तार से चर्चा की।

इस महत्वपूर्ण और गरिमामयी कार्यक्रम का आयोजन एसोसिएशन ऑफ वॉलेंटरीज एजेंसी फॉर रुरल डेवलेपमेंट यानी ‘एवार्ड’ (AVARD) द्वारा किया गया, जबकि बृहस्पति वेलफेयर फाउंडेशन ने सहयोगी आयोजक के रूप में इस वैचारिक उत्सव को सफल बनाने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह आयोजन मात्र एक परिचर्चा नहीं, बल्कि उस ऐतिहासिक विरासत को नमन करने का जरिया भी था जहां बैठकर कभी स्वतंत्र भारत के सामाजिक आंदोलनों की रूपरेखा तैयार की गई थी। कमला देवी भवन दशकों से भारत के समाज सुधार, पंचायती राज और ग्रामीण विकास के आंदोलनों का मूक गवाह रहा है। कार्यक्रम में आए हुए अतिथियों ने लोकनायक जयप्रकाश नारायण और भारत माता के चित्रों पर पुष्पांजलि अर्पित की। आयोजक संस्था ‘एवार्ड’ के पदाधिकारियों ने उपस्थित जनसमूह का स्वागत करते हुए कहा कि जेपी ने जिस ग्रामीण विकास और सत्ता के विकेंद्रीकरण का सपना देखा था, उसे आगे बढ़ाना ही इस ऐतिहासिक भवन और हमारी संस्था का मुख्य ध्येय रहा है। सत्र के दौरान वक्ताओं ने तीन मुख्य आयामों पर अपने विचार साझा किए। चर्चा के पहले चरण में विचारकों ने जेपी के अतीत और उनके द्वारा चलाए गए ऐतिहासिक आंदोलनों को याद किया। वक्ताओं ने रेखांकित किया कि जेपी केवल 1974 की ‘संपूर्ण क्रांति’ के नायक नहीं थे, बल्कि वे आजादी की लड़ाई से लेकर भूदान आंदोलन और स्वतंत्रता के बाद ग्रामीण भारत को आत्मनिर्भर बनाने के सबसे बड़े पैरोकार थे। उन्होंने सत्ता के मोह से ऊपर उठकर हमेशा लोक-शक्ति (People’s Power) को राज-शक्ति (State Power) से ऊपर स्थान दिया। आज के दौर में जब लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता, सामाजिक ध्रुवीकरण और नैतिक मूल्यों में गिरावट को लेकर बहस छिड़ी हुई है, विचारकों ने माना कि जेपी के विचार आज पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हैं। संगोष्ठी में यह बात प्रमुखता से उठी कि जेपी का मानना था कि लोकतंत्र केवल हर पांच साल में वोट देने का नाम नहीं है, बल्कि शासन में जनता की हर दिन की भागीदारी होनी चाहिए। आज के डिजिटल युग में भी युवाओं को जेपी के ‘राइट टू रिकॉल’ (जनप्रतिनिधि को वापस बुलाने का अधिकार) और भ्रष्टाचार मुक्त समाज के सिद्धांतों को समझने की सख्त आवश्यकता है।

भविष्य के भारत (कल) के निर्माण पर चर्चा करते हुए प्रबुद्ध अतिथियों ने कहा कि यदि भारत को वैश्विक पटल पर एक सशक्त और समावेशी महाशक्ति बनना है, तो उसे अपनी जड़ों यानी गांवों की ओर लौटना होगा। जेपी का ‘अंत्योदय’ (समाज के अंतिम व्यक्ति का उदय) ही वह सूत्र है जिसके जरिए देश के आर्थिक और सामाजिक असंतुलन को दूर किया जा सकता है। आने वाली पीढ़ियों के लिए जेपी का जीवन एक नैतिक दिशा-सूचक (Moral Compass) की तरह काम करेगा। इस एक दिवसीय परिचर्चा में समाज के विभिन्न क्षेत्रों से आए सजग नागरिकों, शिक्षाविदों, समाजसेवियों और मीडिया कर्मियों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। खुले सत्र के दौरान प्रबुद्ध नागरिकों ने वक्ताओं से सीधे संवाद किया और वर्तमान सामाजिक चुनौतियों पर जेपी के सिद्धांतों के अनुप्रयोग को लेकर सवाल भी पूछे। मीडिया कर्मियों की उपस्थिति ने इस वैचारिक विमर्श को जन-जन तक पहुंचाने का मार्ग प्रशस्त किया।कार्यक्रम के समापन पर ‘एवार्ड’ और बृहस्पति वेलफेयर फाउंडेशन के प्रतिनिधियों ने सामूहिक रूप से सभी आगंतुकों के प्रति आभार व्यक्त किया। आयोजकों ने संकल्प लिया कि वे जेपी की इस कर्मस्थली से ग्रामीण सशक्तिकरण, स्वैच्छिक सामाजिक कार्यों और लोकतांत्रिक चेतना को जगाने का अभियान निरंतर जारी रखेंगे। यह आयोजन इस बात का स्पष्ट प्रमाण रहा कि भले ही लोकनायक आज हमारे बीच सशरीर मौजूद न हों, लेकिन उनकी वैचारिक लौ आज भी भारत के प्रबुद्ध मानस को उद्वेलित और आंदोलित करने की पूरी क्षमता रखती है।




