देश भर में फ़ैल गया छात्र आन्दोलन, सरकार समझदारी से काम ले नहीं तो पुब्लिक का गुस्सा तय है

राहुल गांधी के लगातार अच्छे शिक्षा पर परिश्रम और जंतर-मंतर से शुरू हुई युवा आवाज अब पूरे देश में गूंज रही है। NEET-UG 2026 परीक्षा के पेपर लीक, NTA की कथित लापरवाही, छात्रों की आत्महत्याएं और शिक्षा व्यवस्था की गहरी खामियां छात्रों, अभिभावकों और युवाओं के गुस्से को सड़कों पर उतार लाई हैं।

“Cockroach Janta Party” (CJP) के नेतृत्व में चला यह आंदोलन अब दिल्ली, पटना, चेन्नई, जयपुर, लखनऊ समेत दर्जनों शहरों में फैल चुका है। पुलिस लाठीचार्ज, आंसू गैस और हिरासत की घटनाओं ने इसे और भड़का दिया है। अगर सरकार अभी समझदारी नहीं दिखाती तो जनता का आक्रोश पूरे राजनीतिक परिदृश्य को बदल सकता है। देश के प्रमुख विश्वविद्यालयों से शुरू हुआ छात्र आंदोलन, 20 जुलाई के पुलिस कार्यवाही से आक्रोश अब पूरे भारत में आग की तरह फैल गया है। NEET धांधली , फीस वृद्धि, बेरोजगारी, शिक्षा का निजीकरण और नई शिक्षा नीति (NEP) के क्रियान्वयन में कथित कमियों के खिलाफ शुरू हुआ यह आंदोलन अब राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक स्तर पर गहरी चिंता का विषय बन गया है। छात्रों का कहना है कि यदि सरकार तुरंत समझदारी भरा रवैया नहीं अपनाती तो आम जनता का गुस्सा सड़कों पर उतर सकता है और स्थिति नियंत्रण से बाहर हो सकती है। दिल्ली विश्वविद्यालय, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU), जामिया मिल्लिया इस्लामिया, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, लखनऊ विश्वविद्यालय, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, मुंबई विश्वविद्यालय, हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय और IIT- IIM जैसे संस्थानों में छात्रों ने बड़े पैमाने पर प्रदर्शन किए। अनुमान है कि पूरे देश में 35 लाख से अधिक छात्र इस आंदोलन से जुड़े हुए हैं।

सब कुछ शुरू हुआ 3 मई 2026 को आयोजित NEET-UG परीक्षा से। देशभर के करीब 22 लाख छात्र-छात्राओं ने मेडिकल प्रवेश के लिए यह परीक्षा दी। कुछ दिनों बाद पेपर लीक की खबरें वायरल हो गईं। छापेमारी, गिरफ्तारियां हुईं, लेकिन NTA ने 12 मई को परीक्षा रद्द कर दी और 21 जून को री-टेस्ट कराया। इस बीच छात्रों का भविष्य अंधेरे में चला गया। कई छात्रों ने आत्महत्या कर ली। परिवारों ने कोचिंग फीस, यात्रा और सालों की मेहनत पर सवाल उठाए।यह सिर्फ एक परीक्षा का मुद्दा नहीं था। CUET, CBSE की ऑनलाइन मार्किंग में गड़बड़ियां, UGC-NET विवाद और बेरोजगारी ने आग में घी डाला। National Testing Agency (NTA) पर भरोसा टूट चुका है। शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग जोर पकड़ रही है।आंदोलन को नई ताकत मिली “Cockroach Janta Party” (CJP) से। सोशल मीडिया पर शुरू हुआ यह व्यंग्यात्मक आंदोलन जल्द ही सड़क पर उतर आया। “हम cockroach हैं, हम मरते नहीं” जैसे नारे युवाओं के बीच वायरल हो गए। अभिजीत दीपके जैसे युवा नेता और लद्दाख के पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने इसे राष्ट्रीय स्वरूप दिया। वांगचुक ने 28 जून से अनशन शुरू किया, जिसके बाद उन्हें अस्पताल ले जाया गया, लेकिन उन्होंने अनशन जारी रखने की घोषणा की।20 जुलाई को “चलो संसद” मार्च के दौरान दिल्ली में भारी पुलिस कार्रवाई हुई। लाठीचार्ज, आंसू गैस और हिरासत में राहुल गांधी समेत कई विपक्षी नेता भी आए। इससे आंदोलन की आग और भड़क गई।

दिल्ली के जंतर-मंतर पर हजारों युवा डटे हुए हैं। पटना में छात्रों ने राजभवन की ओर मार्च निकाला, जहां पथराव और पुलिस कार्रवाई हुई। चेन्नई, कोलकाता, बेंगलुरु, हैदराबाद, जयपुर और लखनऊ में भी प्रदर्शन हुए। बिहार, उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल में छात्र संगठन AISA, SFI और स्थानीय यूनियन सक्रिय हैं।अभिभावक भी सड़कों पर हैं। “हमने अपनी जमीन बेचकर कोचिंग फीस दी, अब परीक्षा ही लीक हो जाए तो क्या बचा?” – पटना की एक मां का यह सवाल हजारों परिवारों की पीड़ा बयां करता है।ग्रामीण क्षेत्रों से भी आवाजें उठ रही हैं। छोटे शहरों और कस्बों के छात्र बसों और ट्रेनों से दिल्ली पहुंच रहे हैं। सोशल मीडिया पर लाइव वीडियो, हैशटैग #JusticeForStudents और #PradhanResign ट्रेंड कर रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने भी कवरेज दिया है, जिससे सरकार पर दबाव बढ़ा है।

छात्रों की मुख्य मांगें: शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा, NTA का पुनर्गठन और पारदर्शी परीक्षा प्रक्रिया, पेपर लीक प्रभावित सभी छात्रों को मुआवजा और नई परीक्षा का विकल्प, शिक्षा बजट बढ़ाना (वर्तमान में कुल बजट का महज 2.5% के आसपास), बेरोजगारी कम करने के लिए कौशल विकास और रोजगार नीति, NEP 2020 की कुछ प्रावधानों पर पुनर्विचार, खासकर परीक्षा और मूल्यांकन प्रणाली। विपक्षी दलों ने इसे राजनीतिक रंग दिया है। कांग्रेस, AAP, RJD, SP और वामपंथी पार्टियां छात्रों के साथ खड़ी हैं। संसद के मानसून सत्र में हंगामा हो रहा है। राहुल गांधी ने कहा, “यह छात्रों का मुद्दा है, लेकिन सरकार इसे दबाना चाहती है। युवा भारत का भविष्य हैं, इन्हें कुचलना देश को कुचलना है।”सरकार का पक्ष: शिक्षा मंत्रालय ने कुछ गिरफ्तारियों और जांच समिति का हवाला दिया है। प्रधानमंत्री कार्यालय ने “समाधान” का आश्वासन दिया, लेकिन ठोस कदम अभी तक नहीं उठाए गए। कुछ BJP नेता इसे “विपक्ष की साजिश” और “विदेशी फंडिंग” बता रहे हैं, जो आंदोलनकारियों को और भड़का रहा है।

भारत में छात्र आंदोलन नई बात नहीं। 1970 के दशक में जयप्रकाश नारायण आंदोलन में छात्रों की भूमिका निर्णायक रही। 2010 के आसपास AFSPA, CAA-NRC विरोध में भी युवा सक्रिय थे। लेकिन 2026 का यह आंदोलन खास है क्योंकि यह Gen-Z का है – सोशल मीडिया से संचालित, विकेंद्रीकृत लेकिन शक्तिशाली।कोचिंग माफिया, पेपर लीक गिरोह और परीक्षा व्यवस्था की कमजोरियां पुरानी समस्या हैं। बिहार, UP, झारखंड जैसे राज्यों में पेपर लीक की घटनाएं सालों से हो रही हैं। NEET जैसे केंद्रीकृत परीक्षाओं ने दबाव बढ़ा दिया है। लाखों छात्र साल भर तैयारी करते हैं, एक गलती सब बर्बाद कर देती है।

भारत की युवा आबादी (15-29 वर्ष) करीब 35 करोड़ है। Demographic Dividend का फायदा उठाने के बजाय हम बेरोजगारी और फ्रस्ट्रेशन का सामना कर रहे हैं। CMIE डेटा के अनुसार शिक्षित युवाओं में बेरोजगारी दर ऊंची है। NEP 2020 ने बहु-विषयी शिक्षा का सपना दिखाया, लेकिन अमल में कमी है। शिक्षकों की भारी कमी, खाली पद, निजी संस्थानों का commercialization – सब मिलकर संकट गहरा रहा है।मध्यम वर्ग और निम्न-मध्यम वर्ग के परिवार सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। कोचिंग सेंटरों का कारोबार हजारों करोड़ का है। जब सिस्टम फेल होता है तो पूरा परिवार डूब जाता है।

विश्लेषकों का कहना है कि दमनकारी रणनीति उल्टी पड़ सकती है। समझदारी भरे कदमों की जरूरत है: स्वतंत्र जांच आयोग गठन (न्यायमूर्ति की अध्यक्षता में), NTA में बड़े सुधार – डिजिटल सुरक्षा, पारदर्शिता, छात्रों से सीधा संवाद,शिक्षा बजट दोगुना करने की समयबद्ध योजना, बेरोजगारी पर फोकस – MSME, स्टार्टअप और स्किल डेवलपमेंट। अगर सरकार इसे “राजनीतिक साजिश” मानकर नजरअंदाज करती रही तो आंदोलन हिंसक रूप ले सकता है या लंबा खिंच सकता है। विपक्ष इसे 2029 चुनाव का मुद्दा बना सकता है।

    जंतर-मंतर पर मिले एक छात्र ने कहा, “हम cockroach नहीं, हम भारत का भविष्य हैं। हमें कुचलने की कोशिश मत कीजिए।” एक अभिभावक बोले, “हम वोट देते हैं, टैक्स देते हैं, लेकिन हमारे बच्चों का भविष्य सुरक्षित नहीं तो किस काम की सरकार?”यह आंदोलन सिर्फ शिक्षा का नहीं, न्याय, जवाबदेही और भविष्य का है। सोनम वांगचुक, अभिजीत दीपके और हजारों अज्ञात छात्र इसकी मिसाल हैं।

    देश इस वक्त मोड़ पर है। एक तरफ युवा ऊर्जा, दूसरी तरफ सत्ता की जिद। अगर सरकार जल्द संवेदनशीलता दिखाती है तो यह आंदोलन सुधार का माध्यम बन सकता है। अन्यथा गुस्सा फैलता जाएगा और लोकतंत्र की नींव हिल सकती है।छात्र आंदोलन ने एक बार फिर साबित किया कि युवा चुप नहीं रहेंगे। वे बदलाव चाहते हैं। सरकार को सुनना होगा, वरना इतिहास गवाह है – जनता का गुस्सा कभी-कभी सत्ता बदल देता है।

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