छात्रों के बीच बढ़ता राहुल का दायरा और डरती सरकार

छात्रों के बीच राहुल गांधी का बढ़ता दायरा केवल एक राजनेता की व्यक्तिगत सफलता नहीं है, बल्कि यह देश के युवाओं के भीतर सुलग रहे आक्रोश और बदलाव की चाहत का प्रतीक है। युवा अब केवल खोखले वादों या धार्मिक ध्रुवीकरण के चक्रव्यूह में फंसने को तैयार नहीं है; उसे रोजगार, पारदर्शी परीक्षा प्रणाली और एक सुरक्षित भविष्य चाहिए।

समकालीन भारतीय राजनीति में युवाओं और छात्रों की भूमिका हमेशा से निर्णायक रही है। इतिहास गवाह है कि जब भी देश में कोई बड़ा राजनीतिक या सामाजिक बदलाव आया है, उसकी नींव शिक्षण संस्थानों और विश्वविद्यालयों में ही रखी गई है। हालिया राजनीतिक परिदृश्य में एक नया और दिलचस्प ट्रेंड देखने को मिल रहा है। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेता राहुल गांधी का छात्रों और युवाओं के बीच लगातार बढ़ता दायरा। छात्रों की गूँज , ‘भारत जोड़ो यात्रा’ और उसके बाद ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ के जरिए राहुल गांधी ने देश के युवाओं, विशेषकर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्रों और विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राओं से सीधा संवाद स्थापित किया है। उनके इस बढ़ते प्रभाव ने न केवल कांग्रेस को पुनर्जीवित करने का काम किया है, बल्कि सत्ताधारी दल और सरकार के भीतर एक अदृश्य भय और असहजता भी पैदा कर दी है।

एक समय था जब राहुल गांधी की छवि को मुख्यधारा की मीडिया और राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों द्वारा एक “अपरिपक्व राजनेता” के रूप में पेश किया जाता था। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में उन्होंने अपनी राजनीति और संवाद की शैली में आमूल-चूल परिवर्तन किया है। उन्होंने रैलियों के पारंपरिक मंचों से उतरकर सीधे जनता के बीच जाना शुरू किया। इस रणनीति का सबसे बड़ा केंद्र बिंदु “छात्र और युवा” बने। राहुल गांधी आज दिल्ली के मुखर्जी नगर में सिविल सेवा की तैयारी कर रहे छात्रों के कमरों में जाकर उनकी परेशानियां सुन रहे हैं, तो कभी कोटा,कभी इलाहाबाद तो कभी पुणे में नीट (NEET) और जेईई (JEE) के अभ्यर्थियों के साथ बैठकर उनके मानसिक तनाव को समझ रहे हैं। वह विश्वविद्यालयों में जाकर छात्रों से सीधे सवाल-जवाब करते हैं, जहाँ कोई स्क्रिप्टेड स्क्रिप्ट नहीं होती। यह सीधा, बेबाक और अनौपचारिक संवाद युवाओं को आकर्षित कर रहा है। आज का युवा एक ऐसे नेता की तलाश में है जो उनकी बात को बिना किसी पूर्वाग्रह के सुने, और राहुल गांधी इस खाली जगह को भरते हुए दिखाई दे रहे हैं।

राहुल गांधी के छात्रों के बीच बढ़ते दायरे का मुझे कुछ मुख्य कारण यह दिखता है, उन्होंने छात्रों के उन वास्तविक और संवेदनशील मुद्दों को छुआ है, जिन्हें मुख्यधारा की राजनीति अक्सर दरकिनार कर देती है।हाल के वर्षों में देश के विभिन्न राज्यों में प्रतियोगी परीक्षाओं के पेपर लीक होने की घटनाओं ने करोड़ों छात्रों का भविष्य अंधकार में डाल दिया है। उत्तर प्रदेश पुलिस भर्ती, समीक्षा अधिकारी परीक्षा से लेकर राष्ट्रीय स्तर पर नीट (NEET) और यूजीसी-नेट (UGC-NET) जैसी परीक्षाओं में हुई धांधली ने छात्रों को सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर कर दिया। राहुल गांधी ने इन मुद्दों को न केवल सड़क पर उठाया, बल्कि संसद में भी इसे मजबूती से रेखांकित किया। उन्होंने इसे संस्थागत विफलता बताते हुए सरकार को सीधे कटघरे में खड़ा किया। भारत दुनिया का सबसे युवा देश है, लेकिन आज यही युवा इतिहास की सबसे गंभीर बेरोजगारी दर से जूझ रहा है। डिग्रियां हाथ में लेकर घूम रहे युवाओं के दर्द को राहुल गांधी ने अपनी राजनीति का मुख्य एजेंडा बनाया है। उन्होंने ‘राइट टू अप्रेंटिसशिप’ (शिक्षुता का अधिकार) जैसे क्रांतिकारी विचारों को युवाओं के सामने रखा, जिससे छात्रों को लगा कि कोई उनकी आर्थिक सुरक्षा की बात कर रहा है। फीस वृद्धि, स्कॉलरशिप में कटौती और सरकारी शिक्षण संस्थानों के निजीकरण के प्रयासों के खिलाफ छात्र लगातार आंदोलित रहे हैं। राहुल गांधी ने इन आंदोलनों को वैचारिक समर्थन देकर छात्रों के बीच अपनी पैठ मजबूत की है।

राहुल गांधी की इस नई सक्रियता और छात्रों के बीच उनकी बढ़ती लोकप्रियता ने सरकार की चिंताएं बढ़ा दी हैं। इस डर या असहजता के कई गहरे राजनीतिक और सामाजिक कारण हैं, साल 2014 और 2019 के आम चुनावों में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की प्रचंड जीत के पीछे पहली बार मतदान करने वाले (First-time voters) युवाओं और छात्रों की बहुत बड़ी भूमिका थी। राष्ट्रवाद, रोजगार के वादे और एक मजबूत नेतृत्व के नैरेटिव ने युवाओं को आकर्षित किया था। लेकिन अब जब वही युवा खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहा है और राहुल गांधी के करीब जा रहा है, तो सरकार को अपना सबसे मजबूत वोट बैंक खिसकता हुआ दिखाई दे रहा है। जेएनयू (JNU), जामिया, डीयू (DU), और हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी जैसे देश के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में सरकार विरोधी सुर हमेशा से मुखर रहे हैं। सरकार ने अक्सर इन आवाजों को दबाने या उन्हें “राष्ट्रविरोधी” करार देने की कोशिश की। लेकिन जब राहुल गांधी इन छात्रों के साथ खड़े होते हैं, तो यह असंतोष एक संगठित राजनीतिक ताकत का रूप लेने लगता है, जिससे निपटना सरकार के लिए आसान नहीं होता। युवा वर्ग सोशल मीडिया पर सबसे ज्यादा सक्रिय है। एक दौर था जब सोशल मीडिया पर राहुल गांधी का मजाक उड़ाया जाता था, लेकिन आज रील्स, यूट्यूब और एक्स (X) पर राहुल गांधी के छात्रों के साथ संवाद के वीडियो मिलियन में व्यूज बटोर रहे हैं। युवाओं द्वारा खुद इन वीडियो को शेयर किया जाना यह दिखाता है कि नैरेटिव अब बदल चुका है। सरकार की पूरी ट्रोल आर्मी भी अब इस बदलाव को रोकने में बेअसर साबित हो रही है।

सरकार की इस घबराहट का असर उनकी नीतियों और प्रतिक्रियाओं में साफ देखा जा सकता है। जब भी छात्र पेपर लीक या रोजगार के मुद्दे पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने सड़कों पर उतरते हैं, तो सरकार का पहला रिस्पॉन्स लाठीचार्ज, हिरासत या इंटरनेट बंदी के रूप में सामने आता है। लोकतांत्रिक तरीके से उठने वाली आवाजों को बलपूर्वक दबाने का यह प्रयास सरकार के भीतर के डर को ही उजागर करता है। इसके अलावा, जब भी राहुल गांधी छात्रों के मुद्दों को लेकर सरकार को घेरते हैं, तो सत्तापक्ष की ओर से मूल मुद्दों पर जवाब देने के बजाय विषय को भटकाने की कोशिश की जाती है। इतिहास, धर्म, और ध्रुवीकरण के पुराने कार्ड खेले जाते हैं ताकि युवा बेरोजगारी और पेपर लीक जैसे बुनियादी सवालों को भूल जाएं। लेकिन आज का छात्र जागरूक है, वह समझ रहा है कि नैरेटिव बदलने की इस कोशिश के पीछे असल मंशा क्या है।

छात्रों के बीच राहुल गांधी का बढ़ता दायरा केवल एक राजनेता की व्यक्तिगत सफलता नहीं है, बल्कि यह देश के युवाओं के भीतर सुलग रहे आक्रोश और बदलाव की चाहत का प्रतीक है। युवा अब केवल खोखले वादों या धार्मिक ध्रुवीकरण के चक्रव्यूह में फंसने को तैयार नहीं है; उसे रोजगार, पारदर्शी परीक्षा प्रणाली और एक सुरक्षित भविष्य चाहिए। सरकार का डर इस बात को लेकर नहीं है कि राहुल गांधी लोकप्रिय हो रहे हैं, बल्कि डर इस बात का है कि देश का सबसे ऊर्जावान वर्ग यानी छात्र अब सरकार की विफलताओं पर सीधे सवाल दागने लगा है। इतिहास गवाह है कि सत्ता चाहे कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हो, जब देश का छात्र और युवा वर्ग सड़कों पर उतरकर बदलाव का मन बना लेता है, तो बड़े से बड़े सिंहासन डोल जाते हैं। राहुल गांधी का छात्रों के बीच बढ़ता यह दायरा आने वाले समय में भारतीय राजनीति की दिशा और दशा तय करने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला है।

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