इंडिया मोबाइल कांग्रेस-2026 लक्ष्य बड़े, रफ्तार धीमी : दुनिया की डिजिटल दौड़ में भारत पीछे!

रितेश सिन्हा

नई दिल्ली में केंद्रीय संचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने इंडिया मोबाइल कांग्रेस (आईएमसी)-2026 के 10वें संस्करण की थीम “सीमाओं के बिना विस्तार” का शुभारंभ किया। मंच से भारत को 5जी, 6जी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, क्वांटम प्रौद्योगिकी और डिजिटल नवाचार का वैश्विक नेतृत्वकर्ता बनाने का संकल्प दोहराया गया। यह दृष्टि महत्वाकांक्षी है और देश के तकनीकी भविष्य के लिए आवश्यक भी। लेकिन किसी भी सरकार या मंत्री का मूल्यांकन घोषणाओं से नहीं, बल्कि उनके ठोस परिणामों से होता है। संचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कहा कि देश में दूरसंचार क्षेत्र में बड़े पैमाने पर निवेश हुआ है, लाखों टावर स्थापित हुए हैं और करोड़ों लोग 5जी सेवाओं से जुड़े हैं। उन्होंने 6जी में भारत की वैश्विक भूमिका की भी चर्चा की। लेकिन इन दावों के साथ कुछ बुनियादी प्रश्न भी खड़े होते हैं। क्या देश के हर जिले में उच्च गुणवत्ता वाली 5जी सेवा उपलब्ध है? क्या ग्रामीण भारत, सीमावर्ती क्षेत्रों और पहाड़ी राज्यों तक समान गुणवत्ता की डिजिटल कनेक्टिविटी पहुंची है? क्या उपभोक्ताओं को वास्तव में वह सेवा मिल रही है जिसकी घोषणा मंचों से की जाती है?

भारत आज दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा दूरसंचार बाजार है। डिजिटल भुगतान, यूपीआई और इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। यह उपलब्धियां महत्वपूर्ण हैं। लेकिन दूसरी ओर, अमेरिका कृत्रिम बुद्धिमत्ता, क्लाउड कंप्यूटिंग और चिप डिजाइन में अग्रणी है; चीन दूरसंचार उपकरण और इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण में मजबूत स्थिति रखता है; दक्षिण कोरिया और जापान नेटवर्क गुणवत्ता और उच्च गति ब्रॉडबैंड में लंबे समय से अग्रणी रहे हैं। भारत अभी भी उन्नत चिप, दूरसंचार उपकरण और कई मूलभूत तकनीकों के लिए आयात पर निर्भर है। संचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के कार्यकाल में 5जी विस्तार की गति तेज हुई है, लेकिन विस्तार और गुणवत्ता दोनों समान नहीं हैं। अनेक उपभोक्ता अब भी कॉल ड्रॉप, नेटवर्क अस्थिरता और वास्तविक डेटा गति को लेकर शिकायत करते हैं। यदि डिजिटल क्रांति का लाभ अंतिम व्यक्ति तक समान रूप से नहीं पहुंचता, तो केवल निवेश और टावरों के आंकड़े पर्याप्त नहीं माने जा सकते।

इंडिया मोबाइल कांग्रेस जैसे भव्य आयोजन भारत की तकनीकी क्षमता प्रदर्शित करने का अवसर हैं, लेकिन प्रश्न यह है कि इन आयोजनों के परिणामस्वरूप कितनी स्वदेशी तकनीक वैश्विक बाजार तक पहुंची? कितने भारतीय दूरसंचार उत्पाद विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धी बने? कितने भारतीय स्टार्टअप मूल नेटवर्क तकनीक, सेमीकंडक्टर, साइबर सुरक्षा और दूरसंचार उपकरण निर्माण में वैश्विक पहचान बना पाए? इन प्रश्नों के उत्तर ही किसी भी डिजिटल नीति की वास्तविक सफलता तय करेंगे। सरकार 6जी में नेतृत्व की बात करती है, जबकि विश्व के कई देश वर्षों से 6जी अनुसंधान, पेटेंट और मानकीकरण पर निरंतर कार्य कर रहे हैं। भारत ने भारत-6जी गठबंधन जैसी पहलें शुरू की हैं, जो सकारात्मक कदम हैं, लेकिन केवल लक्ष्य घोषित कर देने से नेतृत्व स्थापित नहीं होता। इसके लिए अनुसंधान एवं विकास, विश्वविद्यालयों, उद्योग और स्टार्टअप के बीच गहरा सहयोग, उच्च निवेश और स्वदेशी बौद्धिक संपदा का निर्माण आवश्यक है।

डिजिटल इंडिया की सबसे बड़ी चुनौती आज भी डिजिटल असमानता है। महानगरों और छोटे कस्बों के बीच इंटरनेट की गुणवत्ता में स्पष्ट अंतर दिखाई देता है। कई ग्रामीण विद्यालयों, स्वास्थ्य केंद्रों और पंचायतों में डिजिटल सेवाएं अभी भी सीमित हैं। जब तक डिजिटल अवसंरचना का लाभ अंतिम व्यक्ति तक नहीं पहुंचेगा, तब तक डिजिटल समावेशन का लक्ष्य अधूरा रहेगा। साइबर सुरक्षा भी उतनी ही गंभीर चुनौती है। जैसे-जैसे डिजिटल सेवाएं बढ़ रही हैं, वैसे-वैसे साइबर अपराध, ऑनलाइन वित्तीय धोखाधड़ी और डेटा सुरक्षा से जुड़े जोखिम भी बढ़ रहे हैं। इसलिए डिजिटल विस्तार के साथ-साथ सुरक्षा ढांचे को भी समान गति से मजबूत करना होगा।

आज भारत के सामने चुनौती केवल दुनिया का सबसे बड़ा डिजिटल बाजार बने रहने की नहीं है, बल्कि दुनिया का सबसे बड़ा डिजिटल नवोन्मेषक बनने की है। जब तक देश में स्वदेशी दूरसंचार तकनीक, सेमीकंडक्टर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, साइबर सुरक्षा और नेटवर्क उपकरणों का मजबूत पारिस्थितिकी तंत्र विकसित नहीं होगा, तब तक वैश्विक नेतृत्व का दावा अधूरा ही रहेगा। चिंता उन हजारों युवा उद्यमियों की है, जो नई तकनीक और नवाचार के साथ देश का भविष्य बदलना चाहते हैं। वे आज भी जटिल नीतिगत प्रक्रियाओं, सीमित वित्तीय सहायता, अनुसंधान अवसंरचना की कमी, सरकारी खरीद में प्रवेश की कठिनाइयों और बड़ी कंपनियों के दबदबे जैसी चुनौतियों से जूझ रहे हैं। यदि यही स्थिति बनी रही तो भारत के अनेक प्रतिभाशाली स्टार्टअप अपने उत्पाद और तकनीक को विदेशों में स्थापित करने को मजबूर होंगे, जबकि देश केवल विदेशी तकनीकों का उपभोक्ता बनकर रह जाएगा।

सिंधिया के सामने अब वास्तविक परीक्षा शुरू होती है। इंडिया मोबाइल कांग्रेस के मंच से 6जी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और वैश्विक नेतृत्व के जो सपने दिखाए गए हैं, उन्हें अब नीतियों, बजटीय प्राथमिकताओं और जमीनी परिणामों में बदलकर दिखाना होगा। इंडिया मोबाइल कांग्रेस-2026 की सफलता का वास्तविक पैमाना अक्टूबर के चार दिन नहीं होंगे, बल्कि उसके बाद के चार वर्ष होंगे।सरकार केवल सम्मेलन, थीम और घोषणाओं तक सीमित न रहे, बल्कि सेवा की गुणवत्ता, अनुसंधान निवेश, स्वदेशी तकनीक, वैश्विक पेटेंट, नेटवर्क विश्वसनीयता और डिजिटल समावेशन जैसे मानकों पर भी सार्वजनिक जवाबदेही सुनिश्चित करे। यही किसी भी डिजिटल महाशक्ति की वास्तविक पहचान होगी।

ज्योतिरादित्य सिंधिया के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वे 5जी के विस्तार से आगे बढ़कर भारत को स्वदेशी तकनीक, उच्च गुणवत्ता वाली डिजिटल अवसंरचना, साइबर सुरक्षा, अनुसंधान और नवाचार के क्षेत्र में वास्तविक वैश्विक प्रतिस्पर्धा तक पहुंचाएं। यदि आने वाले वर्षों में इन क्षेत्रों में ठोस परिवर्तन दिखाई देते हैं, तो उनके दावों को सफलता माना जाएगा; अन्यथा बड़े लक्ष्य और भव्य आयोजन केवल घोषणाओं तक सीमित रह जाने का जोखिम उठाएंगे।

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