बिहार का उद्योग अभियान: रोजगार का वादा या वसूली का रास्ता?

बेरोजगारी को अवसर नहीं, वसूली का बाजार बना देने वाले तंत्र, मंत्री ही नहीं, आईएएस से भी सवाल! रितेश सिन्हा

बिहार में उद्योग और निवेश को लेकर सरकार लगातार बड़े दावे कर रही है। निवेश आएगा, कारखाने खुलेंगे, उत्पादन बढ़ेगा और युवाओं को रोजगार मिलेगा—यह तस्वीर सरकार की औद्योगिक घोषणाओं में लगातार दिखाई देती है। लेकिन जुलाई 2026 तक उपलब्ध आंकड़ों को सामने रखकर देखें तो अब सवाल घोषणाओं से ज्यादा उनके परिणाम पर खड़ा होता है। कितने निवेश प्रस्ताव आए, कितनों को मंजूरी मिली, कितनों को जमीन मिली, कितनी परियोजनाएं निर्माण तक पहुंचीं, कितनी उत्पादन में आईं और आखिर कितने बिहारियों को वास्तविक और स्थायी रोजगार मिला? बिहार उद्योग विभाग का मूल दायित्व ही राज्य में औद्योगिक एवं उद्यमिता विकास और रोजगार सृजन से जुड़ा है। अब विभाग से केवल निवेश प्रस्तावों की संख्या नहीं, बल्कि प्रस्ताव से उत्पादन तक पहुंचने की पूरी तस्वीर मांगना जरूरी है। जुलाई 2026 तक विभागीय नेतृत्व में उद्योग मंत्री श्रेयसी सिंह और उद्योग सचिव कुंदन कुमार, आईएएस की जिम्मेदारी बनती है कि वे जनता के सामने यह स्पष्ट करें कि घोषित निवेश में से जमीन पर कितना उतरा।

वित्तीय वर्ष 2025-26 में बिहार को 747 निवेश प्रस्ताव प्राप्त हुए, जिनमें करीब 17,217 करोड़ रुपये के निवेश की बात कही गई। इसी अवधि में बीआइएडीए के माध्यम से 317 निवेशकों को लगभग 404 एकड़ भूमि आवंटित की गई। इन आवंटनों से लगभग 5,500 करोड़ रुपये के संभावित निवेश और 22,500 से अधिक रोजगार पैदा होने की संभावना बताई गई। आंकड़े आकर्षक हैं, लेकिन यहां सबसे महत्वपूर्ण अंतर समझना होगा—निवेश प्रस्ताव निवेश नहीं होता, संभावित रोजगार वास्तविक नौकरी नहीं होता और भूमि आवंटन उत्पादन नहीं होता। 747 प्रस्तावों में से कितने वास्तव में निवेश में बदले? कितने उद्यमियों ने पूंजी लगाई? कितनों ने निर्माण शुरू किया? कितनों में मशीनें लगीं? कितनी इकाइयां उत्पादन में आईं? और कितने रोजगार वास्तव में सृजित हुए? सरकार को प्रत्येक परियोजना की स्थिति सार्वजनिक करनी चाहिए। यदि ऐसा नहीं होता तो निवेश प्रस्तावों की बड़ी संख्या केवल सरकारी उपलब्धि का आंकड़ा बनकर रह जाएगी।

मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की जवाबदेही इस पूरे औद्योगिक अभियान में सबसे ऊपर बनती है। अप्रैल 2026 में मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने विधानसभा में बताया कि बिहार में 1.36 लाख करोड़ रुपये का निवेश आ चुका है और अगले एक वर्ष में यह आंकड़ा 5 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है। मुख्यमंत्री के स्तर से किया गया यह बड़ा दावा अब जुलाई 2026 तक के वास्तविक आंकड़ों से परखा जाना चाहिए। कितना निवेश जमीन पर आया? कितनी परियोजनाओं में निर्माण शुरू हुआ? कितने कारखाने उत्पादन में पहुंचे? और कितने रोजगार वास्तव में बने? यहीं मुख्यमंत्री के दावे और विभागीय आंकड़ों के बीच स्पष्टता जरूरी हो जाती है। एक तरफ मुख्यमंत्री 1.36 लाख करोड़ रुपये के निवेश की बात करते हैं और इसे अगले एक वर्ष में 5 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचाने की संभावना बताते हैं, दूसरी तरफ वित्तीय वर्ष 2025-26 में उद्योग विभाग 747 निवेश प्रस्तावों और लगभग 17,217 करोड़ रुपये के प्रस्तावित निवेश का आंकड़ा देता है। इन आंकड़ों में अंतर क्यों है? क्या मुख्यमंत्री के आंकड़े एमओयू, आशय पत्र और प्रस्तावित निवेश को भी शामिल करते हैं? कितना पैसा वास्तव में परियोजनाओं में लगा? सरकार को यह अंतर जनता के सामने स्पष्ट करना चाहिए।

मुख्यमंत्री के स्तर पर केवल निवेश का लक्ष्य घोषित करना पर्याप्त नहीं है। यदि सरकार अगले पांच वर्षों में 50 लाख करोड़ रुपये के निवेश और एक करोड़ रोजगार का लक्ष्य रखती है तो मुख्यमंत्री कार्यालय को इसकी नियमित निगरानी भी करनी चाहिए। हर 6 महीने में परियोजनाओं की समीक्षा हो और उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए। किस जिले में कितनी परियोजनाएं आईं, कितनी जमीन दी गई, कितना वास्तविक निवेश हुआ, कितने उद्योग उत्पादन में पहुंचे और कितने रोजगार बने—इनका पूरा हिसाब मुख्यमंत्री कार्यालय के स्तर पर उपलब्ध होना चाहिए। बड़ा सवाल बिहार की सिंगल विंडो व्यवस्था को लेकर है। केंद्र सरकार को दिए गए आधिकारिक उत्तर के अनुसार बिहार के सिंगल विंडो पोर्टल पर लगभग 1,248 नए निवेश प्रस्तावों को चरण-1 स्वीकृति मिली थी। लेकिन उसी जवाब में कार्यरत इकाइयों की संख्या 2023-24 में 108, 2024-25 में 145 और 2025-26 में केवल 9 बताई गई। यानी एक तरफ स्वीकृतियों का बड़ा आंकड़ा है और दूसरी तरफ वास्तविक रूप से काम कर रही इकाइयों का बेहद छोटा आंकड़ा। सवाल स्वाभाविक है—1,248 चरण-1 स्वीकृतियों के मुकाबले 2025-26 में केवल 9 कार्यरत इकाइयां क्यों?

उद्योग लगाने की प्रक्रिया में जमीन, बिजली, सड़क, पानी, पर्यावरण मंजूरी, वित्त और कई अन्य स्वीकृतियां जरूरी होती हैं। यदि इनमें से किसी स्तर पर महीनों की देरी होती है तो उसकी जिम्मेदारी केवल उद्यमी की नहीं हो सकती। यदि सिंगल विंडो व्यवस्था बनाई गई है और प्रत्येक स्वीकृति के लिए समयसीमा तय है तो निर्धारित अवधि में निर्णय नहीं होने पर संबंधित अधिकारी की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए। उद्योग मंत्री श्रेयसी सिंह से यह पूछा जाना स्वाभाविक है कि विभाग की घोषित औद्योगिक नीति का जमीन पर परिणाम क्या है। उद्योग सचिव कुंदन कुमार, आईएएस से यह पूछा जाना चाहिए कि 747 प्रस्तावों में से कितनी परियोजनाएं वास्तविक निवेश में बदलीं, 404 एकड़ आवंटित भूमि में से कितनी भूमि पर निर्माण शुरू हुआ और 22,500 से अधिक संभावित रोजगार में से कितने वास्तविक रोजगार बने। यह किसी अधिकारी या मंत्री पर आरोप नहीं, बल्कि उस विभाग के राजनीतिक और प्रशासनिक नेतृत्व से सार्वजनिक जवाबदेही की मांग है।

बीआइएडीए की भूमिका भी इसी कसौटी पर देखी जानी चाहिए। किसी निवेशक को जमीन आवंटित करना औद्योगिक विकास की अंतिम उपलब्धि नहीं है। असली उपलब्धि तब होगी जब उस जमीन पर निर्माण शुरू हो, मशीनें लगें, उत्पादन हो और रोजगार पैदा हो। इसलिए प्रत्येक भूमि आवंटन का विवरण सार्वजनिक होना चाहिए—किस कंपनी को कितनी जमीन मिली, किस दर पर मिली, कितनी रियायत मिली, निवेश की शर्त क्या थी, रोजगार का लक्ष्य कितना था, निर्माण कब शुरू होना था और यदि निर्धारित समय में परियोजना शुरू नहीं हुई तो जमीन वापसी की क्या कार्रवाई हुई। सरकारी जमीन जनता की संपत्ति है। जमीन के साथ निवेश और रोजगार की बाध्यकारी शर्तें जुड़नी चाहिए। यदि किसी कंपनी को रियायती दर पर जमीन दी गई है और वह निर्धारित समय में परियोजना शुरू नहीं करती तो जमीन वापसी और सरकारी प्रोत्साहन की समीक्षा की व्यवस्था होनी चाहिए। दूसरी तरफ यदि निवेशक ने सभी शर्तें पूरी कर दीं और सरकारी विभाग की देरी के कारण परियोजना अटकी तो जिम्मेदारी संबंधित अधिकारी की भी तय होनी चाहिए।

यहीं से देरी और संभावित वसूली का सवाल सामने आता है। किसी अधिकारी पर बिना प्रमाण भ्रष्टाचार का आरोप लगाना उचित नहीं होगा, लेकिन यह भी सच है कि लंबी, जटिल और अपारदर्शी प्रशासनिक प्रक्रिया बिचौलियों के लिए जगह पैदा करती है। यदि उद्यमी को यह पता ही न हो कि उसकी फाइल किस अधिकारी के पास है, निर्णय कब होगा और देरी की शिकायत कहां करनी है, तो अनौपचारिक माध्यमों की भूमिका बढ़ सकती है। बिहार सरकार को ऐसी व्यवस्था बनानी होगी जिसमें देरी वसूली का अवसर न बन सके। प्रत्येक आवेदन को ऑनलाइन ट्रैकिंग नंबर मिले। फाइल किस अधिकारी के पास है, यह दिखाई दे। कितने दिन से फाइल लंबित है, यह सार्वजनिक हो। निर्धारित समयसीमा खत्म होते ही मामला स्वतः अगले स्तर पर पहुंचे। शिकायत करने वाले उद्यमी की पहचान सुरक्षित रखी जाए और यदि किसी सरकारी काम के बदले अवैध राशि मांगने की शिकायत आती है तो उसकी स्वतंत्र जांच हो।

जून 2026 में बिहार सरकार ने औद्योगिक निवेश प्रस्तावों के लिए 30 दिन के भीतर स्वीकृति देने और समयसीमा में निर्णय नहीं होने पर डीम्ड क्लीयरेंस की दिशा में सुधार की घोषणा की। अब असली सवाल इसके क्रियान्वयन का है। कितने आवेदन 30 दिन में निपटे? कितने लंबित हैं? कितने मामलों में डीम्ड क्लीयरेंस हुआ? कितने निवेशकों को वास्तव में इस व्यवस्था का लाभ मिला? कागज पर समयसीमा और जमीन पर समयसीमा में अंतर नहीं होना चाहिए। जुलाई 2026 में बिहार सरकार ने औद्योगिक क्षेत्रों के विकास, भूमि अधिग्रहण और आधारभूत संरचना के लिए 25,000 करोड़ रुपये तक का वित्त पोषण प्राप्त करने के लिए आधारभूत संरचना विकास प्राधिकरण को अधिकृत किया। इसी अवधि में बिहार औद्योगिक निवेश प्रोत्साहन पैकेज 2025 की अवधि को 31 दिसंबर 2026 अथवा नई औद्योगिक निवेश प्रोत्साहन नीति लागू होने तक बढ़ाने का निर्णय भी हुआ। इतने बड़े वित्तीय प्रावधान के बाद इस धन से कितनी भूमि विकसित हुई, कितने औद्योगिक क्षेत्र तैयार हुए और कितने उद्योग वहां पहुंचे।

औद्योगिक भूमि के विस्तार के लिए दरभंगा में 385.45 एकड़, औरंगाबाद में 441.79 एकड़, अरवल में 61.24 एकड़ तथा मधुबनी में 712.94 एकड़ भूमि से जुड़े अधिग्रहण और वित्तीय प्रावधान दर्ज किए गए हैं। इसका अर्थ है कि औद्योगिक भूमि और आधारभूत ढांचे पर सरकार बड़े पैमाने पर संसाधन लगा रही है। भूमि अधिग्रहण औद्योगिकीकरण का पहला कदम है, अंतिम उपलब्धि नहीं। अब यह देखना होगा कि इस भूमि पर वास्तविक उद्योग कितनी तेजी से आते हैं। बिहार सरकार ने अगले 5 वर्षों में 50 लाख करोड़ रुपये का निवेश आकर्षित करने और 1 करोड़ रोजगार सृजित करने का लक्ष्य रखा है। लक्ष्य महत्वाकांक्षी है, लेकिन इसकी विश्वसनीयता तभी बनेगी जब सरकार साल-दर-साल और परियोजना-दर-परियोजना इसकी प्रगति सार्वजनिक करे। 50 लाख करोड़ का लक्ष्य घोषित करना आसान है; उसके लिए वास्तविक निवेश, उत्पादन क्षमता, उद्योगों की संख्या और रोजगार की निगरानी करना कठिन काम है।

बिहार में उद्यमियों की कमी नहीं है। केंद्रीय एमएसएमई मंत्रालय के राज्यवार आंकड़ों के अनुसार बिहार में 21,85,530 उद्यम पंजीकरण हैं। इनमें 21,71,100 सूक्ष्म, 13,764 लघु और 666 मध्यम उद्यम शामिल हैं। इसके अतिरिक्त उद्यम सहायता मंच पर 27,40,815 अनौपचारिक सूक्ष्म उद्यम दर्ज हैं। दोनों को मिलाकर आंकड़ा 49,26,345 तक पहुंचता है। उद्यम और उद्यम सहायता मंच के आंकड़ों में बड़ी संख्या में सूक्ष्म और अनौपचारिक उद्यम शामिल हैं। इसलिए सरकार को यह भी बताना चाहिए कि इनमें से कितने सक्रिय हैं, कितनों का कारोबार बढ़ा, कितनों को बैंक ऋण मिला, कितने सरकारी खरीद से जुड़े और कितनों ने अतिरिक्त रोजगार पैदा किया। पंजीकरण उद्यमिता का प्रमाण है, लेकिन उत्पादन और आय उसकी सफलता का वास्तविक प्रमाण हैं। मुख्यमंत्री उद्यमी योजना जैसी योजनाओं के मामले में भी यही कसौटी लागू होनी चाहिए। सरकार को केवल यह नहीं बताना चाहिए कि कितने लाभार्थियों को सहायता दी गई। उसे यह बताना चाहिए कि कितनों ने वास्तव में इकाई स्थापित की, कितनी इकाइयां चालू हैं, कितनों ने उत्पादन शुरू किया, कितने उद्यम बंद हो गए और कुल कितने रोजगार पैदा हुए।

बिहार की औद्योगिक चुनौती केवल पटना की समस्या नहीं है। केंद्र के एमएसएमई मंत्रालय की भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका है। जुलाई 2026 तक केंद्रीय एमएसएमई मंत्रालय का नेतृत्व केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी और मंत्रालय के सचिव भारत खेड़ा, आईएएस है। बिहार के लगभग 49 लाख उद्यमों और अनौपचारिक सूक्ष्म उद्यमों को केंद्रीय योजनाओं का कितना वास्तविक लाभ मिला, इसका राज्यवार हिसाब भी सामने आना चाहिए। केंद्र के एमएसएमई डैशबोर्ड पर जुलाई 2026 तक देशभर में 8.946 करोड़ से अधिक उद्यम पंजीकरण, करीब 39.58 करोड़ रोजगार, 1.47 करोड़ से अधिक ऋण गारंटी और लगभग 14.69 लाख करोड़ रुपये के गारंटी मूल्य का आंकड़ा दर्ज था। इन राष्ट्रीय आंकड़ों के बीच बिहार की हिस्सेदारी कितनी है, कितने बिहार के एमएसएमई को ऋण मिला और कितने कारोबार छोटे स्तर से आगे बढ़ पाए—इसका स्पष्ट राज्यवार मूल्यांकन होना चाहिए। बिहार को अब एक सार्वजनिक औद्योगिक परियोजना निगरानी पोर्टल बनाना चाहिए। प्रत्येक परियोजना का नाम, कुल निवेश, भूमि का क्षेत्रफल, भूमि की कीमत, सरकारी प्रोत्साहन, वास्तविक निवेश, निर्माण की स्थिति, उत्पादन की स्थिति, रोजगार का लक्ष्य, वास्तविक रोजगार और स्थानीय रोजगार का आंकड़ा सार्वजनिक होना चाहिए। बिहार में ‘देरी’ और ‘वसूली’ के बीच की संभावित जगह खत्म हो सकती है। जब पूरी प्रक्रिया ऑनलाइन होगी, अधिकारी की जिम्मेदारी दर्ज होगी और हर फाइल की समयसीमा दिखाई देगी तो उद्यमी को किसी बिचौलिये पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं होगी। जवाबदेही में केवल बिहार के मंत्री और अधिकारी ही नहीं, केंद्र भी शामिल होना चाहिए। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी से राज्य के बड़े निवेश दावों और औद्योगिक लक्ष्यों का हिसाब होना चाहिए। उद्योग मंत्री श्रेयसी सिंह से राज्य की औद्योगिक नीति के परिणाम का हिसाब होना चाहिए। उद्योग सचिव कुंदन कुमार, आईएएस से विभागीय क्रियान्वयन और स्वीकृतियों की गति का हिसाब होना चाहिए। बीआइएडीए से भूमि आवंटन और उसके वास्तविक उपयोग का हिसाब होना चाहिए। दिल्ली में केंद्रीय एमएसएमई मंत्री जीतन राम मांझी तथा सचिव भारत खेड़ा, आईएएस से बिहार के एमएसएमई को केंद्रीय योजनाओं का वास्तविक लाभ मिलने का हिसाब होना चाहिए। बिहार में खाद्य प्रसंस्करण, कपड़ा, चमड़ा, इलेक्ट्रॉनिक्स, लॉजिस्टिक्स, सूचना प्रौद्योगिकी, स्वास्थ्य, शिक्षा, नवीकरणीय ऊर्जा और कृषि आधारित उद्योगों की बड़ी संभावनाएं हैं। लेकिन निवेश सम्मेलन, एमओयू और सरकारी विज्ञापन अर्थव्यवस्था नहीं बनाते। अर्थव्यवस्था तब बनती है जब कारखाना खड़ा होता है, मशीन चलती है, उत्पादन होता है, स्थानीय आपूर्ति श्रृंखला बनती है और महीने के अंत में बिहार के युवा के बैंक खाते में नियमित वेतन पहुंचता है। बिहार को अब ‘एमओयू मॉडल’ नहीं, ‘मैन्युफैक्चरिंग मॉडल’ चाहिए। हर आवेदन की स्थिति ऑनलाइन हो, हर अधिकारी की जवाबदेही तय हो, हर स्वीकृति की समयसीमा हो, हर भूमि आवंटन का विवरण सार्वजनिक हो, हर प्रोत्साहन राशि का हिसाब हो और हर शिकायत का निपटारा समयबद्ध तरीके से हो। बिहार में हर 6 महीने पर एक औद्योगिक प्रगति रिपोर्ट सार्वजनिक हो। कितने प्रस्ताव आए, कितने स्वीकृत हुए, कितनों को जमीन मिली, कितनों ने पैसा लगाया, कितनों ने निर्माण शुरू किया, कितनों ने उत्पादन शुरू किया, कितने उद्योग बंद हुए, कितनी भूमि खाली है और कितने युवाओं को वास्तविक रोजगार मिला—हर सवाल का जवाब आंकड़ों के साथ दिया जाए। बिहार में उद्योग लगाना जरूरी है। लेकिन उससे भी जरूरी है ऐसी व्यवस्था बनाना जिसमें सरकारी जमीन, सरकारी प्रोत्साहन और सार्वजनिक धन का इस्तेमाल वास्तविक उत्पादन और रोजगार के लिए हो।

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