अगर आंदोलन Millennials की होती तो गालीबाज़ आईटी सेल क्या करती । पिछले 12 साल से वो यही करती आई है।

पिछले एक दशक से भारतीय सोशल मीडिया और राजनीतिक विमर्श पर एक खास किस्म की संगठित मशीनरी का दबदबा रहा है। इस मशीनरी को आम बोलचाल में ‘आईटी सेल’ कहा जाता है, जिसका चेहरा अक्सर भाजपा के आईटी सेल प्रमुख अमित मालवीय को माना जाता है। इस सेल ने पिछले 12 वर्षों में नैरेटिव (विमर्श) सेट करने, विरोधियों को ट्रोल करने, मीम्स के जरिए उनकी छवि बिगाड़ने और किसी भी जन-आंदोलन को देशविरोधी या अप्रासंगिक साबित करने में महारत हासिल कर ली थी। लेकिन हालिया दौर के आंदोलनों ने इस अभेद्य किले में सेंध लगा दी है। यदि आज के इन आंदोलनों की कमान पूरी तरह से ‘मिलेनियल्स’ (1981-1996 के बीच जन्मे लोग) के हाथ में होती, तो शायद यह आईटी सेल उन्हें अब तक खदेड़कर रख चुकी होती। लेकिन इस बार मुकाबला ‘जनरेशन जेड’ या ‘जेन जेड’ (1997-2012 के बीच जन्मे लोग) से है, जिसने आईटी सेल के पूरे मैन्युअल को ही कबाड़ में बदल दिया है।

इस आंदोलन की कमान Gen Z के हाथ में थी। जो पैदा होते ही हाथ में फ़ोन उठा लिए थे। जिन्होंने उस फ़ोन के ज़रिए कोविड के ख़ाली समय में दुनिया एक्स्प्लोर कर ली थी। उन्होंने ख़ुद को वायरल करने के लिए इंस्टाग्राम के एल्गोरिथम के साथ खूब एक्सपेरिमेंट किए और सफल भी हुए। इन्हें न कैमरे के सामने आने में झिझक होती थी और न ही अपने कंटेंट के साथ कुछ भी एक्सपेरिमेंट करने से ये डरते थे। वायरल होने की सनक में इन्होंने नए-नए शब्द ईजाद किए। चूंकि रील जितनी छोटी उतनी ज़्यादा सफल, इसलिए इन्होंने शब्दों और विचारों के साथ ऐसा क्रिएटिव खेल खेला कि डेढ़ घंटे की कहानी डेढ़ मिनट में कह डालें। यही क्रिएटिविटी उनकी ताक़त बनी। यह समझने के लिए कि मिलेनियल्स इस लड़ाई में क्यों पिछड़ जाते, हमें मिलेनियल्स के मनोविज्ञान और आईटी सेल की कार्यप्रणाली को समझना होगा। मिलेनियल्स वह पीढ़ी है जिसने इंटरनेट को आते देखा है। वे डिजिटल दुनिया में सुसंस्कृत, तर्कसंगत और गंभीर होना चाहते हैं। जब अमित मालवीय की आईटी सेल किसी मिलेनियल नेता या आंदोलनकारी पर हमला करती है, तो वह अमूमन गंभीर होकर तथ्यों, डेटा और प्रेस कॉन्फ्रेंस के जरिए जवाब देने की कोशिश करता है।

आईटी सेल की ताकत तथ्यों में नहीं, बल्कि ‘अटेंशन इकॉनमी’ (ध्यान खींचने की होड़) और ‘शॉक वैल्यू’ (झटका देने वाली भाषा) में है। वे गाली-गलौज, डॉक्टर्ड वीडियो (छेड़छाड़ किए गए वीडियो) और व्यक्तिगत कीचड़ उछालने में माहिर हैं। मिलेनियल्स इस तरह के कीचड़-युद्ध के लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं होते। वे अवसाद में आ जाते हैं, स्पष्टीकरण देने लगते हैं या फिर सोशल मीडिया से दूरी बना लेते हैं। पिछले 12 साल का इतिहास गवाह है कि जब भी किसी मिलेनियल ने व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाई, आईटी सेल ने उसे ‘पप्पू’, ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ या ‘अर्बन नक्सल’ जैसे ठप्पों से इस कदर पाट दिया कि उनका मुख्य मुद्दा ही गायब हो गया। मिलेनियल्स बहस को तार्किक बनाना चाहते थे, जबकि आईटी सेल उसे एक कीचड़ प्रतियोगिता में बदल देती थी, जहां जीत हमेशा उसी की होती थी जिसके पास ज्यादा कीचड़ और फेंकने वाले हाथ (बॉट्स और पेड ट्रोल्स) होते थे।

जब अमित मालवीय की आईटी सेल के सैनिक Gen Z से टकराने आए तो उनके हथियार घिसे-पिटे और पुराने थे, जो हमेशा कॉन्सपिरेसी थ्योरी के इर्द-गिर्द ही घूमते थे। उनमें षड्यंत्र की कहानी होती थी, लोगों को बांधकर रखने वाली क्रिएटिविटी नहीं। ये पैटर्न Millennials और उससे पहले की बुढ़ऊ जनरेशन पर कारगर था। जब हम जैसे Millennials इस पैटर्न के झांसे में नहीं आते थे तो अमित मालवीय की ट्रोल आर्मी हमें गंदी-गंदी गालियां देकर मैदान छोड़ने के लिए मजबूर कर देती थी। हमारे अंदर शर्म और लिहाज जो अधिक था। मालवीय की आईटी सेल ने यही हथकंडा Gen Z पर अपनाया। मालवीय की सेना घंटों की मेहनत करके एक कॉन्सपिरेसी थ्योरी तैयार करती, जिसे मिनटों तक पढ़कर और देखकर समझना पड़ता। कई लोगों के पास तो इतना लंबा पढ़ने और देखने का समय ही नहीं होता। यहीं Gen Z खेल गए।

जितनी देर में मालवीय की सेना प्रोटेस्ट के ख़िलाफ़ एक कॉन्सपिरेसी थ्योरी तैयार करती, उतनी देर में Gen Z दर्जनों कंटेंट बनाकर वायरल कर देते। इनका 15-20 सेकंड का कंटेंट इतना ज़्यादा एंगेजिंग होता था कि लोग स्किप ही न कर सकें और हंसते-हंसते इनके फैन हो जाएं। मालवीय नफ़रत के साथ थ्रिलर खड़ा कर रहे थे, जिसे समझने के लिए दिमाग़ लगाना पड़ता। Gen Z मोहब्बत से कॉमेडी क्रिएट कर रहे थे, जिसे बस मजे से स्क्रॉल करते जाओ। डेढ़ घंटे की कहानी डेढ़ मिनट में कहने वाली शब्दों और विचारों की यही क्रिएटिविटी जंतर-मंतर पर Gen Z के पोस्टर्स और प्लेकार्ड में दिखी। ये पोस्टर्स और प्लेकार्ड भी खूब वायरल हुए और नैरेटिव को Gen Z के पक्ष में घुमा दिया। इन्होंने एंटी-नेशनल होने को भी क्रिएटिव रंग दे डाला। पाकिस्तान, सोरोस, सीआईए, चीन जैसे नैरेटिव को बुरी तरह अपनी क्रिएटिविटी से ध्वस्त कर दिया। आईटी सेल के इन नैरेटिव पर उन्होंने लोगों को हंसने के लिए मजबूर कर दिया।

अमित मालवीय की आईटी सेल 12 साल से अजेय थी। नैरेटिव अपने पक्ष में करने में अपनी इस हार से वह बौखला गए। जब वह बौखलाते हैं तो गालियों पर उतर आते हैं। लोगों का चरित्र हनन करते हैं। मालवीय की ट्रोल आर्मी का ये आख़िरी और सबसे कारगर हथियार होते है। ये हथियार उन्होंने Gen Z पर चलाया। उनके पहनावे को टारगेट किया, लड़कियों के लिए गंदे-गंदे शब्द इस्तेमाल किए। यहां भी Gen Z उनसे बाज़ी मार गए। ट्रोल आर्मी की मां-बहन की गालियों और चरित्र हनन के प्रयास पर उन्होंने अपनी क्रिएटिव गालियों से ऐसा काउंटर अटैक किया कि मालवीय की सेना को अपनी क्षमताओं पर शक होने लगे। इन गालियों का जवाब देने में हम Millennials झिझक जाते थे और पीछे हट जाते थे। Gen Z ने इन गालीबाज़ों को उनकी ही भाषा में खदेड़ा और ऐसी जगह संयुक्त हमला किया जो भाजपा की कमज़ोर नस थी यानी प्रधानमंत्री की छवि। जिसे उन्होंने हज़ारों करोड़ खर्च करके बनाया था। मालवीय की सेना Gen Z के अलग-अलग सोशल मीडिया अकाउंट, जंतर-मंतर से वायरल अलग-अलग रील और तस्वीरों को निशाना बना रही थी। Gen Z ने सिर्फ एक चेहरा पकड़ा और उसके ख़िलाफ़ क्रिएटिव तरीक़े से जितना गंदा बोल सकते थे, वो बोला। तरीका इतना ज़्यादा क्रिएटिव था कि सीधा दिल पर चोट करे।

ये काम कभी हम Millennials नहीं कर पाए क्योंकि हम प्रधानमंत्री पद का सम्मान कर लेते थे। लेकिन बगावती तेवर रखने वाले Gen Z ने सीधा प्रधानमंत्री को ही Accountable बनाकर उन पर हमला शुरू कर दिया। इसकी कल्पना न तो अमित मालवीय ने की थी, न भाजपा ने और न स्वयं प्रधानमंत्री ने। Gen Z की इसी एप्रोच ने मालवीय की आईटी सेल को परास्त कर दिया। भाजपा कुछ भी बर्दाश्त कर सकती थी, लेकिन मिस्टर नॉन-बायोलॉजिकल की साख पर बट्टा बिल्कुल नहीं लगने देती। ये आंदोलन अगर हफ़्ते भर और चल जाता तो Gen Z पता नहीं कि पंत प्रधान की इमेज के साथ और कितने एक्सपेरिमेंट करते।यह समझने के लिए कि मिलेनियल्स इस लड़ाई में क्यों पिछड़ जाते, हमें मिलेनियल्स के मनोविज्ञान और आईटी सेल की कार्यप्रणाली को समझना होगा। मिलेनियल्स वह पीढ़ी है जिसने इंटरनेट को आते देखा है। वे डिजिटल दुनिया में सुसंस्कृत, तर्कसंगत और गंभीर होना चाहते हैं। जब अमित मालवीय की आईटी सेल किसी मिलेनियल नेता या आंदोलनकारी पर हमला करती है, तो वह अमूमन गंभीर होकर तथ्यों, डेटा और प्रेस कॉन्फ्रेंस के जरिए जवाब देने की कोशिश करता है। आईटी सेल की ताकत तथ्यों में नहीं, बल्कि ‘अटेंशन इकॉनमी’ (ध्यान खींचने की होड़) और ‘शॉक वैल्यू’ (झटका देने वाली भाषा) में है।

वे गाली-गलौज, डॉक्टर्ड वीडियो (छेड़छाड़ किए गए वीडियो) और व्यक्तिगत कीचड़ उछालने में माहिर हैं। मिलेनियल्स इस तरह के कीचड़-युद्ध के लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं होते। वे अवसाद में आ जाते हैं, स्पष्टीकरण देने लगते हैं या फिर सोशल मीडिया से दूरी बना लेते हैं। पिछले 12 साल का इतिहास गवाह है कि जब भी किसी मिलेनियल ने व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाई, आईटी सेल ने उसे ‘पप्पू’, ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ या ‘अर्बन नक्सल’ जैसे ठप्पों से इस कदर पाट दिया कि उनका मुख्य मुद्दा ही गायब हो गया। मिलेनियल्स बहस को तार्किक बनाना चाहते थे, जबकि आईटी सेल उसे एक कीचड़ प्रतियोगिता में बदल देती थी, जहां जीत हमेशा उसी की होती थी जिसके पास ज्यादा कीचड़ और फेंकने वाले हाथ (बॉट्स और पेड ट्रोल्स) होते थे। इसके विपरीत, आज की युवा पीढ़ी यानी जेन जेड पूरी तरह से डिजिटल नेटिव है। यह वह पीढ़ी है जो हाथ में स्मार्टफोन लेकर ही पैदा हुई है। इनके लिए सोशल मीडिया कोई सूचना का माध्यम नहीं, बल्कि उनकी जीवनशैली का हिस्सा है। सबसे बड़ा अंतर यह है कि जेन जेड ‘अथॉरिटी’ (सत्ता या व्यवस्था) से डरती नहीं है, और न ही वह खुद को बहुत गंभीर दिखाने की कोशिश करती है।

हालिया आंदोलनों में यह साफ देखा गया है कि जब पुलिस की लाठियां चल रही होती हैं या आंसू गैस के गोले छोड़े जा रहे होते हैं, तब भी यह पीढ़ी सड़कों पर रील्स बना रही होती है या ‘मूनवॉक’ (माइकल जैक्सन का प्रसिद्ध डांस स्टेप) कर रही होती है। यह कोई गैर-जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि यह प्रतिरोध का एक नया, अनूठा और बेहद खतरनाक रूप है। वे गंभीर और भारी-भरकम राजनीतिक बहसों को ‘शिpost’ (व्यंग्यात्मक और बेतुकी पोस्ट), मीम्स और पॉप-कल्चर के संदर्भों में बदल देते हैं। अमित मालवीय की आईटी सेल का सबसे बड़ा हथियार था ‘ट्रोलिंग’ और ‘कैरेक्टर एसासिनेशन’ (चरित्र हनन)। लेकिन जेन जेड को आप कैसे ट्रोल करेंगे जो खुद को पहले से ही ‘ब्रोक’ (कंगाल), ‘एंजाइटी से पीड़ित’ और ‘अराजक’ घोषित कर चुकी है? जब आईटी सेल इन युवाओं को देशद्रोही या भटका हुआ कहती है, तो ये युवा उस पर रोने या सफाई देने के बजाय उस टैग का ही मीम बना देते हैं।

यदि आईटी सेल एक ट्रेंड चलाती है, तो जेन जेड अपनी रचनात्मकता से उस हैशटैग को ही हाईजैक कर लेती है। वे गंभीर राजनीतिक आरोपों का जवाब ‘K’ (ओके का संक्षिप्त रूप), ‘Who asked?’ (किसने पूछा?) या फिर किसी बिल्ली के नाचने वाले गिफ (GIF) से देते हैं। यह रवैया आईटी सेल के ट्रोल्स को पूरी तरह से लाचार और बौना बना देता है। ट्रोल्स का पूरा अस्तित्व इस बात पर टिका होता है कि सामने वाला उनकी बात से आहत हो, गुस्सा हो या डरे। लेकिन जब सामने वाली पीढ़ी हंसने लगे और नाचने लगे, तो ट्रोल्स का गुस्सा मजाक बन जाता है। पिछले 12 वर्षों में आईटी सेल ने ट्विटर (अब एक्स) और फेसबुक के एल्गोरिदम को हैक करना सीख लिया था। वे एक खास समय पर हजारों अकाउंट्स से एक ही ट्वीट करवाकर ट्रेंड सेट कर देते थे। लेकिन जेन जेड मुख्य रूप से इंस्टाग्राम, टिकटॉक (वैश्विक स्तर पर) और डिस्कॉर्ड जैसे प्लेटफॉर्म्स पर सक्रिय है, जहां का एल्गोरिदम केवल पैसे या बॉट्स से नियंत्रित नहीं होता, बल्कि वह ‘एंगेजमेंट’ और ‘क्रिएटिविटी’ (रचनात्मकता) मांगता है।

जेन जेड का आंदोलन किसी एक केंद्रीय नेता के इशारे पर नहीं चलता। यह एक विकेंद्रीकृत (Decentralized) नेटवर्क है। अमित मालवीय की टीम किसी एक मिलेनियल नेता को निशाना बनाकर उसकी छवि खराब कर सकती है, लेकिन वे उन लाखों अज्ञात किशोरों और युवाओं का क्या करेंगे जो अपने कमरों में बैठकर ऐसे मीम्स बना रहे हैं जो रातों-रात लाखों लोगों तक पहुंच जाते हैं? इस पीढ़ी ने सूचना के प्रसारण को इतना तेज और दृश्य (Visual) बना दिया है कि आईटी सेल के लंबे-चौड़े नैरेटिव्स को पढ़ने का समय अब किसी के पास नहीं है।

यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि यदि आज की तारीख में भी आंदोलन पुराने ढर्रे पर, मिलेनियल्स की सोची-समझी और सलीकेदार रणनीतियों से चल रहे होते, तो अमित मालवीय की ‘गालीबाज़ आईटी सेल’ उन्हें राष्ट्रवाद के भारी-भरकम डोज और फेक न्यूज के मलबे के नीचे दबा चुकी होती। मिलेनियल्स प्रक्रिया और मर्यादा में विश्वास करते थे, जो इस डिजिटल युग के क्रूर राजनीतिक युद्ध में उनकी कमजोरी बन गई। लेकिन जेन जेड ने खेल के नियम ही बदल दिए हैं। वे मर्यादा की परवाह नहीं करते क्योंकि वे जानते हैं कि उनके सामने खड़ी मशीनरी अमर्यादित है। उन्होंने भय को कौतुक में और दमन को रील्स में बदल दिया है। पिछले 12 साल से जो आईटी सेल अजेय नजर आ रही थी, वह आज इन युवाओं के स्मार्टफोन स्क्रीन के सामने हांफती हुई दिखाई दे रही है। यह इस बात का संकेत है कि भारत में डिजिटल प्रतिरोध का एक नया युग शुरू हो चुका है, जहां नैरेटिव की कमान अब किसी बंद कमरे में बैठे राजनीतिक मैनेजरों के हाथ में नहीं, बल्कि सड़क पर मूनवॉक करते हुए एक बेपरवाह युवा के हाथ में है।

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