डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह,सहज़, हरदा,मध्य प्रदेश

दिन ढलते ही शहर की रौनक बदल जाती थी। एक तरफ़ इत्र की ख़ुशबू और दूसरी तरफ घुंघरूओं की झनकार। शाम ढलती और कोठे की सीढ़ियों पर रईसजादों की भीड़ जुटने लगती। तवायफ़ की दुनिया सिर्फ़ इतनी थी,लोगों का दिल बहलाना, उनके ग़म भुलाना और ख़ुद के आंसुओं को घुंघरूओं की आवाज़ में छिपा लेना। दिन भर रियाज़, घुंघरूओं की ख़नक और महफ़िलों की सजावट। रात होते ही पान की पीकदान, शराब के दौर और हवा में तैरते हुए कश। महफ़िलें सजती थीं, लोग आते थे,वही लोग जो दिन के उजाले में खुद को समाज का ‘शरीफ़’ और ‘पारसा’ (नेक) कहते थे, लेकिन रात की चादर तले इसी कोठे के ख़ामोश कमरों में अपने सारे उसूल बेच आते थे।

वे निगाहें जो दिन में तवायफ़ को देखकर नज़रें फेर लेती थीं, रात को उसके हुस्न पर पैसे उछालती थीं। उसके साथ हंसती थीं, उसके वज़ूद से खेलती थीं और शराब के प्यालों में डूबकर अपनी सारी इंसानियत भूल जाती थी। सुबह होते ही वे अपने घरों को लौट जाते,साफ़-सुथरे, इज़्ज़तदार और बेदाग़ बनकर। मगर बदनाम कौन होता था? सिर्फ़ कोठा और वह तवायफ़! उस बेचारी का क़सूर क्या था? क्या वह ख़ुद चलकर उन अमीरज़ादों को अपने दरवाज़े पर बुलाने जाती थी? नहीं! वे ख़ुद अपनी ख़्वाहिशों के ग़ुलाम बनकर खिंचे चले आते थे। फ़िर भी गुनहगार हमेशा तवायफ़ ही ठहराई जाती, और समाज के वे तथाकथित ‘पारसा’ अमीरज़ादे हमेशा पाक-साफ़ बने रहते। समाज की इस दोहरी नीति पर उस तवायफ़ की रूह रोज़ तड़पती थी। एक रात, उस महफ़िल में एक ऐसा शख़्स आया जो बाक़ी भीड़ से बिल्कुल जुदा था। उसकी आंखों में हवस नहीं, बल्कि एक अजीब सी उदासी और तहज़ीब थी। उसका नाम दानिश था—एक पढ़ा-लिखा, शर्मीला और सादगी पसंद इंसान, जो शहर के एक अदना से स्कूल में बच्चों को तालीम (शिक्षा) देता था।
दानिश उस महफ़िल में अपने एक दोस्त के जबरन खींच लाने पर आया था। उसने बाक़ी लोगों की तरह न तो पैसे उछाले और न ही कोई भद्दी फ़रमाइश की। वह बस ख़ामोशी से बैठा तवायफ़ (जिसका नाम हुस्ना था) की घुंघरूओं की लय और उसकी दर्द भरी ग़ज़ल सुनता रहा। जब महफ़िल खत्म हुई और सब लोग जा चुके थे, दानिश जाने से पहले रुका। उसने हुस्न की आंखों में झांका और कांपते हुए लहजे में कहा, “तुम्हारी इन घुंघरूओं की आवाज़ में कोई बहुत बड़ी सचाई छिपी है, लेकिन इस महफ़िल का शोर तुम्हारी रूह की चीख़ को दबा रहा है। तुम सिर्फ़ एक तमाशा नहीं हो, एक इंसान हो।” ये अल्फ़ाज़ हुस्ना के दिल पर तीर की तरह लगे। ज़िंदगी में पहली बार किसी मर्द ने उसे ‘हुस्न की चीज़’ या ‘मनोरंजन का साधन’ नहीं, बल्कि एक इंसान समझा था। वक्त गुज़रता गया। दानिश रोज़ शाम को कोठे पर नहीं, बल्कि महफ़िल उठने के बाद सिर्फ़ एक घड़ी के लिए हुस्ना से मिलने आने लगा। धीरे-धीरे यह मुलाकातें मोहब्बत में बदल गईं। दानिश की मोहब्बत झूठी नहीं थी; वह जिस्म की नहीं, रूह की प्यासी थी। उसने हुस्ना के अतीत को देखे बिना, उसे उसकी बदनामी के दलदल से बाहर निकालने का फ़ैसला किया।
लेकिन समाज इस सच्ची मोहब्बत को कैसे बर्दाश्त कर सकता था? जब शहर के उन रईसजादों और तथाकथित शरीफ़ लोगों को यह पता चला कि एक आम शिक्षक एक तवायफ़ से बेइंतहा मोहब्बत कर बैठा है और उसे अपनी ज़िंदगी का हिस्सा बनाना चाहता है, तो शहर में भूचाल आ गया। कोठे पर आने वाले उन रईसजादों की इज़्ज़त दांव पर लग गई थी। उन्हें डर था कि अगर एक तवायफ़ को इज़्ज़त मिल गई, तो उनके पापों का पर्दाफ़ाश हो जाएगा। एक सर्द रात, कोठे के बाहर कुछ रईसजादों ने दानिश को घेर लिया। उनके हाथों में नफ़रत और अहंकार की तलवारें थीं। उन्होंने दानिश को बेरहमी से पीटा। ख़ून से लथपथ दानिश किसी तरह घिसटता हुआ कोठे की सीढ़ियों तक पहुँचा और हुस्ना के दरवाज़े पर दम तोड़ दिया। उसकी आखिरी सांसों में भी सिर्फ़ हुस्ना का नाम था और हाथ में वह किताब थी जिससे वह बच्चों को तालीम देता था। जब हुस्ना ने दरवाज़ा खोला, तो सामने दानिश की लाश पड़ी थी। उस रात कोठे पर कोई घुंघरू नहीं बजा। उस रात किसी ने शराब का प्याला नहीं उठाया। हुस्ना ने दहाड़ मारकर रोना शुरू किया,वह रोना किसी तवायफ़ का नहीं, बल्कि एक लुट चुकी महबूबा का विलाप था। समाज ने एक बार फिर जीत हासिल कर ली थी,एक सच्ची मोहब्बत को कुचलकर। लेकिन उस दिन के बाद, उस शहर के कोठे पर कभी महफ़िल नहीं सजी। हुस्ना ने घुंघरू हमेशा के लिए उतार फेंके और दानिश के अधूरे ख़्वाब ग़रीब बच्चों को पढ़ाने को अपनी ज़िंदगी बना लिया। लोग आज भी उस कोठे को याद करते हैं, जहां एक तवायफ़ ने नाचना गाना छोड़ दिया था और एक शिक्षक की सच्ची मोहब्बत ने उसे अमर कर दिया था। अब वहशी महफ़िलों का वो बदनाम कोठा नहीं रहा था। समय की आंधी और एक सच्ची मोहब्बत के लहू ने उस इमारत का नक्शा ही बदल दिया था। अब वहाँ घुंघरूओं की ख़नक नहीं, बल्कि मासूम बच्चों की किलकारियाँ और ‘इल्म की तालीम की गूंज सुनाई देती थी। वह जगह अब एक मदरसा या स्कूल बन चुकी थी, जहाँ ग़रीब और यतीम बच्चे तालीम (शिक्षा) हासिल करने आते थे।
जो कभी ‘तवायफ़’ कहलाई जाती थी, आज वह इस इल्म के मंदिर की मालकिन और बच्चों की ‘अम्माँ जी’ थी। उसके जिस्म पर भड़कीले लिबास की जगह अब एक सादी सफेद साड़ी थी, और माथे पर इज़्ज़त का नूर था। मोहल्ले का मंजर भी बदल चुका था। जिस गली में कभी रईसज़ादों की गाड़ियों का हुजूम और गंदी निगाहों का पहरा रहता था, आज वह मुहल्ला एक पुरसुकून अंदाज़ में मुस्कुराता था। शाम ढलती तो गलियां अंधेरे में नहीं, बल्कि स्ट्रीट लाइट्स की रोशनी से रोशन होती थीं और वहाँ से गुजरने वाले लोग उस इमारत को झुके हुए सिर और अदब से सलाम करते थे। स्कूल के वेंटिंग हॉल (प्रतीक्षालय) में क़दम रखते ही दीवार पर एक बड़ी सी तस्वीर टंगी थी, वह दानिश की तस्वीर थी। उस फ़्रेम की हुई तस्वीर में दानिश आज भी वैसे ही मुस्कुरा रहा था, जैसे वह पहली बार कोठे पर आकर हुस्ना से मिला था। उसकी आँखों में वही शराफ़त और होठों पर वही अपनापन था। अब समाज बदल चुका था, या यों कहें कि समाज की नज़रें बदल चुकी थीं। जो लोग कल तक उसे कोठे की एक मामूली तवायफ़ समझकर दुत्कारते थे, आज वही लोग उसे इज़्ज़त और हुर्मत की निगाहों से देखते थे। हुस्ना रोज सुबह उठकर उस तस्वीर को देखती, अपने आँचल से उसकी धूल साफ करती और ख़ुद से कहती,,, “दानिश, तुमने मुझे सिर्फ़ मोहब्बत नहीं दी, बल्कि मुझे मेरा वज़ूद लौटा दिया है। देखो, तुम्हारे सपनों का सूरज अब इन बच्चों की आँखों में चमक रहा है।”

