गोपेन्द्र कु. सिन्हा गौतम

1 सितम्बर 1911 में कानपुर देहात के झींझक रेलवे स्टेशन के पास बसे छोटे से गांव कठारा में एक ऐसा बच्चा पैदा हुआ जिसने आगे चलकर उत्तर भारत के वंचित तबके की सोई हुई चेतना को जगाने का काम किया।वह कोई और नहीं ललई सिंह यादव थे, जिन्हें दुनिया पेरियार ललई सिंह यादव के नाम से जानती है। फॉरेस्ट गार्ड से सिपाही विद्रोह तक- ललई सिंह का बचपन एक साधारण किसान परिवार में बीता। पिता चौधरी गज्जू सिंह यादव आर्यसमाजी विचारों के थे। 1929 से 1931 तक वे फॉरेस्ट गार्ड रहे, आगे चलकर 1933 में ग्वालियर रियासत की सशस्त्र पुलिस में सिपाही के रूप में भर्ती हुए। वहीं उन्होंने अव्यवस्था और दुर्व्यवहार के खिलाफ पहला विद्रोह किया। सेना में फैली अस्पृश्यता के खिलाफ आवाज उठाई। कांग्रेस पार्टी के स्वराज का समर्थन करने पर उन्हें बर्खास्त भी किया गया, पर अपील पर बहाल हुए। 1946 में उन्होंने ग्वालियर में ‘नान-गजेटेड मुलाजिमान पुलिस एण्ड आर्मी संघ’ की स्थापना की और पुलिसकर्मियों के हक के लिए लड़ाई लड़ी। 1947 में ग्वालियर स्टेट की आजादी के लिए पुलिस और फौज में हड़ताल कराने के आरोप में उन्हें राज-बंदी बनाया गया और 5 साल की सजा सुनाई गई। हिन्दू जाति व्यवस्था की जड़ता को तोड़ने के लिए उन्होंने अपने नाम से ‘यादव’ शब्द तक हटा दिया और अपना नाम बदलकर पेरियार ललई सिंह रख लिया।

‘सच्ची रामायण’ और अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक की लड़ाई-ललई सिंह को उत्तर भारत का पेरियार यूं ही नहीं कहा जाता। दक्षिण के महान समाज सुधारक पेरियार ई.वी. रामासामी की किताब ‘The Ramayana: A True Reading’ का हिंदी अनुवाद ‘सच्ची रामायण’ के नाम से 1968 में प्रकाशित कराने का साहस उन्होंने ही किया था। किताब छपते ही देश में काफी हलचल हुआ था। धर्म के तथाकथित ठेकेदार सड़कों पर उतर आए थे। उनके दबाव में आकर उत्तर प्रदेश सरकार ने 8 दिसंबर 1969 को किताब को जब्त कर लिया। लेकिन ललई सिंह डरे नहीं। उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट में लड़ाई लड़ी। 19 जनवरी 1971 को कोर्ट ने जब्ती का आदेश रद्द कर दिया और सरकार को जब्त किताबें लौटाने और 300 रुपये खर्च देने का आदेश दिया। सरकार सुप्रीम कोर्ट गई। वहां भी 16 सितंबर 1976 को जस्टिस वी.आर. कृष्ण अय्यर की अध्यक्षता वाली बेंच ने फैसला ललई सिंह के पक्ष में सुनाया और कहा कि यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मामला है। यह सिर्फ एक किताब की जीत नहीं थी, यह बहुजन विचार की जीत थी।
लेखक, नाटककार और बौद्ध विचारक- पेरियार ललई सिंह केवल आंदोलनकारी नहीं, एक प्रखर लेखक थे। उन्होंने बौद्ध धर्म अपनाया और अपने विचारों को फैलाने के लिए ‘अशोक पुस्तकालय’ और ‘सस्ता प्रेस’ की स्थापना की। उन्होंने 5 क्रांतिकारी नाटक लिखे – अंगुलिमाल, शम्बूक वध, संत माया बलिदान, एकलव्य और नाग यज्ञ। और 3 वैचारिक किताबें – ‘शोषितों पर धार्मिक डकैती’, ‘शोषितों पर राजनीतिक डकैती’ और ‘सामाजिक विषमता कैसे समाप्त हो?’ उनका मानना था कि जब तक वैचारिक गुलामी खत्म नहीं होगी, राजनीतिक आजादी बेमानी है। 7 फरवरी 1993 को यह महान योद्धा हमें छोड़ गया, पर उसकी चेतना आज भी जिंदा है। उनकी जयंती पर उन्हें याद करना सिर्फ एक रस्म नहीं है, यह शोषितों-वंचितों के हक की लड़ाई को बल प्रदान करने का दिन है।
वर्तमान में पेरियार ललई सिंह की प्रासंगिकता- वर्तमान में इनकी सबसे ज्यादा प्रसांगिकता बढ़ जाती है क्योंकि जिन सवालों को उन्होंने 1960-70 में उठाया था, वही सवाल आज केंद्र में हैं। जाति जनगणना और OBC राजनीति के वैचारिक पिता: आज बिहार से लेकर पूरे देश में जाति जनगणना की मांग है। ललई सिंह ने 60 साल पहले ही ‘शोषितों पर राजनीतिक डकैती’ में लिखा था कि जब तक शूद्र-अतिशूद्र अपनी संख्या के अनुपात में सत्ता में हिस्सेदारी नहीं मांगेंगे, आजादी अधूरी है। उत्तर भारत में कांशीराम से पहले OBC को ‘बहुजन’ शब्द में जोड़ने का वैचारिक काम उन्होंने ही किया था। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सबसे बड़ा केस लड़ा: आज जब किताबों-बयानों पर बैन की बात आती है, तो ललई सिंह का केस मिसाल है। 1969 में सरकार ने ‘सच्ची रामायण’ जब्त की, 1971 में इलाहाबाद हाईकोर्ट और 1976 में सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस वी.आर. कृष्ण अय्यर की बेंच ने सरकार को फटकारते हुए कहा था – “किसी ग्रंथ की आलोचना धार्मिक भावना भड़काना नहीं है। ” यह फैसला आज भी UAPA और हेट स्पीच के मामलों में उद्धृत होता है। राम मंदिर के दौर में वैकल्पिक राम-कथा: 2024 में राम मंदिर बनने के बाद राम को लेकर एक ही नैरेटिव हावी है। ऐसे में ललई सिंह की ‘सच्ची रामायण की चाबी’ और उनके नाटक ‘शम्बूक वध’ और ‘एकलव्य’ दलित-बहुजन नजरिए से रामायण-महाभारत को पढ़ने का औजार देते हैं।
वे कहते थे – मिथकों को पूजो मत, समझो। धर्मांतरण और बौद्ध धम्म की वापसी: 1967 में यादव टाइटल हटाकर बौद्ध बनना आज के ‘घर वापसी बनाम धम्म वापसी’ की बहस में प्रासंगिक है। वे ‘सम्मान के लिए धर्म परिवर्तन करें’ – बाबा साहेब के इस नारे को उत्तर भारत में जमीन पर लाने वाले पहले प्रचारकों में से थे। आज जब हर साल दीक्षाभूमि पर लाखों लोग धर्मांतरण कर रहे हैं, तो ललई सिंह का अशोक पुस्तकालय मॉडल फिर से देखा जा रहा है। हिंदी पट्टी में पेरियार-फुले-अंबेडकर का पुल: दक्षिण का पेरियार आंदोलन हिंदी में नहीं आ पाया, इसका कारण भाषा था। ललई सिंह ने उस पुल का काम किया। आज जब JNU से लेकर पटना यूनिवर्सिटी तक पेरियार-फुले-अंबेडकर स्टडी सर्कल बन रहे हैं, तो उनका सस्ता साहित्य और 26,000 पते वाला नेटवर्क आज के सोशल मीडिया नेटवर्क का पहला एनालॉग रूप लगता है। क्यों इनके विचारों को मानना चाहिए, क्योंकि उन्होंने सच को मीठा बनाकर नहीं, कड़वा रहने दिया। क्योंकि वे आपको मानसिक गुलामी से मुक्त करते हैं। ललई सिंह का पहला सवाल था – तुम कौन हो? ब्राह्मण ने तुम्हें शूद्र कहा, तुमने मान लिया। ग्रंथों ने तुम्हें नीच कहा, तुमने मान लिया। उन्होंने कहा – पहले अपना नाम वापस लो। इसीलिए उन्होंने खुद ‘यादव’ हटाया। उनका विचार मानना मतलब है – अपनी पहचान दूसरों के दिए सर्टिफिकेट से नहीं, अपने श्रम से तय करना। वे अर्जक संघ बनाते हैं – अर्जक मतलब जो अर्ज करके खाता है। किसान, मजदूर, कारीगर – यही असली मालिक है।
क्योंकि वे धर्म को डर से नहीं, तर्क से देखने को कहते हैं। उनका प्रसिद्ध नारा था – “शोषितों पर धार्मिक डकैती बंद करो।”
वे कहते थे – यदि भगवान है और वह न्यायी है, तो एक को ब्राह्मण के घर और दूसरे को भंगी के घर क्यों पैदा करता है? यदि कर्म का फल है, तो मंदिर का पुजारी बिना मेहनत के मालामाल क्यों है और खेत जोतने वाला भूखा क्यों है? उनके विचार मानना मतलब है – पाप-पुण्य, भाग्य-भगवान के धंधे से निकलकर अपने हक के लिए लड़ना। क्योंकि वे आपको किताबी नहीं, लड़ाकू बनाते हैं।
ललई सिंह सिर्फ लिखते नहीं थे, लड़ते थे। सरकार ने 4 बार उनकी किताबें जब्त कीं, उन पर राजद्रोह तक चला। वे हर बार कोर्ट गए। 7 साल मुकदमा लड़ा और जीते। उन्होंने सिखाया – विचार यदि सच्चा है तो सत्ता से डरो मत, अदालत में घसीटो। आज जब एक ट्वीट पर लोग डर जाते हैं, उनका जीवन बताता है कि अभिव्यक्ति की लड़ाई कैसे लड़ी जाती है। क्योंकि उनका रास्ता नफरत का नहीं, सम्मान का है। वे ब्राह्मण के विरोधी नहीं, ब्राह्मणवाद के विरोधी थे। इसीलिए उन्होंने बदला लेने के लिए तलवार नहीं उठाई, बौद्ध धम्म अपनाया। उन्होंने कहा – अपमानित होकर जीने से अच्छा है, सम्मान के लिए धर्म परिवर्तन करो। यह रास्ता हिंसा का नहीं, आत्म-सम्मान का है।
क्योंकि वे भविष्य की बात करते हैं। उनके दुश्मन अतीत में जीते हैं – रामराज्य, वैदिक काल। ललई सिंह भविष्य की बात करते हैं – शिक्षा, रोजगार, राजनीति में हिस्सेदारी। ललई सिंह के विचार मानना मतलब गुलाम बनकर जीने से इंकार करना। यदि आप चाहते हैं कि आपका बच्चा पुजारी के पैर छूने के बजाय अपने पैरों पर खड़ा हो, तो पेरियार ललई सिंह को मानना ही पड़ेगा।



