उनका बेटा  विशाल वृक्ष की तरह  ठाकुर साहब के आँगन में मुंतक़िल हो चुका था!

डॉ. मुश्ताक अहमद शाह ‘सहज’ (हरदा, मध्य प्रदेश)

गाँव की आबो-हवा में सोंधी मिट्टी की महक से ज़्यादा एक अजीब सी ख़ामोश ऐंठ घुली रहती थी। यह ऐंठ किसी रंजिश या दुश्मनी की नहीं, बल्कि दो इज़्ज़तदार और बावक़ार ख़ानदानों की आपसी अना (अहंकार) और अपने-अपने स्वाभिमान की थी। एक तरफ़ चौधरी वीरेंद्र सिंह थे,ज़मींदार, उसूलों के पक्के और गाँव में अपनी बात पर क़ायम रहने वाले इंसान। उनकी हवेली की ईंट-ईंट में एक पुराना रऊफ़ और ताक़त की झलक थी। दूसरी तरफ़ ठाकुर जसवंत सिंह थे, ख़ानदानी आन-बान-शान के मालिक, जिनकी गर्दन में कभी झुकना न सीखने का मान था। दोनों के पास ईश्वर का दिया सब कुछ था,ज़र-ज़मीन, इज़्ज़त और दोनों घरों में एक-एक चिराग़। चौधरी साहब का बेटा, समर, जो शहर से उच्च शिक्षा हासिल करके गाँव लौटा था, और ठाकुर साहब की बेटी, सोनाली, जो गाँव की फ़िज़ाओं में पली-बढ़ी, निडर, सच्ची और बेबाक व्यक्तित्व की मलिका थी। चौधरी जी के आँगन के बिल्कुल पिछले हिस्से में फलों का एक बेहद ख़ूबसूरत और शादाब बग़ीचा था। यह बग़ीचा महज़ पेड़ों का झुंड नहीं, बल्कि चौधरी जी की बरसों की मेहनत और देखभाल का प्रतीक था। अमरूद, आम और बेर के भारी झुके हुए पेड़ चौधरी जी की हवेली की ज़ीनत थे। लेकिन इन्हीं पेड़ों में से कुछ आम और बेर के घने पेड़ हवेली की दीवार को पार करके ठाकुर साहब की ज़मीन और आँगन की तरफ़ भी झुके हुए थे।
सोनाली के लिए यह जात-पात, ऊँच-नीच और ख़ानदानी फ़ासले बिल्कुल बेमानी थे। वह एक ज़िंदादिल लड़की थी, जिसके दिल में गाँव के हर बच्चे के लिए हमदर्दी थी। वह रोज़ शाम को हाली-मवाली और मोहल्ले के बच्चों को साथ लेती और पिछवाड़े के उस बग़ीचे के क़रीब पहुँच जाती। वह पेड़ों पर पत्थर मारकर पके हुए फल तोड़ती और बच्चों में बाँट देती। हालाँकि सोनाली की इस चुलबुली शोख़ी में कोई बुराई न थी, लेकिन चौधरी जी को अपने आँगन और बग़ीचे में बिना इजाज़त बच्चों का शोर-गुल और फल तोड़ना पसंद नहीं था। वह इसे अपने उसूलों के ख़िलाफ़ मानते थे।


एक दिन चौधरी जी ने चौपाल की थड़ी पर बैठते हुए शालीन लेकिन सख़्त लहज़े में कहा, “ठाकुर साहब! आपकी बेटी निडर है, यह अच्छी बात है। लेकिन हमारे पिछवाड़े के आँगन में इस तरह बिना रोक-टोक आना और बच्चों को इकट्ठा करके फल तोड़ना हमें पसंद नहीं। उसूल भी कोई चीज़ होते हैं।” ठाकुर साहब ने चिलम का कश लिया और मुस्कुराकर बोले, “चौधरी जी! बेटी निडर ज़रूर है पर बे-उसूल नहीं, वह तो बस बच्चों की ख़ुशी देखती है। और रही बात इन पेड़ों की… तो वह पेड़ आपके आँगन में ज़रूर लगे हैं, पर उनकी कुछ शाखाएँ मेरी ज़मीन की तरफ़ भी आती हैं। अब जो शाखाएँ मेरी ज़मीन पर साया दें, उनके फल पर हक़ तो बच्चों का ही बनता है!” इस बात पर दोनों इज़्ज़तदार बुज़ुर्गों के बीच एक बारीक सी तल्ख़ी पैदा हो गई। चौधरी जी चाहते तो उन शाखाओं को कटवा सकते थे, लेकिन गाँव वाले कहते कि ‘चौधरी ने ठाकुर के डर से पेड़ काट दिया!’ इसीलिए वह अपनी ख़ुद्दारी की ख़ातिर रोज़ कुढ़ते भी थे और उन शाखाओं को क़ायम भी रखे हुए थे। इसी दौरान चौधरी जी का बेटा समर शहर के डिग्री कॉलेज से पढ़ाई पूरी करके गाँव लौटा। शहर की आधुनिक शिक्षा ने समर को एक व्यापक दृष्टिकोण और व्यावहारिक इंसान बना दिया था। वह जानता था कि बुज़ुर्गों की यह तल्ख़ी महज़ पुरानी सोच और अना की पैदावार है। एक दोपहर, जब सोनाली उसी झुकी हुई शाखा से आम तोड़ने की कोशिश कर रही थी, समर वहाँ आ खड़ा हुआ। “अगर बाबा ने देख लिया तो वह फिर उसूलों का सबक़ देने लगेंगे,” समर ने मुस्कुराकर कहा। सोनाली ने बेबाकी से जवाब दिया, “उसूल इंसान के लिए होते हैं, इंसान उसूलों के लिए नहीं। यह पेड़ आधा हमारे आँगन पर साया करता है, इसलिए इन फलों पर ग़रीब बच्चों का भी उतना ही हक़ है जितनी चौधरी जी की अना का!” समर उसकी सच्चाई और बेबाक अंदाज़ पर हँस पड़ा। इसके बाद दोनों की यह मुलाक़ातें रोज़ का नियम बन गईं। कभी पिछवाड़े की दीवार के पास तो कभी फलों की उसी झुकी हुई शाखा के नीचे, समर और सोनाली घंटों बातें करते। समर उसे शहर की दुनिया और विज्ञान की बातें बताता, और सोनाली उसे गाँव के मासूम लोगों की ज़िंदगी के क़िस्से सुनाती। धीरे-धीरे दोनों के दिलों में एक पाकीज़ा और गहरी मोहब्बत परवान चढ़ने लगी,एक ऐसी मोहब्बत जो ख़ानदानी अना और जात-पात के हर भरम को तोड़ने की ताक़त रखती थी।


एक शाम, चौधरी जी पिछवाड़े की तरफ़ से गुज़र रहे थे कि उन्होंने पेड़ के घने पत्तों के पीछे से समर और सोनाली की हँसी की आवाज़ सुनी। चौधरी जी के क़दम वहीं थम गए। उन्होंने देखा कि उनका अपना बेटा—उनका फ़ख़्र—ठाकुर की उसी बेटी के साथ ख़ुशगपश में मसरूफ़ था जिसके साथ उनके उसूलों का मतभेद था। “समर!” चौधरी जी की आवाज़ ग़ुस्से और धक्के से गूँज उठी। सोनाली ने चौधरी जी के ग़ुस्से को देखा, लेकिन उसने कोई अभद्रता नहीं की। उसने बावक़ार अंदाज़ में चौधरी जी को प्रणाम किया और अपने घर की तरफ़ चली गई। उस रात चौधरी जी की हवेली में भारी तनाव था। “तुम उस ठाकुर की लड़की से मिलते हो? तुम जानते हो गाँव में हमारी क्या इज़्ज़त है?” चौधरी जी ने आहत होकर कहा। “लोग क्या कहेंगे कि चौधरी का बेटा ठाकुर की बेटी से बातें करता फिरता है?” समर ने बेहद अदब मगर मज़बूती से कहा, “बाबा! किसी से सच्ची बात करने या मोहब्बत करने से ख़ानदान की इज़्ज़त पर आँच नहीं आती। आप जिसे इज़्ज़त समझकर बचा रहे हैं, वह सिर्फ़ आपका अहंकार है। वह पेड़ साया और फल देने के लिए है, लेकिन आपने उसे भी ख़ानदानी अना का निशान बना दिया है।” चौधरी जी की अना ज़ख़्मी हो चुकी थी। अगली ही सुबह, उन्होंने कुल्हाड़ी उठाई और मज़दूरों को बुलाकर हुक्म दिया, “इस पेड़ की वह तमाम शाखाएँ काटकर अलग कर दो जो ठाकुर साहब के आँगन की तरफ़ जाती हैं! मुझे अपनी ज़मीन का एक पत्ता भी उनके आँगन में नहीं चाहिए!”


कुल्हाड़ियों की छन-छन से पूरा गाँव गूँज उठा। ठाकुर साहब अपनी हवेली की बालकनी में आ खड़े हुए और ख़ामोशी से यह सारा मंज़र देखते रहे। सोनाली ने बाप का हाथ थाम लिया, और समर दीवार के उस पार उदास नज़रों से अपने बाप को देखता रहा।
पेड़ की बड़ी-बड़ी शाखाएँ कटकर ज़मीन पर गिर गईं। चौधरी जी ने कुल्हाड़ी ज़मीन पर फेंकी और ठाकुर साहब की तरफ़ देखकर बोले, “अब न रहेगी शाख, न आएगी आपकी बेटी!” ठाकुर साहब ने मद्धम सी मुस्कान के साथ कहा, “चौधरी जी! शाखाएँ काटकर आपने किसी को नहीं रोका, बल्कि अपने ही घर का साया कम कर दिया है।” चौधरी जी ने समझा था कि कुल्हाड़ी की हर चोट के साथ उन्होंने अपनी इज़्ज़त बचा ली है। लेकिन वह यह भूल गए थे कि सच्ची मोहब्बत की जड़ें ज़मीन के अंदर इतनी गहरी होती हैं कि ऊपर की शाखाएँ काटने से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। धीरे-धीरे समर और सोनाली का प्रेम परवान चढ़ता गया। दोनों ने महसूस किया कि ख़ानदानी अना का समाधान लड़ाई में नहीं, बल्कि एक क़ानूनी और बावक़ार रिश्ते में है। समर और सोनाली ने शहर जाकर अदालत  में कोर्ट मैरिज कर ली और क़ानूनी व सामाजिक तौर पर एक-दूसरे के हो गए। इस क़दम में न किसी की इज्ज़त पर आँच आई और न ही कोई जल्दबाज़ी थी, बल्कि यह एक समझदारी भरा निर्णय था।


जिस दिन समर और सोनाली शादी करके वापस लौटे, सूरज ढल रहा था। चौधरी जी बरामदे में बैठे थे कि सामने से समर और सोनाली हाथों में हाथ डाले अंदर दाख़िल हुए। सोनाली की माँग में सिंदूर था और चेहरे पर बहू का गरिमामयी रूप। चौधरी जी का अस्तित्व अंदर से हिल गया। वह अपनी जगह से उठे। उनकी मूँछें, जो हमेशा अना की वजह से तनी रहती थीं, आज उन्हें ख़ुद अपने ही सामने कुछ झुकी-झुकी सी महसूस हुईं। उन्हें ऐसा लगा जैसे उन्होंने पिछवाड़े के बग़ीचे की शाखाएँ तो कटवा दी थीं… लेकिन यह क्या? उनका अपना लगाया हुआ ‘विशाल वृक्ष’ यानी उनका बेटा समर, रातों-रात जैसे ठाकुर साहब के आँगन में मुंतक़िल (स्थानांतरित) हो चुका था! यानी उनका बेटा अब उसी ठाकुर की बेटी का हमसफ़र बन चुका था जिसे वह दूर रखना चाहते थे।
चौधरी जी को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि यह सब कैसे हो गया। वह गहरे संकोच और उधेड़बुन में पड़ गए कि आख़िर यह क्या हो गया। इसी लम्हे चौधरी जी की नज़र सामने ठाकुर साहब की हवेली पर पड़ी। ठाकुर जसवंत सिंह हवेली की ऊँची खिड़की में खड़े मुस्कुरा रहे थे—उस मुस्कान में कोई व्यंग्य नहीं था, बल्कि एक गहरा स्वीकार और ख़ुशी थी कि उनके बच्चों ने अना की इस दीवार को गिरा दिया है।


सोनाली ने आगे बढ़कर बेहद सम्मान से चौधरी जी के चरण स्पर्श किए। समर ने बाप के काँपते हुए कंधे पर हाथ रखा और नर्म लहज़े में कहा, “बाबा! आपने पेड़ की शाखाएँ इसलिए काटी थीं क्योंकि आपको लगता था कि वह दूसरे के आँगन में जा रही हैं। लेकिन देखिए, सोनाली अब आपकी बेटी और इस घर की इज़्ज़त बनकर आई है। हमने किसी की इज़्ज़त पर आँच नहीं आने दी।”
सोनाली ने मुस्कुराकर चौधरी जी की तरफ़ देखा और कहा, “बाबा जी! आपने तो सिर्फ़ ऊपर की शाखाएँ काटी थीं… जड़ें तो अभी भी इसी ज़मीन में हैं! और अब यह आँगन मेरा भी है।” चौधरी जी ने अपनी मूँछों पर हाथ फेरा। उनके चेहरे की सख़्ती पिघल गई और उनकी आँखों में एक सौम्य मुस्कान तैर गई। उन्होंने सामने खिड़की में खड़े ठाकुर साहब की तरफ़ देखकर ऊँची आवाज़ में पुकारा, “ठाकुर साहब! अब वहाँ खिड़की में खड़े-खड़े मुस्कुराते ही रहोगे या नीचे आकर अपनी बेटी और हमारे बेटे को दुआ भी दोगे? अब तो मैं आपकी बेटी को अपने घर की लक्ष्मी बनाकर ले आया हूँ!” ठाकुर साहब का प्रफ़ुल्लित क़हक़हा हवा में गूँज उठा। वह फ़ौरन नीचे उतरकर आए और दोनों पुराने ख़ुद्दार साथियों ने एक-दूसरे को गले से लगा लिया। वह बरसों पुरानी खटास, अहंकार और दूरियाँ बच्चों के इस पाकीज़ा रिश्ते के आगे एक पल में ख़त्म हो गईं। अगली ही बहार में गाँव वालों ने एक मनोरम मंज़र देखा।


जिस पेड़ की शाखाएँ चौधरी जी ने काट दी थीं, उस सूखे तने से हरी-हरी नई कोंपलें और घनी शाखाएँ फूटने लगी थीं। वह पेड़ पहले से भी ज़्यादा शादाब और हरा-भरा हो चुका था। अब शाम के समय का मंज़र बदल चुका था। चौधरी जी और ठाकुर साहब उसी पेड़ की घनी छाँव में एक साथ खाट पर बैठे चिलम पीते और हँसते। सोनाली हवेली से चाय लेकर आती और समर उनके पास बैठकर बातें करता। गाँव के वही बच्चे बिना रोक-टोक उसी पेड़ के नीचे खेलते और चौधरी जी ख़ुद अपने हाथों से पेड़ के पके फल तोड़कर बच्चों में बाँटते। एक दिन ठाकुर साहब ने मुस्कुराकर कहा, “चौधरी जी! देखिए, शाखाएँ फिर से मेरी हवेली की तरफ़ झुक रही हैं!” चौधरी जी ने क़हक़हा लगाया और बोले, “झुकने दो ठाकुर साहब! अब चाहे शाखाएँ इस तरफ़ जाएँ या उस तरफ़… फल तो हमारे अपने बच्चों के ही आँगन में गिरेंगे!” कटे हुए पेड़ पर आई यह नई बहार सिर्फ़ पत्तों की नहीं थी, बल्कि वह दो दिलों, दो ख़ानदानी वक़ार और पूरे गाँव की उस मोहब्बत की बहार थी जिसने साबित कर दिया कि अहंकार से कहीं बड़ी हक़ीक़त इंसानों की आपसी मोहब्बत और रिश्तों का सम्मान होती है।

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