मैदान छोड़ा नहीं जायेगा, रथ मोड़ा नहीं जायेगा: जिद सवर्णों की, क्या यूजीसी कानून वापस होगा?

कोई मैदान छोड़ा तो नहीं जायेगा, अब रथ को मोड़ा तो नहीं जायेगा.
जिद सवर्णों की भी लव-कुश की तरह है, अब इससे आगे काले कानून का छोड़ा तो नहीं जायेगा

“मैदान छोड़ा नहीं जायेगा, रथ मोड़ा नहीं जायेगा!” दिल्ली के जंतर-मंतर से उठी सवर्णों की यह गर्जना इस समय देश के सियासी और सामाजिक गलियारों में गूंज रही है। क्या किसी दलित ने UGC मांगा था? क्या किसी OBC ने यूजीसी कानून मांगा था? क्या किसी प्रधानमंत्री के मुख से सुने है कि मेरी माँ बर्तन मांजती थी और बदला लेना है? जो रो रो कर बोलते है और हिंदुओं को लडवा कर स्वर्णों का हत्या और लूट करवाना चाहते है सिवा महामानव जी का? है कोई इतनी रखनेवाला सोच तो बतियाएगा। ये खुद 85% वोट को साधने के लिए ऐसा यूजीसी का नियम लाये ताकि 15% वाला 85% के विरुद्ध खड़ा हो जाए और ये अपना रोटी सेक ले जबकि हम सभी के आपस में ऐसा नियम के बारे में कोई सोच नहीं रखते है जबकि परिवार और एकजुट बनकर साथ रहते हैं। जब घर का चुना हुआ मुखिया ही घर को आग लगाने पर आ जाए तो मेरे नजर में उनकी संज्ञा पागल हांथी का हो जाता है और औलादे क्या करती है? यह जग जाहिर है। इस देश में ऐसा इतिहास किसी ने नहीं बनाया था। आज यह पार्टी अगर खड़ी है और थी तो स्वर्गीय वाजपेई जी का बहुत बड़ा योगदान है और इसकी विलीनता में यशस्वी मोदी जी का बहुत बड़ा योगदान होगा। जाति धर्म से पड़े हटकर कोई भी विकास, नौकरी, रोजगार और शिक्षा का बात नहीं करता है चाहे वह कोई भी पार्टी हो सिवाय कॉंग्रेस का।

यह हम सभी को बहुत जिम्मेदारी के साथ सोचना होगा साथ चलना होगा, आपको नेतृत्व करना होगा, सवरना और संभालना होगा,
एकजुट होकर राष्ट्र सर्वोपरि की शक्ति को बढ़ाना होगा।विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के आरक्षण और पात्रता संबंधी नए नियमों तथा हालिया प्रशासनिक फैसलों के खिलाफ सवर्ण समाज और सामान्य वर्ग के युवाओं ने आर-पार की लड़ाई का ऐलान कर दिया है। हाथों में तख्तियां, आंखों में गुस्सा और जुबां पर व्यवस्था बदलने का संकल्प लिए हजारों युवा सड़कों पर हैं। यह आंदोलन सिर्फ एक विरोध प्रदर्शन नहीं, बल्कि सामान्य वर्ग के उस संचित असंतोष का विस्फोट है, जो लंबे समय से खुद को व्यवस्था में उपेक्षित महसूस कर रहा था। इस अभूतपूर्व आक्रोश की जड़ें यूजीसी के उन हालिया दिशानिर्देशों और नीतिगत बदलावों में हैं, जिन्हें सामान्य वर्ग अपने हितों पर सीधे कुठाराघात के रूप में देख रहा है। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि उच्च शिक्षण संस्थानों में प्रोफेसरों की भर्ती, पात्रता मानदंडों और फेलोशिप के वितरण में किए जा रहे बदलावों से योग्यता (Merit) को पूरी तरह दरकिनार किया जा रहा है।आखिर आंदोलनकारी क्या मांग रहे हैं ? नेट (UGC NET) और प्रोफेसर भर्ती में कट-ऑफ अंकों और पात्रता मानकों में आ रहे भारी अंतर को लेकर सवर्ण युवाओं में गहरी नाराजगी है।

सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से कमजोर (EWS) छात्रों का दावा है कि उनके लिए मिलने वाली स्कॉलरशिप और फेलोशिप की संख्या सीमित की जा रही है, जबकि अन्य श्रेणियों में इसका दायरा बढ़ाया जा रहा है। विश्वविद्यालयों में विभागवार रोस्टर प्रणाली लागू होने से सामान्य वर्ग के लिए उपलब्ध सीटें लगातार सिकुड़ रही हैं। जंतर-मंतर पर जुटे आंदोलन के नेताओं का साफ कहना है कि इस बार वे किसी खोखले आश्वासन पर पीछे हटने वाले नहीं हैं। आंदोलन का नेतृत्व कर रहे एक छात्र नेता ने कहा, “हमने दशकों तक चुप रहकर सहन किया है। हमारी मेधा, हमारी कड़ी मेहनत को आरक्षण की राजनीति की बलि चढ़ा दिया गया। अब जब पानी सिर से ऊपर जा चुका है, तो हम मैदान छोड़कर भागने वाले नहीं हैं। जब तक सरकार यूजीसी के इन विवादित कानूनों को वापस नहीं लेती या इनमें न्यायसंगत संशोधन नहीं करती, हमारा रथ वापस नहीं मुड़ेगा।” यह जिद सरकार के लिए एक बड़ी राजनीतिक और प्रशासनिक दुविधा बन गई है। एक तरफ जहां सरकार सामाजिक न्याय और पिछड़े-वंचित वर्गों को मुख्यधारा में लाने के लिए प्रतिबद्ध है, वहीं दूसरी तरफ सवर्ण समाज के इस बड़े और मुखर वोट बैंक की नाराजगी मोल लेना किसी भी राजनीतिक दल के लिए आत्मघाती साबित हो सकता है। आंदोलन को मिल रहे भारी जनसमर्थन के पीछे सवर्ण समाज के कुछ बुनियादी तर्क हैं, जिन्हें वे देश के सामने रख रहे हैं।

युवाओं का कहना है कि 90% से अधिक अंक लाने के बाद भी सामान्य वर्ग के छात्रों को देश के शीर्ष विश्वविद्यालयों में जगह नहीं मिलती, जबकि कम अंकों वाले छात्र आसानी से दाखिला और नौकरी पा जाते हैं। इससे तंग आकर देश की सर्वश्रेष्ठ प्रतिभाएं विदेश पलायन कर रही हैं। सवर्ण संगठनों का तर्क है कि गरीबी किसी जाति को देखकर नहीं आती। ईडब्ल्यूएस (EWS) को मिला 10% आरक्षण ऊंट के मुंह में जीरे के समान है और इसकी शर्तें इतनी जटिल हैं कि वास्तविक गरीबों को इसका लाभ नहीं मिल पा रहा है। प्रदर्शनकारियों के अनुसार, संविधान ने सबको समानता का अधिकार दिया है, लेकिन वर्तमान नीतियां बहुसंख्यक सामान्य वर्ग के साथ ‘सकारात्मक भेदभाव’ के नाम पर अन्याय कर रही हैं। विशेषज्ञों और राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सरकार के लिए इस कानून को पूरी तरह से वापस लेना आसान नहीं होगा। इसके पीछे कई कानूनी और सामाजिक अड़चनें हैं। हालांकि, आंदोलन के बढ़ते दबाव को देखते हुए बीच का रास्ता निकाला जा सकता है। सरकार आंदोलन को शांत करने के लिए यूजीसी के नियमों की समीक्षा करने हेतु एक उच्च स्तरीय समिति (High-Level Committee) का गठन कर सकती है, जिसमें सवर्ण समाज के प्रतिनिधियों को भी शामिल किया जाए। आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए आयु सीमा, अंकों की पात्रता और फेलोशिप की संख्या में बढ़ोतरी करके सरकार सवर्ण युवाओं के गुस्से को कम करने का प्रयास कर सकती है।

इस बात की पूरी संभावना है कि यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचेगा। यदि न्यायालय यूजीसी के किसी नियम पर रोक लगाता है, तो सरकार को कानून में संशोधन करने का एक सुरक्षित रास्ता मिल जाएगा। यह आंदोलन केवल नीतिगत बदलावों की मांग तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश के सामाजिक ताने-बाने के लिए भी एक परीक्षा है। सोशल मीडिया पर ‘योग्य सामान्य वर्ग’ और ‘सामाजिक न्याय’ के समर्थकों के बीच तीखी बहस छिड़ी हुई है। एक तरफ जहां सवर्ण समाज इस लड़ाई को अपने अस्तित्व और सम्मान की लड़ाई मान रहा है, वहीं दूसरी तरफ आरक्षित वर्गों का मानना है कि यह आंदोलन उनके संवैधानिक अधिकारों को कमजोर करने की एक साजिश है। इस संवेदनशील माहौल में सरकार, यूजीसी और प्रदर्शनकारियों के बीच एक रचनात्मक संवाद की तत्काल आवश्यकता है। यदि इस असंतोष को समय रहते नहीं संभाला गया, तो यह आंदोलन देश के विश्वविद्यालयों और शैक्षणिक माहौल को लंबे समय तक अशांत रख सकता है। “मैदान छोड़ा नहीं जायेगा, रथ मोड़ा नहीं जायेगा” का नारा इस बात का स्पष्ट संकेत है कि सवर्ण युवा इस बार अपनी मांगों को लेकर बेहद गंभीर हैं। यूजीसी कानून वापस होगा या नहीं, यह तो आने वाला समय ही बताएगा, लेकिन इस आंदोलन ने देश की आरक्षण नीति और योग्यता के सिद्धांतों पर एक नई और गंभीर बहस को जन्म दे दिया है। सरकार को अब एक ऐसा संतुलन खोजना होगा जहां सामाजिक न्याय भी सुरक्षित रहे और प्रतिभाओं का गला भी न घोटे।

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